Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

MP News: लाखों कर्मचारियों को कब मिलेगा प्रमोशन? पदोन्नति में आरक्षण का मामला जल्द सुलझेगा!, जानिए पूरी कहानी

MP employees News: मध्य प्रदेश के लाखों कर्मचारी पिछले नौ साल से पदोन्नति (प्रमोशन) का इंतजार कर रहे हैं। हर बार उम्मीदें बंधती हैं कि अब कुछ फैसला होगा, लेकिन नतीजा वही - तारीख पर तारीख, सुनवाई पर सुनवाई। हाईकोर्ट में लंबित यह मामला अब कर्मचारियों की सहनशक्ति की परीक्षा बन चुका है।

मामला क्यों अटका?

दरअसल, यह पूरा विवाद पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in Promotion) से जुड़ा है। साल 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार ने वोट-बैंक की राजनीति के दबाव में पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया। लेकिन बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

MP employees Lakhs of MP employees will get promotion reservation issue will be resolved soon Know more

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा था कि पदोन्नति में आरक्षण तभी लागू हो सकता है, जब सरकार ठोस आंकड़े और सबूत पेश करे कि पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व कम है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट की इस गाइडलाइन को मानते हुए पदोन्नति में आरक्षण समाप्त कर दिया। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस पर स्पष्ट फैसला नहीं लिया।

सरकार का रवैया सवालों के घेरे में

  • कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि राज्य सरकार मामले को जानबूझकर लटकाए हुए है।
  • कोर्ट में बार-बार दलीलें दी जा रही हैं।
  • करोड़ों रुपये वकीलों और केस पर खर्च किए जा रहे हैं।
  • लेकिन कर्मचारियों के भविष्य और हितों पर सरकार गंभीर नहीं है।
  • कर्मचारियों का कहना है कि पिछले 9 साल में हजारों लोग रिटायर हो गए, लेकिन उन्हें उनका हक - प्रमोशन - नहीं मिला। अब अगली तारीख 25 सितंबर को तय की गई है।

कर्मचारी बनाम राजनीति

  • इस पूरे मामले ने अब कर्मचारियों को निराश और आक्रोशित कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि-
  • जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्पष्ट गाइडलाइन दे दी है तो राज्य सरकार क्यों टालमटोल कर रही है?
  • क्या सचमुच कर्मचारियों की चिंता करने से ज्यादा सरकार को राजनीतिक समीकरण साधना जरूरी है?
  • कर्मचारी नेताओं का कहना है कि मध्य प्रदेश ही देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां इतने लंबे समय से प्रमोशन पर रोक लगी हुई है। यह स्थिति अब कर्मचारियों की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक समस्याओं को और गहरा कर रही है।

आगे क्या?

  • अब सबकी निगाहें 25 सितंबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। लेकिन सवाल यह है कि -
  • क्या हाईकोर्ट इस बार कोई ठोस फैसला देगा?
  • या फिर कर्मचारियों को एक बार फिर "तारीख पर तारीख" ही मिलेगी?

अब पूरा मामला विस्तार से समझे, 9 साल की लंबी प्रतीक्षा

मध्य प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए पदोन्नति का इंतजार अब 9 साल का हो चुका है। 2016 से रुकी हुई यह प्रक्रिया न केवल उनके आर्थिक नुकसान का कारण बनी है, बल्कि मानसिक तनाव और असंतोष को भी जन्म दे रही है। राज्य सरकार ने जून 2025 में 'मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025' नाम से नई नीति को मंजूरी दी, जिसमें अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 16% और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 20% आरक्षण का प्रावधान किया गया। लेकिन यह नीति हाईकोर्ट में चुनौती के बाद फिलहाल स्थगित है। 16 सितंबर 2025 को होने वाली सुनवाई में भी कोई फैसला नहीं हुआ, और अब अगली तारीख 25 सितंबर को तय की गई है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सरकार राजनीतिक फायदे के चक्कर में कर्मचारियों के हितों की अनदेखी कर रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला साल दर साल खिंचता जा रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जून में कैबिनेट बैठक के बाद कहा था कि यह नई नीति सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है, और इससे 2 लाख नए पदों पर भर्ती का रास्ता खुलेगा। लेकिन हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब पुरानी 2002 की नीति सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो नई नीति क्यों लाई गई? कोर्ट ने सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें पुरानी और नई नीति के बीच अंतर स्पष्ट करना होगा। इस देरी से न केवल प्रमोशन रुके हैं, बल्कि 1 लाख से अधिक कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी पदोन्नति के बिना ही चले गए, हालांकि उन्हें समयबद्ध वेतनमान का लाभ मिला।

विवाद की जड़: 2002 के नियम और सुप्रीम कोर्ट का स्टे

यह विवाद 2002 से शुरू होता है, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के नेतृत्व में दिग्विजय सिंह ने 'मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2002' लागू किया। इसमें एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण दिया गया, जो वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित था। सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि इससे उनके प्रमोशन में देरी हो रही है, जबकि आरक्षित वर्ग को जल्दी फायदा मिल रहा है। 2016 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सामान्य वर्ग के एसोसिएशन सपाक्स (सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ) की याचिका पर सुनवाई करते हुए 2002 के नियमों को असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण के लिए राज्य को पिछड़ापन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़े साबित करने होंगे, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज केस (2006) में निर्देशित है।

सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां स्टे मिल गया। सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, जिससे सभी प्रमोशन रुक गए। मामला मई 2016 से लंबित है, और हालिया अपडेट्स के अनुसार, मार्च 2025 से सुनवाई शुरू हुई, लेकिन अप्रैल तक फैसला आने की उम्मीद टूट गई। सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई और जनरल सिंह के केस में प्रमोशन में आरक्षण को सीमित किया था, और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने इसे लागू कर आरक्षण समाप्त कर दिया। लेकिन मध्य प्रदेश में राजनीतिक दबाव के कारण सरकार 'न गले उतर रहा, न उगल पा रही' स्थिति में फंसी हुई है।

लाखों परिवारों पर असर, अर्थव्यवस्था को झटका

इस देरी से 3 लाख से अधिक कर्मचारी प्रभावित हैं। विभागों में रिक्त पदों पर भर्ती रुकी है, जिससे प्रशासनिक दक्षता प्रभावित हो रही है। एससी-एसटी कर्मचारियों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन सामान्य वर्ग को मेरिट पर प्रमोशन। विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज फैसले के अनुसार, आरक्षण के लिए डेटा अनिवार्य है, जो मध्य प्रदेश में उपलब्ध नहीं। इससे न केवल व्यक्तिगत नुकसान हो रहा है, बल्कि राज्य की उत्पादकता भी प्रभावित हो रही है।

हाईकोर्ट में तारीखों का सिलसिला: कर्मचारियों का सब्र टूटा

जुलाई 2025 में जबलपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने नई नीति पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नई नीति पुरानी का ही नाममात्र बदलाव है, और सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद इसे लागू नहीं किया जा सकता। सरकार ने वर्गवार आंकड़े पेश किए, लेकिन कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। अगस्त में फिर सुनवाई हुई, जहां तुलनात्मक चार्ट मांगा गया। 9 सितंबर को याचिकाकर्ताओं ने क्रीमी लेयर और क्वांटिफायबल डेटा पर अस्पष्टता का मुद्दा उठाया। 16 सितंबर को उम्मीद थी कि फैसला आ जाएगा, लेकिन कोर्ट ने फिर सरकार से जवाब मांगा और 25 सितंबर की तारीख दी।

कर्मचारी नेता सुयश मोहन गुरु ने कहा, "यह मामला संविधान के खिलाफ है। प्रमोशन मौलिक अधिकार नहीं, लेकिन मेरिट पर आधारित होना चाहिए।" सपाक्स के महासचिव ने बताया कि 9 साल में करोड़ों रुपये कोर्ट केस पर खर्च हो चुके हैं, लेकिन कर्मचारियों को न्याय नहीं मिल रहा। आरक्षित वर्ग के संगठन जैसे एससी-एसटी एसोसिएशन का कहना है कि आरक्षण सामाजिक न्याय का हिस्सा है, और इसे समाप्त करना भेदभावपूर्ण होगा।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+