मध्‍य प्रदेश में भय, भूख और अंधेरे को वनवास

Shivraj
[भारत चंद्र नायक] अनेक राज्य और उनकी सरकारें मध्यप्रदेश में उठाये गये कुछ क्रांतिकारी कदमों से भौचक हैं। दिल्ली समेत अन्य राज्य बिजली कटौती को समस्या का समाधान मान रहे हैं, मध्यप्रदेश के 52 हजार गांव निशियाम बिजली से जगमगा रहे हैं। खाध सुरक्षा कानून के अमल के लिए जहां राज्यों में तैयारियां शुरू हो रही है मध्यप्रदेश में बीपीएल, गैर आयकर दाता, अनुसूचित जाति, जनजाति परिवारों और मेहनतकशों के लिए 1 रूपया किलों और 2 रू. किलों चावल, गोया एक दिन की मजदूरी में माह भर का राशन जिन्दगी में सकून दे चुका है।

रोटी, कपड़ा, मकान अब बेबसी नहीं रही। क्योंकि एक दिन की मजदूरी में राशन और शेष 29 दिन की मजदूरी अन्य जरूरियात पूरा करने के लिए पर्याप्त बन चुकी है। मध्यप्रदेश में अजब-गजब राहत है और हकीकत भी हो चुकी है। भारत कभी भी मजहबी मुल्क या साम्प्रदायिक राज्य नहीं रहा। राजतंत्रों में भी लोकतंत्र की भावना रही है।

अलबत्ता विदेशी शासन मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में कौम में भेदभाव का अंकुर पैदा किया गया। तब देश धर्म निरपेक्ष होने का दावा नहीं कर सका। लेकिन आजादी के बाद धर्म निरपेक्षता की भावना संविधान में समाहित हुर्इ। लेकिन वैचारिक प्रतिबद्धता जो राजनीति का प्रेरक तत्व होता है के अभाव में गड़बड़ी उत्पन्न हुर्इ। वस्तुत: कांग्रेस का उदय जिन सर हयूम के प्रयासों से हुआ उसका उददेश्य सीमित था। भारतीय जनसंघ का अभ्युदय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रेरणा शकित को लेकर हुआ।

आजादी के बाद कमोवेश पांच दशकों तक राज्यों और केन्द्र में कांग्रेस की सरकारें रही। प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उन्होनें विकास का माडल आयातित किया। लेकिन बुनियादी आवष्यकताएं उपेक्षित रही है। यह प्रतिबद्धता मप्र में पूर्ण हुर्इ है। इसका श्रेय आज यदि देश की भारतीय जनता पार्टी के अवतार वाली सरकारों के नाम दर्ज हो रहा हैं तो इसे स्पष्ट रूप से वैचारिक प्रतिबद्धता की परिणति कहा जायेगा।

2003 में मध्‍य प्रदेश की तस्‍वीर

मध्यप्रदेश में 2003 में राजनैतिक परिवर्तन की इबारत जब प्रदेश की जनता ने लिखी बदहाली का आलम था। बिजली, सड़क, पानी सभी क्षेत्रों में जनता परेषान थी। ओव्हर ड्राफ्ट विरासत में मिला। प्रदेश सरकार की बागडोर उमाश्री भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान ने संभाली, जिसे शिवराज सिंह चौहान ने स्थायित्व प्रदान किया और परिवार भाव से प्रदेश की बागडोर संभालकर जन-जन से रागात्मक संबंध बनाकर लोकप्रियता का क्षितिज छू लिया।

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी के षिखर पुरूष पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन के ध्वजवाहक के रूप में शिवराज सिंह चौहान जनता के हर तबके तक संवाद करते पहुंचें। पंचायतों के जरिये उन्होनें किसानों, मजदूरों, महिलाओं, सेवाकर्मियों सभी को जन-जन की, जनता द्वारा और जनता के लिए सरकार की अनुभूति दी। मध्यप्रदेश इन 10 वर्षो में जहां देशी, विदेशी निवेषकों को गंतव्य बना वहीं प्रदेश की आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण होने से प्रदेश में कृषि और उधोगों में संतुलन आने के साथ क्षेत्रीय विकास के असंतुलन में संतुलन कायम किया गया है।

शिवराज सिंह चौहान ने अपने कृतित्व और व्यकितत्व से साबित किया कि भले ही पांच दषकों तक राजनैतिक दल वादों और नारों पर सवार होकर सत्ता में पहुंचे हो, भारतीय जनता पार्टी जनता का दुख-दैन्य, निरक्षरता, रोग-व्याधि और अभावों को दूर करके ही चैन लेगी। प्रदेश में खेती को लाभ का धंधा बनानें का अभियान एक सच्चार्इ बना। जहां किसान को 16 प्रतिषत ब्याज पर कर्ज देकर जीवन पर्यन्त ऋणग्रस्तता के बोझ से लाद दिया जाता था।

राजनीति का शुभारम्‍भ मिशन के रूप में

राज्य सरकार ने ब्याज की दरें घटाकर जीरों प्रतिषत ब्याज पर किसानों को एक वर्ष में बारह हजार करोड़ रू. का कर्ज दिलाया और क्रेडिट कार्ड देकर उनको सम्मानित किया। बदले निजाम में पार्टी ने अपने जनप्रतिनिधियों को सत्ता की बुरार्इयों से दूर रहने के लिए प्रषिक्षण की चरणवार व्यवस्था की और स्पष्ट किया कि आजादी के बाद राजनीति का शुभारंभ सेवा के मिशन के रूप में हुआ था। जिसका क्षरण हुआ है लेकिन भाजपा को इसका अपवाद साबित होना। अन्य दलों को जहां संसदीय लोकतंत्र का मतलब सत्ता पर काबिज होना है। भारतीय जनता पार्टी के लिये यह खालिष सामाजिक परिवर्तन और सेवा धर्म है। तात्कालिक रूप से इसका प्रभाव भी दृषिटगोचर हुआ।

मध्यप्रदेश में आयी खुषहाली में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की क्रांतिकारिता प्रेरकशकित बनी। जिससे व्यवस्था जनोन्मुखी बनकर जन-जन की जिन्दगी को सकून देने में सफल हुर्इ। जनदर्षन, लोककल्याण षिविर, राज्य स्तर पर आनलार्इन समाधान, जिला कार्यालयों में समाधान, सुराज मिषन, जनसुनवार्इ कार्यक्रम ने जहां लोकजीवन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का अहसास कराया वहीं सरकारी योजनाएं आम आदमी पर केनिद्रत हुर्इ। आदिवासियों पर चल रहे मुकदमें वापस लेकर उन्हें सम्मान का अहसास कराया गया तो महिलाओं को स्थानीय निकायों में 50 प्रतिषत आरक्षण देकर संसद और विधानसभा में महिला आरक्षण की दिशा में पार्टी की प्रतिबद्धता का सबूत दिया गया।

सरकार ने अपनी सात प्रतिबद्धताओं पर ध्यान केनिद्रत कर प्रदेश में सुखद आमूलचूल परिवर्तन की इबारत लिखी। इनमें खेती को लाभ का धंधा बनानें के साथ षिक्षा का सृदृढ़ीकरण, स्वास्थ और अधोसरंचना विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर जन-जन को अहसास कराया गया कि आने वाले पांच वर्षों में मध्यप्रदेश देश का स्वर्णिम राज्य बनेगा।

प्रदेश में विकास दर को मार्इनस चार (-4) से आगे बढ़ाकर प्लस दस प्रतिशत (+10) से ऊंचा किया गया। कृषि विकास दर को 3 प्रतिषत से 18.89 प्रतिषत किया गया जिससे कृषि के क्षेत्र में विपुलता का नया युग आरंभ हुआ। किसानों में खुषहाली आयी। राज्य को देश का कृषि कर्मण सम्मान मिला, जिसके साक्षी महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को बनने का गौरव प्राप्त हुआ। पच्चीस हजार करोड़ रू. की लागत से प्रदेश में बिजली की 24 घंटे 52 हजार गांवो में पूर्ति का सपना साकार कर प्रदेश को अधंकार से मुकित दिलायी गयी। इसे प्रदेश में उत्पादन क्षमता के बढ़ाने के नये क्षितिज खुले है।

भाजपा सरकार की कथनी और करनी में साम्य हकीकत बनी

2003 में भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की जनता के सामने जो प्रतिबद्धताएं चिनिहत की थी उन्हें गिन-गिन कर पूरा हीं नहीं किया गया अपितु एक संस्कारित पीढ़ी को संवारने, प्रदेश में धर्म निरपेक्षता, समभाव को हकीकत में बदलकर दिखा दिया गया। लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। एक ही मंडप के नीचे जहां मध्यप्रदेश के पुरोहित कन्यादान कराते है वहीं मौलवी निकाह की रष्में निभातें है।

सभी को न्याय और अवसर तुषिटकरण किसी का नहीं। किसान के खाद की केन्द्र ने 527 की बोरी की कीमत बढ़ाकर 1272 रू. कर दी, वहीं मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने प्रति किवंटल समर्थन मूल्य पर 150 रू. विशेष बोनस देकर किसान की जेब में पैसा डाला। राज्य सरकार ने एफडीआर्इ को प्रदेश में प्रवेष नहीं दिया। जबकि केन्द्र सरकार ने कारपोरेट जगत को वायदा बाजार पर लगने वाली कमोडिटी ट्रांजेक्षन टैक्स समाप्त कर कारपोरेट परस्ती का सबूत देकर एक झटके में सात हजार करोड़ रू. का तोहफा दे दिया। किसान समुदाय की तुलना में कारपोरेट परस्ती का इससे बड़ा सबूत क्या होगा। वायदा बाजार ने खाधान्न की मंहगायी में पंख लगा दिये है।

खाधान्न जिन्सों को वायदा बाजार से बाहर करने की मांग भाजपा दोहरा रही है। प्रदेश का बजट 2003 में 21647 करोड़ रू. था उसे 2013 में 1 लाख 02 हजार 447 करोड़ रू. कर दिया। इसकी परिणति यह हुर्इ कि आयोजना व्यय 5684 करोड़ रू. से बढ़कर 37608 करोड़ रू. हो गया। सिंचार्इ का क्षेत्र 7.5 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 25 लाख हैक्टेयर हो गया। हर खेत को पानी की प्रतिबद्धता की दिषा में कदम बढ़े।

मध्यप्रदेश में बिजली उत्पादन 4673 मेगावाट से बढ़कर 10655 मेगावाट हो गया और प्रदेश के सभी 52 हजार गांव निषियाम आलोकित हो गये। जिससे काम के घंटे बढ़ गये। घर-घर में कुटीर उधोगों का सपना साकार हो रहा है। प्रदेश के हर गांव को पक्की सड़कों से जोड़ा जा रहा है। सड़कों की आजादी के बाद प्रदेश में कुल लंबार्इ 44787 किलोमीटर थी वह बढ़कर 95 हजार किलोमीटर हो गयी। गांव मंडियो और शहरों से जुड़ने से ग्रामीण विकास का ख्वाब पूरा हो रहा है।

समाज का अंतिम व्यकित शिवराज सिंह सरकार के लिए सबसे पहले

मध्यप्रदेश में आदिवासियों की 18 प्रतिषत आबादी को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों का ही नतीजा है कि देश में सर्वाधिक लाभ वनाधिकार अधिनियम का यहां मिला है। एक लाख बयासी हजार वनवासियों को भूमि स्वामित्व का गौरव प्राप्त हुआ। प्रदेश के आदिम जाति के परिवारों की तरक्की के लिए बैगा प्राधिकरण, भारिया विकास प्राधिकरण और सेहरिया विकास प्राधिकरण गठित किये गये है जो इनके जीवन को संवारने में जुटे है।

आजादी के बाद जिन विमुक्त जातियों, बंजारा और अन्य की जिन्दगी में सूनापन था उन्हें मध्यप्रदेश में ठौर मिला और उनके जीवन स्तर भी बेहतरी के लिए विकास प्राधिकरण के अलावा प्रथक मंत्रालय गठित किया गया जिसका प्रभार स्वंय शिवराज सिंह चौहान संभाल कर उनके जीवन में खुषहाली ला रहे है। आदिवासी छात्रों को हर वर्ष उच्च षिक्षा के लिए विदेश भेजने के कार्यक्रम ने वनवासियों में महत्वाकांक्षाएं जगायी है और वे उन्नत जीवन की तलाष में जुट गये है। आदिवासी उपयोजना और अनुसूचित जाति उपयोजना के बजट में की गयी आठ गुना वृद्धि सरकार की मंषा को उजागर करती है। टंटया भील स्वरोजगार योजना बेजोड़ उपाय साबित हुर्इ है।

वो कहते कागद की लेखी, हम कहते आंखन की देखी

लोकतंत्र में असहमति प्राण तत्व है। लेकिन साक्ष्य होने पर सहमति संजीवनी है। ऐसे में सत्ता और विपक्ष सभी को मध्यप्रदेश के बढ़ते कदमों की चाप को अनसुनी करने का कारण नहीं है। मध्यप्रदेश की राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुर्इ है और प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता को सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ है। मध्यप्रदेश लोकसेवा गारंटी कानून को संयुक्त राष्ट्र का लोक सेवा अवार्ड मिला है। र्इ-गवर्नेंस अवार्ड, कृषि कर्मण अवार्ड, विकास प्रकि्रया जन सहभागिता के लिए यूएनडीपी और योजना आयोग का पुरस्कार प्रदेश के हर नागरिक को गौरवानिवत करता है। आम आदमी राज्य सरकार की गतिविधियों की धुरी बन चुका है और उसकी आय भी 13095 रू. से बढ़कर 43080 रू. अंकित हो चुकी है।

महिला सशक्तिकरण अब नारा नहीं बल्कि हकीकत हो चुकी है। उनके विरूद्ध अत्याचार पर नियंत्रण के लिए विषेशकानून बना है जिसके तहत अभियोजन से लेकर न्यायदान का कालखंड निर्धारित कर कड़ी सजा दी जा रही है। इसी तरह भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिषा में बने कानून में कदाचरण कर संपतित अर्जित करने वाले कर्मी की संपतित राजसात कर उसे दंडित करने की उल्लेखनीय पहल हुर्इ है। ऐसे मामलों में जो निर्णय हुआ है वह प्रदेश में नजीर मानी जा रही है। राजमार्ग से बढ़कर गांव की पगडंडियों में खुषहाली के दर्षन हुए है जो इंगित करता है कि स्वर्णिम मध्यप्रदेश की दिषा में डग बढ़ चुके है।

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