जानिए क्या उमा भारती की सक्रिय राजनीति में होगी धमाकेदार वापसी, गोडसे पर बयान से मचा बवाल
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की फायरब्रांड नेता उमा भारती एक बार फिर सक्रिय राजनीति में जोरदार वापसी करने जा रही हैं। लंबे समय से स्वास्थ्य कारणों और सीमित सार्वजनिक उपस्थिति के बाद, उमा भारती अब अपने बयानों और सक्रियता से फिर सुर्खियों में हैं।
इस बार उन्होंने जो टिप्पणी की है, वह बीजेपी के भीतर गहरी हलचल पैदा कर सकती है-क्योंकि यह बयान सीधे-सीधे नाथूराम गोडसे पर है।

अटल के बाद पहली बार इतना बड़ा हमला
भारतीय राजनीति में गोडसे का नाम हमेशा विवादों के केंद्र में रहा है, लेकिन बीजेपी के नेता आमतौर पर इस मुद्दे पर दो टूक बोलने से बचते रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के समय के बाद, यह पहली बार है जब किसी वरिष्ठ बीजेपी नेता ने पार्टी के भीतर रहकर गोडसे पर इतना सख्त रुख अपनाया है। उमा भारती ने बिना किसी झिझक के कहा- "गोडसे महात्मा गांधी के हत्यारे थे और यह किसी भी तरह से राष्ट्रवाद नहीं है। जो लोग गोडसे को सही ठहराते हैं, वे गांधी और भारत की आत्मा, दोनों का अपमान करते हैं।"
बीजेपी के अंदर का कंफ्यूजन
गोडसे पर बीजेपी की आधिकारिक लाइन हमेशा अस्पष्ट रही है। एक ओर पार्टी गांधीजी को राष्ट्रपिता मानती है, तो दूसरी ओर पार्टी के भीतर और उससे जुड़े कुछ संगठनों में गोडसे को 'राष्ट्रवादी' कहने वाले स्वर भी सुनाई देते हैं। इसका ताज़ा उदाहरण तब मिला था जब भोपाल से बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने लोकसभा में कहा था- "नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, हैं और रहेंगे।" इस बयान ने पार्टी को असहज कर दिया था, और बाद में सफाई देने की नौबत आई थी।
उमा का सख्त रुख - 'राष्ट्रवाद का मतलब हत्या नहीं'
उमा भारती का कहना है कि अगर कोई राष्ट्रवाद के नाम पर हत्या को जायज ठहराता है, तो वह असली राष्ट्रवाद नहीं बल्कि हिंसा की मानसिकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि गांधीजी की हत्या भारत के लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर हमला थी, और इसे किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता।
राजनीतिक समीकरण में बदलाव की आहट
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उमा भारती का यह बयान केवल विचारधारा पर टिप्पणी नहीं, बल्कि आने वाले समय में उनकी सक्रिय भूमिका का संकेत भी है। बीजेपी के भीतर गांधी बनाम गोडसे की बहस लंबे समय से दबे स्वर में चलती रही है, लेकिन उमा के इस रुख से यह बहस अब खुले मंच पर आ सकती है।
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले और 2029 के आम चुनाव की तैयारी के दौर में यह बयान पार्टी की रणनीति और आंतरिक समीकरण दोनों को प्रभावित कर सकता है।
उमा की वापसी के मायने
- वह लंबे समय से राजनीतिक परिदृश्य में कम सक्रिय थीं, अब बड़े मुद्दों पर मुखर हो रही हैं।
- गोडसे जैसे संवेदनशील विषय पर उनका बयान बीजेपी की 'असहज चुप्पी' को चुनौती देता है।
- इससे उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर फायरब्रांड हिंदुत्व और स्पष्टवादिता की छवि दिलाने का मौका मिलेगा।
आगे क्या?
अगर उमा भारती इसी तरह के बेबाक बयानों और सक्रिय जनसंपर्क कार्यक्रमों को जारी रखती हैं, तो यह उनकी राजनीतिक वापसी का रोडमैप बन सकता है। वहीं, गोडसे पर उनके बयान से बीजेपी को अपने स्टैंड को और स्पष्ट करने का दबाव भी बढ़ सकता है।












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