Bihar Assembly Election:1990 से 2020 तक, बिहार की सेक्युलर पार्टियों ने मुस्लिमों को कितना प्रतिनिधित्व दिया?
Bihar Assembly Election 2025: बिहार में अल्पसंख्यक वोट खासकर मुस्लिम समुदाय का वोट, हमेशा से चुनावी नतीजों पर असर डालता रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सेक्युलर कहे जाने वाली पार्टियों ने इस समुदाय को विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया?
आज हम आपके सामने ला रहे हैं 1990 से 2020 तक का एक विस्तृत विश्लेषण - जिसमें कांग्रेस, आरजेडी, सीपीआई और सीपीआई-एमएल जैसे दलों द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए गए टिकटों का प्रतिशत शामिल है। समझिए क्या है मौजूदा सियासी समीकरण?

1990 से 2000 तक का दौर: 1990, जब बिहार में कुल 324 सीटें थीं, कांग्रेस और जनता दल (बाद में RJD) ने 10-15% टिकट मुस्लिमों को दिए। CPI ने लगभग 6.6% टिकट दिए। CPI‑ML (लिबरेशन) ने बहुत कम, लगभग 1-2% टिकट ही दिए। 1995 में भी यही रुझान जारी रहा, हालांकि सटीक आंकड़े बहुत अस्पष्ट हैं।
2000 में सीटें घटकर 243 हुईं: भारतीय संसद ने झारखंड पुनर्गठन अधिनियम, 2000 (Bihar Reorganisation Act, 2000) पारित किया, जिसके तहत झारखंड को बिहार से अलग कर नया राज्य घोषित किया गया। 2000 में सीटें घटकर 243 हो गईं, कांग्रेस ने 10-15% और RJD ने 10% टिकट मुस्लिमों को दिए। CPI ने 7-8% और CPI‑ML ने 3-5% टिकट मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए।
2005-2015 सेक्युलर राजनीति में बदलाव: 2005 में कांग्रेस ने 23.5% मुस्लिम उम्मीदवार उतारे जो कि अब तक का सबसे अधिक प्रतिशत था। RJD ने 14.9%, CPI ने 5.7% और CPI‑ML ने 3.5% मुस्लिमों को टिकट दिए। 2010 में कांग्रेस 19% मुस्लिमों को टिकट दिया, RJD ने 10%, CPI और CPM ने 7-8% टिकट मुस्लिमों को दिए।
2015 महागठबंधन के दौर में RJD ने 10% और कांग्रेस ने 6-7% मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। CPI और CPI‑ML ने लगभग 7-9% के बीच टिकट मुस्लिम समुदाय को दिए। 2020 में प्रतिनिधित्व गिरा RJD ने सिर्फ 17 मुस्लिम उम्मीदवार, यानी 7.0% टिकट दिए। कांग्रेस ने 10 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, यानी 4.1%, CPI‑ML (लिबरेशन) ने सिर्फ 1 टिकट (0.4%), CPI ने भी सिर्फ 1 को ही टिकट दिया।
प्रतिनिधित्व देने का प्रतिशत घटा: सियासी जानकारों का कहना है कि बिहार की सेक्युलर पार्टियों ने भले ही अल्पसंख्यक वोट की राजनीति की हो, लेकिन मुस्लिम समुदाय को प्रतिनिधित्व देने का प्रतिशत धीरे-धीरे घटता दिख रहा है। 2020 तक आते-आते, वो पार्टियाँ जो कभी 15-20% टिकट देती थीं, अब 5-7% पर आ गई हैं। 2025 के चुनाव में भी उम्मीद के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना कम है।
एक्सपर्ट्स क्या मानते हैं?: प्रशांत किशोर के साथ काम कर चुके चुनावी रणनीतिकार बद्रीनाथ ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को भाजपा का डर दिखाकर महागठबंधन एक तो कर लेती है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व का सवाल आता है तो झुनझुना थमा दिया जाता है। हाल के कुछ सियासी कार्यक्रमों से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।
मुस्लिम नेताओं को नहीं मिला मंच: पटना में राहुल गांधी के साथ तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी को जगह दी गई। बिहार में अल्पसंख्यक और मुस्लिमों के कई बड़े चेहरे थे, उन्हें साथ आने नहीं दिया गया। तेजस्वी यादव के साथ मुकेश सहनी मंच साझा करते हैं और खुद को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार बताते हैं। जबकि मुस्लिम मतदाता उससे कहीं ज़्यादा हैं।
मुस्लिम समुदाय को तरजीह नहीं: मुकेश सहनी से बड़ा चेहरा, पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के पुत्र ओसामा हैं। मुस्लिम को डिप्टी सीएम क्यों नहीं बना सकते। अभी दो डिप्टी सीएम है, वैसे ही तेजस्वी ऐलान करे कि महागठबंधन की सरकार बने तो दो डिप्टी सीएम होंगे, जिसमें से एक मुस्लिम समुदाय का भी होगा।
ओवैसी से गठबंधन क्यों नहीं?: ओसामा जैसे मुस्लिम नेताओं के साथ मंच तक साझा नहीं करते। ओवैसी की पार्टी को तेजस्वी महागठबंधन में इसलिए शामिल नहीं कर रहें, क्योंकि मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व मज़बूत हो जाएगा। मुस्लिम समुदाय सत्ता में भागीदारी मांगेगा, जो कि राजद नहीं चाहती। तेजस्वी यादव चाहते हैं कि सिर्फ मुस्लिम सिर्फ उनकी गुलामी करे, भागीदारी नहीं मांगे।
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