MP Promotion Reservation: 6 जनवरी तक टली सुनवाई, क्या रद्द होंगे 2025 नियम? कर्मचारियों के डिमोशन पर सस्पेंस
MP Promotion Reservation: मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण का विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। जबलपुर हाईकोर्ट में मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम-2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हाल ही में सुनवाई हुई।
लंबी बहस के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने के लिए 6 जनवरी 2026 तक का समय दिया है। इस बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नए नियम रद्द होते हैं, तो क्या पहले से प्रमोट हो चुके कर्मचारियों का डिमोशन (पदावनति) हो सकता है?

करीब 10 साल से पदोन्नतियां रुकी होने के कारण हजारों कर्मचारी प्रभावित हैं। कई अधिकारी-कर्मचारी तो बिना प्रमोशन के ही सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। ऐसे में यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि मानवीय और प्रशासनिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील बन गया है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ: सरकार ने रखा पक्ष, याचिकाकर्ताओं को मिला समय
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई। याचिकाएं स्वाति तिवारी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर की गई हैं, जिनमें 2025 के नए पदोन्नति नियमों को असंवैधानिक बताया गया है।
राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार ने नए नियम सुप्रीम कोर्ट के जर्नैल सिंह प्रकरण और अन्य दिशा-निर्देशों के अनुरूप बनाए हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने क्वांटिफायबल डेटा (मात्रात्मक आंकड़ों) का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि कई सेवाओं में अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है।
सरकार का तर्क था कि यदि नए नियम लागू नहीं होते हैं, तो पिछले 10 वर्षों से पदोन्नति न होने का नुकसान कर्मचारियों को लगातार झेलना पड़ेगा।
वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने कहा कि 2002 के नियमों को जिस आधार पर हाईकोर्ट ने 2016 में रद्द किया था, नए नियम भी उसी तरह के हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो सरकार को नए नियम लागू करने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने अपना पक्ष विस्तार से रखने के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 6 जनवरी 2026 तय की।
डिमोशन का खतरा: कर्मचारियों में सबसे बड़ी चिंता
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू डिमोशन की आशंका है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि 2025 के नियमों को अदालत रद्द कर देती है, तो इनके तहत जिन कर्मचारियों को पदोन्नति मिली है, उन्हें वापस निचले पद पर भेजा जा सकता है।
इससे खासकर सामान्य वर्ग के कर्मचारियों में चिंता का माहौल है, जबकि दूसरी ओर एससी/एसटी वर्ग के कर्मचारी प्रमोशन की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
सरकार हालांकि इस आशंका को निराधार बता रही है। सरकार का कहना है कि नए नियम पूरी तरह वैध हैं और डिमोशन की स्थिति नहीं आएगी। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित पुराने मामले के बावजूद, राज्य सरकार ने नियम बनाकर कर्मचारियों को राहत देने की कोशिश की है।
2016 से रुकी पदोन्नतियां: विवाद की पूरी पृष्ठभूमि
- 2002: मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े नियम लागू।
- 2016: हाईकोर्ट ने आरबी राय केस में 2002 के नियम रद्द कर दिए।
- इसके बाद प्रदेश में अधिकांश सेवाओं में प्रमोशन पर रोक लग गई।
- राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां यथास्थिति बनी रही।
- 2025: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर नए पदोन्नति नियम बनाए।
- इन नियमों को सामान्य वर्ग के संगठनों ने फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी।
इन 10 वर्षों में लाखों कर्मचारी पदोन्नति से वंचित रहे। कई अधिकारी बिना प्रमोशन के ही रिटायर हो गए, जिससे प्रशासनिक ढांचे पर भी असर पड़ा।
दोनों पक्षों के तर्क आमने-सामने
सरकार का कहना है। नए नियम सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुरूप हैं। सेवाओं में एससी/एसटी का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। विस्तृत डेटा कलेक्शन के बाद नियम बनाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क
नए नियम पुराने 2002 के नियमों जैसे ही हैं। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक नए नियम लागू न किए जाएं। डिमोशन का खतरा कर्मचारियों के अधिकारों का हनन है।
कर्मचारियों पर असर: उम्मीद और चिंता साथ-साथ
इस पूरे विवाद ने कर्मचारियों को दो हिस्सों में बांट दिया है। यदि नियम लागू रहते हैं, तो हजारों कर्मचारियों को प्रमोशन मिल सकता है, जिससे खासकर एससी/एसटी वर्ग को लाभ होगा। यदि नियम रद्द होते हैं, तो डिमोशन की आशंका और प्रमोशन पर फिर लंबा ब्रेक लग सकता है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वे इस मामले में जल्द और स्थायी समाधान चाहते हैं, ताकि वर्षों से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हो सके।
अब सबकी निगाहें 6 जनवरी 2026 पर टिकी हैं, जब हाईकोर्ट में अगली सुनवाई होगी। उसी दिन यह साफ होने की उम्मीद है कि मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण का भविष्य किस दिशा में जाएगा और कर्मचारियों की यह लंबी प्रतीक्षा कब खत्म होगी।












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