“एक पेड़ मां के नाम!”: सीहोर के फंदा गांव में जागृत हिंदू मंच ने बोया पर्यावरण और मातृभक्ति का बीज
MP News: "मां ने हमें जीवन दिया, अब हम उनके नाम पर जीवन दें!" इस भावनात्मक और प्रेरणादायी संदेश के साथ मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के फंदा गांव में एक अनूठा वृक्षारोपण अभियान शुरू हुआ। जागृत हिंदू मंच के बैनर तले आयोजित "एक पेड़ मां के नाम" अभियान ने न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक कदम बढ़ाया, बल्कि मातृभक्ति और सामाजिक एकता का एक अनुपम उदाहरण भी पेश किया।
इस आयोजन ने फंदा गांव को हरियाली और उत्साह के रंग में रंग दिया, जहां बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी एक साथ आए और पेड़ों के रूप में मां के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की।

हरियाली का उत्सव: मां के नाम समर्पित पौधे
फंदा गांव में रविवार, 6 जुलाई 2025 को आयोजित इस वृक्षारोपण कार्यक्रम में सैकड़ों लोग शामिल हुए। जागृत हिंदू मंच, सीहोर के जिला अध्यक्ष विपुल बंसल के नेतृत्व में यह अभियान एक उत्सव की तरह मनाया गया। गांव की गलियां "एक पेड़ मां के नाम" के नारों से गूंज उठीं, और हर पौधा किसी न किसी मां के नाम पर लगाया गया। मंच के संरक्षक डॉ. दुर्गेश केसवानी ने भी इस पावन कार्य में हिस्सा लिया और इसे एक "संस्कारों से भरी हरित क्रांति" करार दिया।
आयोजन स्थल पर नीम, पीपल, बरगद, और आम जैसे छायादार और फलदार पौधों को रोपा गया। बच्चों ने उत्साह से मिट्टी खोदी, युवाओं ने पौधों को सहारा दिया, और महिलाओं ने पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी देखभाल का संकल्प लिया। बुजुर्गों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे पेड़ उनके बचपन में गांव की शोभा हुआ करते थे। यह दृश्य न केवल पर्यावरण प्रेम का प्रतीक था, बल्कि सामाजिक एकता और मातृभक्ति का भी जीवंत चित्र प्रस्तुत कर रहा था।
मातृभक्ति और पर्यावरण का संगम
जागृत हिंदू मंच के जिला अध्यक्ष विपुल बंसल ने इस अभियान को मातृभक्ति और पर्यावरण प्रेम का अनूठा संगम बताया। उन्होंने कहा, "मां वह पहली गुरु है, जो हमें जीवन और संस्कार देती है। आज जब हमारा पर्यावरण संकट के दौर से गुजर रहा है, तब मां के नाम पर एक पेड़ लगाना केवल सम्मान नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य है। यह छोटा सा कदम हमारी अगली पीढ़ियों के लिए ऑक्सीजन का अमूल्य उपहार होगा।"
विपुल बंसल ने बताया कि इस अभियान का लक्ष्य सीहोर जिले के हर गांव तक पहुंचना है। "हम चाहते हैं कि जिले का हर व्यक्ति इस मुहिम का हिस्सा बने। हमारा सपना है कि हजारों पेड़ मां के नाम पर लगें और फंदा गांव इस हरित क्रांति का प्रेरणा स्रोत बने," उन्होंने उत्साह के साथ कहा।
मंच के संरक्षक डॉ दुर्गेश केसवानी ने इस पहल को एक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन की संज्ञा दी। "आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम मां और प्रकृति को भूलते जा रहे हैं। यह अभियान हमें दोनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है। एक पेड़ लगाना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि एक संस्कार है, जो समाज को जोड़ता है। मैं चाहता हूं कि यह मुहिम एक जनआंदोलन बने, जिसमें हर व्यक्ति मां के चरणों में वृक्ष अर्पित करे," उन्होंने भावुक अंदाज में कहा।
गांव का उत्साह: बच्चे, महिलाएं और युवा बने हिस्सा
फंदा गांव में आयोजित इस कार्यक्रम ने सभी आयु वर्ग के लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया। बच्चों ने उत्साह के साथ पेड़ों के महत्व पर लघु भाषण दिए। छोटी सी सृष्टि, जो कक्षा 6 में पढ़ती है, ने अपने भाषण में कहा, "पेड़ हमें हवा देते हैं, छाया देते हैं, और बारिश लाते हैं। मैंने अपनी मां के नाम पर एक नीम का पेड़ लगाया, ताकि वह हमेशा मेरे साथ रहे।" उसकी मासूम बातों ने सभी के दिलों को छू लिया।
महिलाओं ने इस अवसर पर 'वृक्ष रक्षा सूत्र' बांधकर पौधों की देखभाल की शपथ ली। स्थानीय निवासी राधा बाई ने कहा, "मां की तरह पेड़ भी हमें प्यार और सुरक्षा देते हैं। मैंने अपने पौधे को अपनी मां की तरह गोद लिया है और इसकी देखभाल करूंगी।"
युवाओं ने भी इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने न केवल पौधे लगाए, बल्कि उनकी नियमित देखभाल की जिम्मेदारी भी उठाई। युवा कार्यकर्ता भव्य मोटवानी ने कहा, "हमारी पीढ़ी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार है। यह अभियान हमें सिखाता है कि छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। मैं अपने पौधे को हर दिन पानी दूंगा और इसे बड़ा होते देखूंगा।"
सामाजिक एकता का प्रतीक
इस आयोजन में फंदा गांव के सभी वर्गों के लोग एकजुट हुए। जागृत हिंदू मंच के सदस्यों-नरेंद्र कुमार मोटवानी, अनिल मोटवानी, धीरज केसवानी, प्रशांत कुमार, सक्षम कुमार, जितेंद्र कुशवाहा, जितेंद्र कुमार, और मोहन अहिरवार-ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गांव के बुजुर्गों ने पौधों को आशीर्वाद दिया, जबकि बच्चों ने रंग-बिरंगे झंडों से आयोजन स्थल को सजाया।
कार्यक्रम में एक विशेष क्षण तब आया, जब गांव की सबसे बुजुर्ग महिला, 80 वर्षीय कमला बाई ने अपने दिवंगत मां के नाम पर एक बरगद का पेड़ लगाया। "मेरी मां ने मुझे सिखाया कि पेड़ हमारा परिवार हैं। आज मैं उनके नाम पर यह पेड़ लगाकर गर्व महसूस कर रही हूं," उन्होंने आंसुओं के बीच कहा।
भविष्य की योजना: हर गांव में हरियाली
जागृत हिंदू मंच ने इस अभियान को सीहोर जिले के अन्य गांवों तक ले जाने की योजना बनाई है। विपुल बंसल ने बताया, "हमारा लक्ष्य है कि अगले एक साल में जिले के कम से कम 100 गांवों में 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के तहत हजारों पौधे लगाए जाएं। इसके लिए हम पर्यावरण जागरूकता शिविर, शिक्षण कार्यशालाएं, और स्कूलों में बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित करेंगे।"
डॉ. दुर्गेश केसवानी ने कहा कि यह अभियान केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं रहेगा। "हम गांव-गांव जाकर लोगों को पेड़ों की देखभाल, जल संरक्षण, और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करेंगे। हम चाहते हैं कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन बने, जो हर घर तक पहुंचे," उन्होंने कहा।
पर्यावरण संकट के दौर में एक उम्मीद
आज जब ग्लोबल वॉर्मिंग, जलवायु परिवर्तन, और वनों की कटाई जैसे मुद्दे वैश्विक चिंता का विषय बने हुए हैं, तब फंदा गांव का यह छोटा सा प्रयास एक बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश में इस साल की शुरुआत में भारी गर्मी और सूखे की स्थिति ने पर्यावरण संरक्षण की जरूरत को और रेखांकित किया है। ऐसे में "एक पेड़ मां के नाम" जैसे अभियान न केवल पर्यावरण को बचाने का प्रयास हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी मजबूत करते हैं।
स्थानीय पर्यावरणविद् डॉ अनिल शर्मा ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा, "यह अभियान अनूठा है, क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण को भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर जोड़ता है। मां के नाम पर पेड़ लगाना एक ऐसा संदेश है, जो हर दिल को छूता है। अगर हर गांव ऐसा करे, तो हम मध्य प्रदेश को फिर से हरा-भरा बना सकते हैं।"
एक नई शुरुआत: फंदा से फैलेगा संदेश
फंदा गांव में "एक पेड़ मां के नाम" अभियान ने न केवल पेड़ लगाए, बल्कि लोगों के दिलों में पर्यावरण और मातृभक्ति का बीज भी बोया। यह आयोजन एक छोटे से गांव की बड़ी सोच का प्रतीक बन गया है। जैसे-जैसे ये पौधे बढ़ेंगे, वैसे-वैसे फंदा गांव की यह पहल भी सीहोर और पूरे मध्य प्रदेश में फैलती जाएगी।
जागृत हिंदू मंच के इस प्रयास ने यह साबित कर दिया कि जब समाज एकजुट होकर कोई कदम उठाता है, तो वह न केवल पर्यावरण को बचाता है, बल्कि एक नई सांस्कृतिक क्रांति की नींव भी रखता है। फंदा गांव अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुका है, जो मां और प्रकृति के प्रति प्रेम का संदेश पूरे देश में फैलाएगा।













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