क्या तेजस्वी यादव के बहिष्कार से रुक जाएगा बिहार विधानसभा चुनाव? जानें क्या कहता है संविधान

Tejashwi Yadav election boycott: बिहार की सियासत में एक बार फिर तूफान आया है। चुनावी मैदान सजने से पहले ही लोकतंत्र के सबसे बुनियादी स्तंभ - वोटर लिस्ट - पर घमासान छिड़ गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 56 लाख वोटर लिस्ट से 'लापता' हैं, और इसी आधार पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का काम चल रहा है। लेकिन यह आंकड़ा ही अब राजनीति की सबसे बड़ी जंग बन गया है।

तेजस्वी यादव और महागठबंधन इसे एक सुनियोजित 'वोट चोरी' करार दे रहे हैं। तेजस्वी ने साफ कहा, 'अगर ऐसी ही स्थिति रही, तो चुनाव का बहिष्कार करेंगे!' विपक्ष का यह रुख न सिर्फ राजनीतिक हलचल बढ़ा रहा है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रहा है कि अगर प्रमुख विपक्षी दल चुनाव से बाहर हो जाएं, तो क्या लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा? क्या ऐसे हालात में चुनाव टाले जा सकते हैं?आइए जानते हैं कि संविधान, चुनाव आयोग और देश का लोकतंत्र इस परिस्थिति को कैसे देखता है।

Tejashwi Yadav election boycott

तेजस्वी यादव ने क्या कहा?

बिहार विधानसभा के बाहर मीडिया से बात करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि, 'सबकुछ तय हो गया है, बेईमानी करना ही है, खुलाआम बेईमानी करना है, वोटर लिस्ट से लाखों का नाम काट देना है... जब बेईमानी ही करना है, तो हम लोग चुनाव का बॉयकॉट करने पर विचार कर सकते हैं।'

चुनाव आयोग और संविधान क्या कहते हैं?

तेजस्वी यादव और महागठबंधन द्वारा चुनाव बहिष्कार की चेतावनी के बाद सवाल उठता है कि, क्या वाकई किसी बड़े गठबंधन के बॉयकॉट से चुनाव टल सकते हैं? क्या लोकतंत्र रुक सकता है? इसका जवाब हमें भारतीय संविधान और चुनाव आयोग के अधिकारों में मिलता है।

अनुच्छेद 324 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह देशभर में स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव करवाए। इसका मतलब साफ है चाहे कोई राजनीतिक दल चुनाव लड़े या नहीं, चुनाव आयोग को तय समय पर चुनाव करवाना ही होगा। इस अधिकार में किसी भी प्रकार की राजनीतिक परिस्थितियां बाधा नहीं बन सकतीं।

अगर विपक्ष चुनाव नहीं लड़े तो क्या?

यह एक काल्पनिक स्थिति जरूर लग सकती है, लेकिन कानून इसके लिए भी पूरी तरह स्पष्ट है। अगर विपक्ष जैसे कि बिहार में महागठबंधन चुनाव लड़ने से इनकार कर दे, तो भी चुनाव रद्द नहीं किए जा सकते।

  • चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है चुनाव कराना, न कि यह देखना कि कितनी पार्टियां हिस्सा ले रही हैं।
  • अगर सिर्फ सत्ताधारी दल अपने उम्मीदवार खड़े करता है, या कुछ निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में होते हैं, तो भी चुनाव करवाया जाएगा।
  • और यदि किसी सीट पर केवल एक ही प्रत्याशी नामांकन करता है, तो वह निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा।

क्या चुनाव रद्द हो सकते हैं?

संविधान में चुनाव रद्द करने का प्रावधान केवल विशेष परिस्थितियों में है, जैसे-

  • गंभीर हिंसा
  • प्राकृतिक आपदा
  • या चुनाव प्रक्रिया में बड़ा व्यवधान
  • राजनीतिक बहिष्कार या किसी गठबंधन के चुनाव न लड़ने को चुनाव रद्द करने का आधार नहीं माना गया है।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने भी यह स्पष्ट किया है कि बहिष्कार से चुनाव प्रक्रिया की वैधता पर असर नहीं पड़ता, जब तक कि चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो।

क्या पहले कभी ऐसा हुआ है? जानिए चुनाव बहिष्कार के ऐतिहासिक उदाहरण

बिहार में अगर महागठबंधन सच में विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करता है, तो यह एक बड़ी राजनीतिक घटना होगी। लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार नहीं होगा, जब विपक्षी दलों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हों या चुनाव में भाग न लिया हो।
हालांकि ऐसा बहुत कम हुआ है कि सभी बड़े विपक्षी दल एकसाथ चुनाव छोड़ दें, फिर भी कुछ मिसालें बेहद अहम हैं

1989 - मिजोरम विधानसभा चुनाव

  • घटना: मिज़ो नेशनल फ्रंट (MNF) ने चुनाव का बहिष्कार किया।
  • वजह: MNF ने आरोप लगाया कि केंद्र और कांग्रेस की नीतियां राज्य की स्वायत्तता के खिलाफ हैं।
  • नतीजा: कांग्रेस ने बिना किसी बड़े विरोध के सभी 40 सीटों पर जीत हासिल की।
  • कानूनी चुनौती: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
  • फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया वैध रही और बहिष्कार को चुनाव रद्द करने का आधार नहीं माना जा सकता।

1999 - जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव

  • घटना: कई अलगाववादी संगठनों और कुछ विपक्षी दलों ने चुनाव का बहिष्कार किया।
  • वजह: केंद्र सरकार पर कश्मीरियों की आवाज़ दबाने का आरोप।
  • नतीजा: कम मतदान हुआ लेकिन चुनाव हुआ और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सरकार बनाई।
  • कानूनी पहलू: यह मामला कोर्ट में नहीं गया, लेकिन प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक मानी गई।

2014 - हरियाणा पंचायत चुनाव

  • घटना: कई विपक्षी दलों ने शैक्षणिक योग्यता और आय सीमा जैसे नियमों के विरोध में चुनाव का बहिष्कार किया।
  • नतीजा: चुनाव हुए, लेकिन वोटिंग प्रतिशत बेहद कम रहा।
  • चुनाव आयोग का रुख: चुनाव वैध और समय पर संपन्न कराए गए।
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