Bihar caste census: लालू-नीतीश के लिए उलटा न पड़ जाति जनगणना का दांव! ऐसे बदल सकते हैं समीकरण

Bihar Caste Census Latest News: बिहार में जाति जनगणना या जातिगत सर्वे के जो आंकड़े जारी किए गए हैं, उसे आम तौर पर इस चश्मे से देखा जा रहा है कि यह अगड़े और पिछड़े की राजनीति के लिए कुख्यात राज्य में विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक के लिए कितना फायदेमंद साबित होने वाला है।

लेकिन, अगर हम बिहार सरकार की ओर से कराए गए जातिगत सर्वे की पूरी रिपोर्ट का विश्लेषण करें तो इसके आंकड़े मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू यादव के लिए बहुत ही सुकून वाले नहीं कहे जा सकते। क्योंकि, इस रिपोर्ट में उनकी राजनीति के लिए कुछ बड़ी ही कमजोर कड़ियां भी जुड़ी हुई हैं।

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कहीं उलटा न पड़ जाए सियासी दांव!
बिहार में 1990 के दशक से लालू यादव की राजनीति के लिए यादव और मुसलमान कोर वोटर माने जाते रहे हैं। यह 'माय' समीकरण बहुत ही चर्चित रहा है और अभी भी आरजेडी का प्रमुख जनाधार माना जाता है। जातिगत जनगणना की रिपोर्ट के हिसाब से यादवों की आबादी बिहार में करीब 14% बताई गई है और मुसलमानों की जनसंख्या 17% से ज्यादा बताया गया है। इन दोनों को जोड़ दें तो यह जनसंख्या करीब 31-32% होती है।

कोइरी जाति की आबादी कुर्मी से काफी ज्यादा
अब सीएम नीतीश कुमार की राजनीति की बात करें तो उनके वोटरों का मूल आधार उनका लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) वोटर रहा है। जातिगत जनगणना के हिसाब से राज्य में कुर्मियों की जनसंख्या 2.8% है। वहीं कोइरी (कुशवाहा) जाति की आबादी 4.2% है। यानी यह राज्य में यादवों के बाद सबसे बड़ा वोट बैंक है। अभी तक इसके कोई स्पष्ट आंकड़े नहीं थे और कुशवाहा नेता नीतीश के पिछलग्गू बने हुए थे।

जबकि नीतीश खुद कुर्मी जाति से हैं। यानी उनकी राजनीति में अबतक का जो कोर वोटर रहा है वह 7% है। उसमें भी कोइरी की तुलना में कुर्मी करीब आधे ही हैं। तथ्य यह भी है कि कुछ बड़े कुशवाहा और कुर्मी नेता हाल में उनका साथ छोड़कर जा भी चुके हैं।

बिहार में सत्ता की 'चाबी' अब ईबीसी वोट बैंक के पास
अब अगर अत्यंत पिछड़ा (EBC) वर्ग के आबादी की बात करें तो यह 36% से भी ज्यादा हैं। यूं समझ लें कि इस जातिगत जनगणना के माध्यम से बिहार में सत्ता की चाबी अति पिछड़ों के हाथों में थमा दी गई है। यह अकेला वोट बैंक इतना विशाल है कि लालू के चट्टान जितने मजबूत माने जाने वाले जनाधार 'माय समीकरण' से काफी बड़ा है।

नीतीश कुमार के लिए सावधान करने वाला सर्वे!
खासकर नीतीश के लिए तो यह और भी सावधान करने वाला सर्वे साबित हो सकता है कि अत्यंत पिछड़ा वर्ग में शामिल कुछ जातियों की आबादी तो नीतीश कुमार की अपनी जाति के लगभग बराबर ही सामने आया है।

अब सवाल है कि अत्यंत पिछड़ा (EBC) वर्ग में शामिल जातियों की अगुवाई के लिए कौन नेता उभरता है। इन जातियों में कुछ तो पहले से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं और कुछ पिछले चुनावों से लाइम लाइट में आने लगे हैं।

जैसे कि मल्लाह (2.6%) और धानुकों (2.1%) ने अपने जनाधार वाले क्षेत्रों में अच्छी पकड़ बनाई है।

नई लिस्ट के हिसाब से राज्य में कानू (2.2%), बढ़ई (1.45%), तेली (2.81%), नाई (1.59%) जैसी जातियों की भी अच्छी-खासी आबादी है।

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