Bihar Chunav: इस बार CM नहीं बने तो खत्म होगा करियर? 5 प्वाइंट में समझिए तेजस्वी के लिए क्यों है ये आखिरी मौका
Bihar Chunav 2025 (Tejashwi Yadav): तेजस्वी यादव बिहार की राजनीति का सबसे चमकता हुआ नाम बन चुके हैं। लालू यादव की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने विपक्ष और सत्ता-दोनों में ही अपनी पकड़ मजबूत की है। दो बार डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाल चुके तेजस्वी अब सीधे मुख्यमंत्री बनने की ओर नजरें गड़ाए बैठे हैं। लेकिन सवाल है-क्या 2025 का चुनाव उनके लिए 'करो या मरो' जैसा साबित होगा? आइए, 5 बड़े कारणों से समझते हैं क्यों यह चुनाव उनकी सियासी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट हो सकता है।
2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की जंग है। अगर जीतते हैं तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पक्की, अगर हारते हैं तो आने वाला रास्ता और भी कठिन। यही वजह है कि इस बार का चुनाव उनके लिए सचमुच 'करो या मरो' जैसा है।

▶️ 1. सबसे बड़ा मौका हाथ में - लालू यादव की मौजूदगी
2020 के चुनाव में तेजस्वी यादव अकेले मोर्चा संभाल रहे थे क्योंकि लालू यादव जेल में थे। लेकिन इस बार तस्वीर बदल चुकी है। लालू यादव खुद बिहार की जमीन पर सक्रिय हैं और अपनी पूरी ताकत बेटे के पीछे झोंक चुके हैं। उनके अनुभव, राजनीतिक पकड़ और गठबंधन के नेताओं पर असर का सीधा फायदा तेजस्वी को मिलेगा। ऐसे में अगर इस मौके को भुना नहीं पाए, तो फिर दोबारा ऐसा सुनहरा चांस मिलना मुश्किल है।
▶️ 2. नीतीश कुमार की थकान और एंटी-इंकम्बेंसी
नीतीश कुमार पिछले डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज हैं। उम्र का असर, लगातार कुर्सी पर बने रहने की थकान और सत्ता-विरोधी लहर अब साफ दिखने लगी है। यही वजह है कि बिहार में जनता बदलाव का मूड भी बना रही है। अगर तेजस्वी इस लहर को कैश नहीं कर पाए, तो उनके खिलाफ ही सवाल खड़े हो जाएंगे कि वे मौका मिलने के बावजूद क्यों चूक गए।

▶️ 3. गठबंधन का इम्तिहान और आंतरिक कलह
तेजस्वी यादव के सामने सिर्फ बाहरी विपक्ष ही नहीं, बल्कि आंतरिक चुनौती भी बड़ी है। तेज प्रताप यादव का लगातार बागी तेवर और मीसा भारती की सक्रियता पार्टी के भीतर सवाल खड़े करती है। अगर चुनाव हारे, तो आरजेडी में नेतृत्व संकट गहराएगा और परिवार की राजनीति में भी दरार और चौड़ी हो सकती है। यही कारण है कि इस बार की जीत उनके लिए 'सरवाइव करने' की भी शर्त है।
▶️ 4. कांग्रेस और महागठबंधन का दबाव
महागठबंधन के भीतर कांग्रेस और अन्य दल पहले ही तेजस्वी से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे हैं। जैसे कांग्रेस ने राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री पद पर आरक्षण रखा, वैसे ही आरजेडी में मुख्यमंत्री पद को लेकर तेजस्वी का दावा है। अगर चुनाव में हार मिली, तो कांग्रेस और बाकी सहयोगी दलों का धैर्य टूट सकता है और भविष्य में तेजस्वी को सीएम चेहरा मानने से इनकार भी हो सकता है।

▶️ 5. एक बार चूके तो गेम खत्म?
तेजस्वी यादव अब बिहार की राजनीति में स्थापित चेहरा हैं। लेकिन जनता और गठबंधन दोनों की उम्मीदों का बोझ उनके कंधों पर है। अगर इस बार चुनाव हार गए, तो यह सवाल उठेगा कि क्या तेजस्वी कभी नीतीश कुमार को रिप्लेस कर भी पाएंगे या नहीं। राजनीति में मोमेंटम बहुत मायने रखता है और अगर यह छिन गया, तो दोबारा मिलना बेहद मुश्किल है।












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