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सीहोर में गाडगे महाराज की 150वीं जयंती: सम्मान समारोह में बड़ी घोषणा, स्वच्छता और सामाजिक एकता का संदेश

Gadge Maharaj : अखिल भारतीय धोबी रजक महासंघ जिला सीहोर द्वारा राष्ट्रीय संत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में भव्य कार्यक्रम का आयोजन लोटिया पुल धोबी घाट, इंदौर नाका क्षेत्र में किया गया। "राष्ट्रीय संत श्री गाडगे बाबा जयंती महोत्सव 2026" के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में प्रतिभा सम्मान और वरिष्ठ समाजसेवी सम्मान समारोह हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजन, युवा और स्थानीय नागरिक शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य संत गाडगे बाबा के स्वच्छता, समाज सुधार और मानव सेवा के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाना रहा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सीहोर नगर पालिका अध्यक्ष प्रिंस राठौर उपस्थित रहे, जबकि वरिष्ठ समाजसेवी अखिलेश राय ने विशेष अतिथि के रूप में शिरकत की। आयोजन का उद्देश्य संत गाडगे बाबा के विचारों-स्वच्छता, समानता और सामाजिक सुधार-को जन-जन तक पहुंचाना था।इसके अलावा भोपाल से कांग्रेस नेता संजय मालवीय और भाजपा नेता राजू मालवीय भी शामिल हुए

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स्वच्छता के जनक के रूप में याद किए गए गाडगे बाबा

मुख्य वक्ता के रूप में नगर पालिका अध्यक्ष प्रिंस राठौर ने कहा कि संत गाडगे महाराज को स्वच्छता आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गाडगे बाबा के विचारों से प्रभावित रहे हैं और प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने देशव्यापी स्वच्छता अभियान की शुरुआत की।

राठौर ने कहा कि स्वच्छता केवल अभियान नहीं, बल्कि एक संस्कार है। "सीहोर नगर आज स्वच्छता के मामले में प्रदेश में छठे स्थान पर है, यह हमारे सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वच्छता की यह प्रेरणा संत गाडगे बाबा जैसे महापुरुषों से ही मिली है," उन्होंने कहा। उन्होंने समाज को संगठित रहने का संदेश देते हुए कहा कि आज जातिगत राजनीति के माध्यम से समाज को बांटने की कोशिशें हो रही हैं, ऐसे में हमें सजग और एकजुट रहने की आवश्यकता है।

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अखिलेश राय की बड़ी घोषणा, धर्मशाला के लिए सहयोग

कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी अखिलेश राय ने कहा कि रजक धोबी समाज को गर्व होना चाहिए कि गाडगे महाराज जैसे संत ने इसी समाज में जन्म लेकर पूरे देश को स्वच्छता और मानवता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गाडगे बाबा ने केवल स्वच्छता ही नहीं, बल्कि समाज की कुरीतियों के खिलाफ भी आजीवन संघर्ष किया। गरीबों को वस्त्र वितरित करना, बच्चों की शिक्षा में सहयोग देना और जरूरतमंदों की सहायता करना उनके जीवन का उद्देश्य था। इस अवसर पर अखिलेश राय ने रजक समाज की धर्मशाला निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग देने की घोषणा की। उनके इस योगदान और प्रतिबद्धता को देखते हुए आयोजकों ने उन्हें "महादानी कर्ण" की उपाधि से सम्मानित किया।

समाज सुधार के प्रतीक थे गाडगे बाबा

अखिल भारतीय धोबी रजक महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष धर्मेंद्र मालवीय ने कहा कि संत गाडगे बाबा ने समाज उत्थान और कुरीतियों के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मानवता की सेवा को ही सच्चा धर्म बताया। मालवीय ने कहा कि गाडगे बाबा हमेशा अपने हाथ में झाड़ू लेकर चलते थे और सफाई के माध्यम से समाज को संदेश देते थे कि "स्वच्छ रहेंगे तो स्वस्थ रहेंगे।" उन्होंने छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई और सामाजिक समानता के लिए कार्य किया।

उन्होंने बताया कि बाबा ने भीमराव अंबेडकर जैसे महान सामाजिक सुधारकों के साथ मिलकर सामाजिक समरसता और समान अधिकारों की दिशा में काम किया। विकलांग, बीमार और जरूरतमंद लोगों की सहायता कर उन्होंने सेवा और समर्पण की मिसाल पेश की।

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प्रतिभाओं का हुआ सम्मान

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभा सम्मान और वरिष्ठ समाजसेवी सम्मान के माध्यम से समाज के उन लोगों को मंच पर सम्मानित किया गया, जिन्होंने शिक्षा, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक कार्यों में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

समारोह में उपस्थित वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि संत गाडगे बाबा का जीवन हमें यह सिखाता है कि समाज की प्रगति संगठन, स्वच्छता और शिक्षा से ही संभव है। सीहोर में आयोजित यह जयंती महोत्सव केवल एक स्मृति कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि सामाजिक चेतना और एकता का संदेश देने वाला प्रेरणादायी आयोजन साबित हुआ।

संत गाडगे महाराज (गाडगे बाबा) कौन थे?

संत गाडगे महाराज, जिन्हें संत गाडगे बाबा या राष्ट्रसंत गाडगे महाराज के नाम से भी जाना जाता है, महाराष्ट्र के एक महान संत, समाज सुधारक और घूमंतू कीर्तनकार थे। वे स्वच्छता, शिक्षा, सामाजिक समानता और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, दलितों और पिछड़े वर्गों की सेवा में समर्पित कर दिया।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

वास्तविक नाम: डेबूजी झिंगराजी जानोरकर (Debuji Zhingraji Janorkar)।
जन्म: 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के अंजनगांव सुरजी तालुका के शेंडगांव (Shendgaon) गांव में हुआ। वे धोबी (परित) समुदाय से थे, जो उस समय पिछड़ा और गरीब वर्ग माना जाता था। उनके पिता झिंगराजी शराब की लत के कारण जल्दी ही गुजर गए, जिसके बाद डेबूजी अपनी मां सखुबाई के साथ नाना के यहां रहने लगे।

बचपन से ही वे मेहनती थे - खेती, पशुपालन, तैराकी और भजन-कीर्तन में निपुण हो गए। 1892 में उनका विवाह कुंताबाई से हुआ और उनके चार बच्चे हुए। 29 साल की उम्र (लगभग 1905) में उन्होंने घर-परिवार त्याग दिया और संन्यासी जीवन अपनाया।

नाम कैसे पड़ा "गाडगे महाराज"?

वे भिक्षा मांगने के लिए सिर पर मिट्टी का गाडगा (घड़ा) उल्टा रखकर चलते थे, जिसमें भोजन इकट्ठा करते थे। इसी गाडगे (घड़े) के कारण लोग उन्हें गाडगे बाबा या गाडगे महाराज कहने लगे। उनकी पहचान बन गई - पैरों में फटी चप्पल, सिर पर गाडगा और हाथ में झाड़ू (ब्रूम)। झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक था।

उनके मुख्य कार्य और योगदान

गाडगे महाराज पैदल ही महाराष्ट्र के गांव-गांव घूमते थे और कीर्तन के माध्यम से लोगों को जागृत करते थे। उनके मुख्य संदेश थे:

  • स्वच्छता - वे खुद गांव साफ करते, गंदगी हटाते और लोगों को सिखाते कि "स्वच्छता ईश्वर की सेवा है"। वे स्वच्छ भारत अभियान के अग्रदूत माने जाते हैं।
  • शिक्षा - अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा पर जोर दिया। कहा जाता है कि "स्कूल खोलना मंदिर बनाना से बड़ा पुण्य है"।
  • सामाजिक सुधार - अंधविश्वास, पशुबलि, छुआछूत, शराब, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई।
  • सेवा कार्य - उन्होंने कई धर्मशालाएं, गौशालाएं, विद्यालय, छात्रावास और अस्पताल बनवाए। गरीबों, अनाथों और विकलांगों की मदद की।
  • वे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के बहुत सम्मान करते थे और आंबेडकर भी उन्हें गुरु मानते थे। आंबेडकर ने उनकी कई संस्थाओं को समर्थन दिया।

मृत्यु

20 दिसंबर 1956 को अमरावती जाते समय वलगांव के पास पेढ़ी नदी के किनारे उनकी मृत्यु हो गई। वे 80 वर्ष के थे। उनकी अंतिम यात्रा और कीर्तन बहुत प्रभावशाली था।

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