एमपी कांग्रेस के लिए दिग्विजय सिंह बने 'भस्मासुर'

चुनाव से पहले जीत के लिए कांग्रेस में शुरू हुई कवायद में सबसे ज्यादा जोर एकता पर दिया गया। इसके लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पहल की। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के तहत जगह-जगह आयोजित की गई सभाओं में सभी क्षत्रपों केंद्रीय मंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, पूर्व मंत्री सुरेश पचौरी, प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी को एक मंच पर खड़ा कर यह बताने की कोशिश हुई कि कांग्रेस में एकता बरकरार है।
राज्य के लगभग हर हिस्से में हो चुकी कांग्रेस की सभाओं में सभी नेता एक साथ एक मंच पर नजर आए। कमलनाथ तो कई बार यह भी कहने से नहीं चूके कि कांग्रेस के सभी नेता एक हैं। यह चुनाव विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री के लिए नहीं है बल्कि राज्य के भविष्य के लिए है। मंच पर लगभग यही स्वर दिग्विजय सिंह व ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी रहा है। उम्मीदवारी तय होने से पहले तक नजर आने वाली कांग्रेस की एकता पर अब ग्रहण लगता दिख रहा है। राज्य के 10 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के एक बयान ने बता दिया है कि कांग्रेस में सब ठीक नहीं चल रहा है और एकता महज दिखावा है। उन्होंने अपने को डूबता हुआ सूरज बता कर अपना दर्द जाहिर किया है। उनका यह बयान तब आया जब उन्हें मंच पर शहडोल में दूसरी और ग्वालियर में तीसरी पंक्ति में बैठाया गया।
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में कमलनाथ और सिंधिया को मिले विशेष महत्व पर दिग्विजय के बयान को प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है। दिग्विजय पहले ही अपने समर्थकों से खुलकर कहते रहे हैं कि कोई भी उनके पास टिकट के लिए बायोडाटा लेकर न आए। अब अपने को डूबता सूरज बताकर सब कुछ सामने ला दिया है। दिग्विजय को करीब से जानने वाले मानते हैं कि कम ही ऐसे अवसर आए हैं जब उन्होंने पार्टी आलाकमान के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की है। वह अपने विरोधियों को समय आने पर ठिकाने लगाने में कभी नहीं चूके हैं। इस समय भले ही उनकी उपेक्षा हो रही हो मगर समय पर वह इसका हिसाब बराबर करने से नहीं चूकेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का मानना है कि दिग्विजय सहज व सरल राजनेता नहीं हैं, उनकी कही हुई बातों का अर्थ गहरा है। यह बात सही है कि एकता के नाम पर उन्हें जिस तरह से किनारे किया गया है, उससे वह आहत जरूर हैं। पार्टी में टिकट वितरण की घड़ी करीब आने से पहले कांग्रेस नेताओं में बढ़ती दूरियों के चलते कांग्रेस फिर उसी जुमले को आत्मसात करने लगी है, जिसे राज्य में वर्षों से कहा जाता रहा है। कांग्रेस और गुटबाजी तो एक दूसरे के पर्याय हैं। यह स्थिति चुनाव के नतीजों पर भी असर डालने वाली साबित हो सकती है।












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