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Bihar Chunav: चिराग पासवान की राजनीति कैसे उनके पिता रामविलास पासवान से अलग है, यूं ही नहीं लड़ रहे हैं चुनाव

Bihar Election 2025 (Chirag Paswan) : केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने रविवार 08 जून 2025 को कहा कि वो आने वाला बिहार विधानसभा चुनाव 2025 लड़ेंगे। चिराग पासवान ने आरा में एक रैली में कहा, ''मैं बिहार विधानसभा चुनाव लड़ूंगा। मैं किस सीट से लडूंगा इसका फैसला बिहार की जनता करेगी। मैं रामविलास पासवान का बेटा हूं। पिता के अधूरे सपनों को पूरा करूंगा और 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' के नारे के साथ बिहार को बदलने का काम करूंगा।"

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चिराग पासवान केंद्र की मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर अहम भूमिका निभा रहे हैं, तो फिर उन्होंने अचानक बिहार चुनाव लड़ने का मन क्यों बनाया? असल में चिराग सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विरासत के वारिस हैं -स्वर्गीय रामविलास पासवान के बेटे, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत पहचान बनाई लेकिन कभी बिहार की सत्ता पर काबिज नहीं हो सके। चिराग अब वही गलती दोहराना नहीं चाहते, जो उनके पिता ने की -दिल्ली की राजनीति तक सीमित रहना, जबकि बिहार की सत्ता में निर्णायक भूमिका निभाने का अवसर उनके पास था। ऐसे में आइए समझने की कोशिश करते हैं कि चिराग पासवान की राजनीति उनके पिता रामविलास पासवान से अलग कैसे है?

chirag paswan ram vilas paswan

चिराग पासवान की राजनीति VS रामविलास पासवान राजनीति

बिहार की राजनीति में पासवान परिवार की भूमिका दशकों से प्रभावशाली रही है। रामविलास पासवान एक अनुभवी और लोकप्रिय नेता रहे, जिन्हें 'मौसम वैज्ञानिक' कहा जाता था, लेकिन अब उनके बेटे चिराग पासवान एक नई राजनीतिक शैली और बदलते दृष्टिकोण के साथ उभरते नजर आ रहे हैं। रामविलास पासवान की राजनीति जहां संघर्षों और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर आधारित थी।

वहीं चिराग पासवान की राजनीति प्रेजेंटेशन, युवाओं से संवाद और सर्वसमाज को साथ लेने की रणनीति पर टिकी है। वे अपने पिता की विरासत को सिर्फ ढो नहीं रहे, बल्कि उससे आगे निकलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। चिराग की राजनीति में बॉलीवुड की झलक और बिहार की मिट्टी की खुशबू साथ-साथ नजर आती है-यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन सकती है।

chirag paswan ram vilas paswan

चिराग पासवान की राजनीति और रामविलास पासवान की राजनीति में बड़े अंतर

🔴 1. केंद्र बनाम राज्य: चिराग की जमीन से जुड़ी राजनीति

रामविलास पासवान का फोकस हमेशा केंद्र की राजनीति पर रहा। वे कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे और विभिन्न मंत्रालयों का नेतृत्व किया। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह के सरकार में भी वे मंत्री रहे। हालांकि 2005 में वे बिहार में 29 सीट जीतकर किंगमेकर की भूमिका में थे। वे सत्ता के करीब पहुंचे, उन्हें निर्णायक पद भी मिल रहा था, लेकिन उन्होंने दिल्ली की राजनीति को चुना।

इसके विपरीत चिराग पासवान ने साफ कहा है कि वे बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर एनडीए की जीत के लिए "चिराग पासवान" बनकर लड़ेंगे। उनका लक्ष्य साफ है-बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाना और मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर बढ़ना। चिराग पासवान बिहार में अब खुद के लिए एक केंद्रीय भूमिका की तलाश में हैं -न सिर्फ एक नेता के रूप में, बल्कि एक संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में। वे केवल चुनाव लड़ना नहीं चाहते, बल्कि बिहार की राजनीति की धुरी बनना चाहते हैं।

🔴 2. रामविलास दलितों की बात करते थे, चिराग 'बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट' कहते हैं

रामविलास पासवान को मुख्य रूप से दलितों का बड़ा चेहरा माना जाता था। वे दलित हितों की रक्षा के लिए हमेशा आगे रहते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक सीमाएं इसी वर्ग तक सीमित रहीं।

चिराग पासवान की राजनीति ज्यादा समावेशी है। उनका नारा "बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट" इस बात का प्रतीक है कि वे जाति से ऊपर उठकर युवा, विकास और प्रगतिशील एजेंडा पर जोर दे रहे हैं। वे खुद को सिर्फ दलितों के नहीं, बल्कि पूरे बिहार के नेता के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं।

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🔴 3. राजनीतिक शैली: परंपरा बनाम पर्सनैलिटी ब्रांडिंग

रामविलास पासवान की छवि एक सादगी भरे राजनेता की थी-सादा पहनावा, जमीन से जुड़ी सोच और कम शब्दों में गहरी बात।

चिराग पासवान की राजनीति में बॉलीवुड का असर साफ दिखाई देता है। उनका लुक, पहनावा, माथे पर तिलक, हाथ में कलावा, और मीडिया प्रेजेंस एक ब्रांडेड पॉलिटिशियन की झलक देता है। वे युवाओं के बीच इंफ्लुएंसर की तरह उभर रहे हैं। सोशल मीडिया ने चिराग पासवान की लोकप्रियता में अहम भूमिका निभाई है।

🔴 4. युवाओं और छात्रों से जुड़ाव

रामविलास पासवान की राजनीति पारंपरिक मुद्दों-आरक्षण, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व-पर केंद्रित थी। चिराग पासवान छात्रों और युवाओं की बात करते हैं। उनकी पार्टी के पोस्टर्स और भाषणों में बेरोजगारी, शिक्षा, स्टार्टअप और डिजिटल बिहार जैसे मुद्दे प्रमुख होते हैं। उनका यह रूझान युवा वोटर्स को जोड़ने में मदद करता है।

🔴 5. राजनीतिक समझ और रिश्तों को साधने की कला

रामविलास पासवान को 'मौसम वैज्ञानिक' कहा जाता था क्योंकि वे राजनीतिक अवसरों को भांपकर गठबंधन बदलते रहते थे। वहीं चिराग पासवान बिहार की विपक्षी पार्टी के साथ भी रिश्ते बनाकर रखना जानते हैं। वो मोदी कैबिनेट के मंत्री होकर भी लालू परिवार और तेजस्वी यादव से मिलने जाते हैं।

नीतीश कुमार के साथ भी उनके रिश्ते खट्टे-मीठे रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने NDA से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा था, कई सीटों पर JDU को नुकसान पहुंचाया था। लेकिन अब जेडीयू के साथ लोजपा के रिश्त सामान्य हैं। नीतीश कुमार ने हाल ही में लोजपा के राष्ट्रीय महासचिव और चिराग पासवान के जीजा धनंजय मृणाल पासवान को अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाया है। चिराग पासवान का दावा है कि वो रिश्तों को साधना जानते हैं और लंबी राजनीति के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं।

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