बिहार विधानसभा चुनाव: पहले चरण का चुनाव ही तय करेगा राजद का भविष्य

पहले चरण की 71 में से सबसे अधिक 25 सीटें राजद के पास हैं। इसलिए पहले चरण का चुनाव राजद की प्रतिष्ठा का सवाल है। प्रतिष्ठा की इस लड़ाई में उसके लिए सीट शेयरिंग का मसला गंभीर चुनौती बना हुआ है। राजद की कम से कम 7 सीटिंग सीटों प भाकपा माले ने दावा ठोक रखा है। इस झंझट के बीच राजद ने सिंबल बांटने शुरू भी कर दिये हैं। उसने 25 में से 17 सीटिंग विधायकों को सिंबल दे दिये हैं। क्या राजद गठबंधन निभाने के लिए अपनी जीती हुई सींटें छोड़ेगा ? पिछले चुनाव में राजद को इन सीटों पर तब जीत मिली थी नीतीश कुमार भी उनके साथ थे। अब चुनावी परिदृश्य बिल्कुल बदल गया है। नीतीश के कारण अब एनडीए का पलड़ा भारी दिखता है। अगर राजद का भाकपा माले या कांग्रेस से गठबंधन होता है भी तो सीटों को लेकर तकरार की पूरी गुंजाइश बनी हुई है। नामांकन की तारीख के दो दिन गुजर गये लेकिन अभी तक सीटें फाइनल नहीं होने से राजद परेशान है। वह इसलिए क्यों कि उसके सामने 25 सीटों को कायम रखने की चुनौती है। पहले चरण का चुनाव ही राजद का भविष्य तय करेगा।
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परिदृश्य बदलने से बदली स्थिति
पहले चरण की 71 सीटों में से 21 जदयू और 14 भाजपा के पास हैं। जदयू 21 सीटें तब जीता था जब वह महागठबंधन का हिस्सा था। 2020 में जदयू, भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ रहा है। इसलिए पहले चरण में अब एनडीए के पास 35 सीटें हो गयीं। अगर जीतन राम मांझी की एक सीट जोड़ दी जाए तो यह आंकड़ा 36 हो जाता है। इस लिहाज से एनडीए एक बड़ी ताकत के रूप में चुनौती पेश करेगा। नीतीश के महागठबंधन छोड़ने के बाद राजद पहले से प्रभावित है। अगर सीटों के लेकर उसकी कांग्रेस और माले से किचकिच जारी रही तो नुकसान की आशंका उसी को है। पहले चरण की 71 में से 8 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। अगर राजद का कांग्रेस से मनमुताबिक तालमेल हुआ तो दोनों का संयुक्त संख्या बल 33 हो जाएगा। अगर किन्ही कारणों से गठबंधन टूटता है या दबाव में तालमेल होता है तो नुकसान उठाना पड़ सकता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राजद और कांग्रेस के बीच बहुत हिल-हुज्जत के बाद सीटों का समझौता हुआ था। तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि राजद ने कम और कमजोर सीटें दे कर उसकी तौहीन की थी। आज भी ये सवाल दोनों के बीच दीवार बन कर खड़ा है।

माले का पेंच
भकपा माले के तीन विधायक हैं। पहले चरण में उसकी केवल एक सीट तरारी है। माले ने राजद की कम से कम 7 सीटिंग सीटों पर दावा ठोक कर उसका तनाव बढ़ा दिया है। भोजपुर , रोहतास, सीवान, नालंदा, पटना, कटिहार आदि जिलों में भाकपा माले का प्रभाव माना जाता है। माले ने एकतरफा जब 30 उम्मीदवारों की सूची जारी कर अलग राह पर जाने का एलान कर दिया तो राजद के नेता दबाव में आ गये। माले को मनाने के लिए राजद ने अपने दो महारथियों को मोर्चे पर लगाया। लालू यादव से सबसे विश्वस्त विधायक भोला यादव और सांसद मनोज झा को माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या के पास भेजा गया। सीटों पर उलझी गांठ को खोलने की कोशिश नकाम रही। तब राजद के दोनों नेताओं ने दीपांकर भट्टाचार्य को राबड़ी आवास पर वार्ता के लिए आमंत्रित किया। दीपांकर आये तो राबड़ी आवास पर तेजस्वी, भोला यादव, मनोज झा और अब्दुल बारी सिद्दी के बीच सीट बंटवारे पर बात हुई। फिलहाल माले को 15 सीटें देने की बात हुई लेकिन दीपांकर इससे खुश नहीं हैं। इन 15 में से माले ने उन सीटों पर दवा ठोक दिया है जो पहले कभी उसे जीत चुकी है। इस लिहाज से माले पहले चरण की हिलसा, जगदीशपुर, आरा, पालीगंज, मसौढ़ी, काराकाट और ओबरा सीट को अपना मानती है। उसने इन सीटों पर दावा ठोक भी दिया है। लेकिन राजद के लिए मुश्किल ये है कि अब इन सीटों पर उसका कब्जा है। माले के लिए क्या वह अपनी जीती हुई सीटें छोड़ेगा ? अगर राजद ने ये सीटें माले को नहीं दी तो क्या 15 सीटों के इस समझौते की कोई अहमियत रह जाएगी ?

जेएनयू छात्र संघ के पूर्व महासचिव के लिए पाली सीट !
जेएनयू छात्र संघ के पूर्व महासचिव और आइसा के राष्ट्रीय महासचिव संदीप सौरभ को भी बिहार चुनाव में उतारने की तैयारी चल रही है। भाकपा माले उन्हें पालीगंज विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाने के बारे में सोच रही है। इसलिए माले ने राजद से पालीगंज की सीट मांगी है। पालीगंज सीट पर 2015 में राजद के जयवर्धन यादव जीते थे। हाल ही में जयवर्धन पाला बदल कर जदयू में चले गये हैं। माले का तर्क है कि संदीप सौरभ विधानसभा में विपक्ष का बड़ा चेहरा बन सकते हैं। सो राजद को बड़ा दिल दिखा कर ये सीट उसे देनी चाहिए। राजद यहां से कोई नया उम्मीदवार दे इससे अच्छा है कि संदीप सौरभ को संयुक्त उम्मीदवार बनाया जाए। कांग्रेस और माले की मांगों के बीच राजद फिलहाल असमंजस के भंवर में फंसा हुआ है।












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