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MP News: दिग्विजय और कमलनाथ कैसे मिले दिल्ली में? क्या मिट गई दूरियां, इत्तफाक या सियासी मास्टरस्ट्रोक, जानिए

Digvijay Singh and Kamal Nath: मध्य प्रदेश की सियासत में कांग्रेस के दो दिग्गजों, पूर्व मुख्यमंत्रियों दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बीच गुरुवार को दिल्ली में हुई मुलाकात ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई, बल्कि एक बार फिर यह सवाल उठाया कि क्या वाकई दोनों के बीच मतभेद खत्म हो गए हैं? यह मुलाकात हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर दोनों के तीखे बयानों और कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी के बाद हुई।

दिग्विजय सिंह ने मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने 50 साल के पारिवारिक रिश्तों का जिक्र किया और कहा कि "छोटे-मोटे मतभेद रहे, लेकिन मनभेद कभी नहीं।" क्या यह सुलह मध्य प्रदेश कांग्रेस को नई ताकत देगी, या यह केवल एक अस्थायी रणनीति है? आइए, इस मुलाकात की पूरी कहानी, पृष्ठभूमि, और इसके राजनीतिक मायनों को रोचक और विस्तार से जानते हैं।

Former CM Digvijay Singh and Kamal Nath Delhi meeting Beginning of reconciliation political masterstroke

दिल्ली में चाय की चुस्कियों के बीच गिले-शिकवे दूर

11 सितंबर 2025 को दिल्ली के एक निजी स्थान पर दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की मुलाकात हुई। यह बैठक बंद दरवाजों के पीछे हुई, लेकिन इसके बाद दिग्विजय सिंह ने X पर एक तस्वीर साझा कर इसे सार्वजनिक कर दिया। तस्वीर में दोनों नेता मुस्कुराते हुए नजर आए, और दिग्विजय ने लिखा:

"कमल नाथ जी और मेरे लगभग 50 वर्षों के पारिवारिक संबंध रहे हैं। हमारे राजनैतिक जीवन में उतार चढ़ाव आते रहे हैं और ये स्वाभाविक भी हैं। हमारा सारा राजनैतिक जीवन कांग्रेस में रहते हुए विचारधारा की लड़ाई एक जुट हो कर लड़ते हुए बीता है और आगे भी लड़ते रहेंगे। छोटे मोटे मतभेद रहे हैं लेकिन मनभेद कभी नहीं। कल हमारी मुलाक़ात हुई। हम दोनों को कांग्रेस पार्टी नेतृत्व ने खूब अवसर दिए और जनता का प्यार सदैव मिलता रहा है। आगे भी हम मिल कर जनता के हित में कांग्रेस के नेतृत्व में सेवा करते रहेंगे। जय सिया राम।"

सूत्रों के अनुसार, यह मुलाकात अनौपचारिक थी, जिसमें दोनों ने चाय की चुस्कियों के बीच पुरानी यादें ताजा कीं। बातचीत का मुख्य मकसद हाल के विवादों को सुलझाना और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति को मजबूत करने की रणनीति बनाना था। कमलनाथ ने इस मुलाकात पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, लेकिन उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि उन्होंने दिग्विजय के साथ खुलकर बात की और पुराने गिले-शिकवे दूर किए।

मुलाकात के दौरान 2020 में कमलनाथ सरकार के पतन और ज्योतिरादित्य सिंधिया के विद्रोह पर भी चर्चा हुई। दोनों ने इस बात पर सहमति जताई कि अब अतीत को भूलकर पार्टी को एकजुट करना जरूरी है। सूत्रों के मुताबिक, यह मुलाकात कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के दबाव में हुई, जिन्होंने दोनों नेताओं को फोन पर चेतावनी दी थी कि सार्वजनिक बयानबाजी बंद हो।

पृष्ठभूमि: सिंधिया विद्रोह और बयानबाजी की जंग

मध्य प्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बीच मतभेद की कहानी पुरानी है, लेकिन हाल ही में यह फिर सुर्खियों में आई। मार्च 2020 में कमलनाथ सरकार का पतन ज्योतिरादित्य सिंधिया के विद्रोह के कारण हुआ, जब उन्होंने 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन कर ली। इस घटना ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। हाल ही में दिग्विजय सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा कि कमलनाथ और सिंधिया के बीच मतभेद इस पतन का कारण थे। जवाब में कमलनाथ ने X पर ट्वीट किया: "सिंधिया को लगता था कि दिग्विजय सिंह सरकार चला रहे हैं, इस कारण उन्होंने सरकार गिराई।"

इस बयानबाजी से कांग्रेस आलाकमान खासा नाराज हुआ। मल्लिकार्जुन खड़गे ने दोनों नेताओं को दिल्ली तलब किया और साफ शब्दों में कहा कि पार्टी की एकजुटता को नुकसान पहुंचाने वाली बातें बर्दाश्त नहीं होंगी। जनवरी 2025 में भी कमलनाथ ने एक वर्चुअल मीटिंग में आलाकमान से नाराजगी जताई थी, जिसमें दिग्विजय ने उनका साथ दिया था। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में हार और टिकट वितरण पर असहमति ने दोनों के बीच तनाव को बढ़ाया था।

2022 में एक वायरल वीडियो में दोनों के बीच तीखी बहस देखी गई थी, जब टिकट वितरण पर राय अलग थी। लेकिन दिग्विजय का कहना है कि उनके और कमलनाथ के बीच 1980 से पारिवारिक रिश्ते हैं, और ये मतभेद केवल राजनीतिक रणनीति के थे। उनकी पोस्ट में "जय सिया राम" का जिक्र भी इस बात का प्रतीक है कि वे पुराने रिश्तों को महत्व देते हैं।

मुलाकात के पीछे की कहानी: आलाकमान का दबाव और रणनीति

सूत्रों के अनुसार, इस मुलाकात के पीछे कांग्रेस आलाकमान का दबाव था। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने दोनों नेताओं को साफ निर्देश दिए कि मध्य प्रदेश में 2028 विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी को एकजुट करना होगा। खड़गे ने हाल ही में नेपाल में फंसे भारतीयों की निकासी के लिए विदेश सचिव से बात की थी, जिसके बाद उनकी सख्ती और बढ़ गई।

दिल्ली में मुलाकात से पहले दोनों नेताओं से अलग-अलग बात की गई। सूत्रों का कहना है कि कमलनाथ ने आलाकमान को भरोसा दिलाया कि वे दिग्विजय के साथ मिलकर काम करेंगे। दिग्विजय ने भी अपनी पोस्ट में इस बात पर जोर दिया कि वे और कमलनाथ "विचारधारा की लड़ाई" को एकजुट होकर लड़ेंगे। यह मुलाकात एक तरह से आलाकमान का संदेश था कि मध्य प्रदेश में कोई गुटबाजी नहीं चलेगी।

क्या बदलाव आएगा?, जानिए मायने

इस मुलाकात के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं, जो मध्य प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की रणनीति को प्रभावित करेंगे:

1. आलाकमान की ताकत: मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने यह दिखा दिया कि वे पार्टी में अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्त हैं। दिग्विजय और कमलनाथ जैसे दिग्गजों को एक मंच पर लाना आलाकमान की रणनीतिक जीत है। यह संदेश युवा नेताओं, जैसे मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जितु पटवारी, को भी प्रेरित करेगा।

2. मध्य प्रदेश में एकजुटता: 2023 विधानसभा चुनाव में हार और सिंधिया के विद्रोह ने कांग्रेस को कमजोर किया। दिग्विजय (राज्यसभा सांसद) और कमलनाथ (प्रदेश में वरिष्ठ नेता) अगर एकजुट रहें, तो यह पार्टी के लिए ताकत बनेगा। दिग्विजय की राष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता और कमलनाथ का प्रदेश में संगठनात्मक अनुभव मिलकर बीजेपी को चुनौती दे सकता है।

3. सिंधिया पर हमला: दोनों नेताओं ने सिंधिया पर बयानबाजी की, लेकिन मुलाकात के बाद यह संदेश गया कि अब वे अतीत को भूलकर आगे बढ़ेंगे। कांग्रेस अब सिंधिया को "गद्दार" बताकर बीजेपी पर हमला तेज कर सकती है, खासकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में, जहां सिंधिया का प्रभाव है।

4. 2029 लोकसभा की तैयारी: यह मुलाकात 2029 लोकसभा चुनाव की रणनीति का हिस्सा है। मध्य प्रदेश में 29 लोकसभा सीटें हैं, और 2024 में कांग्रेस केवल एक सीट जीत पाई थी। दिग्विजय-कमलनाथ की जोड़ी अगर एकजुट रही, तो यह पार्टी को नई ऊर्जा देगी। दिग्विजय की पोस्ट को 247 लाइक्स और कई सकारात्मक कमेंट्स मिले, जो जनता में उनके संदेश की स्वीकार्यता दिखाता है।

5. युवा नेतृत्व को प्रेरणा: जीतू पटवारी जैसे युवा नेताओं को दिग्विजय और कमलनाथ का समर्थन मिलने से संगठन मजबूत होगा। लेकिन यदि मतभेद लौटे, तो यह युवा नेतृत्व के लिए चुनौती बनेगा।

चुनौतियां: क्या सुलह स्थायी होगी?

पुराने मतभेद: 2022 की तीखी बहस और 2023 में टिकट वितरण पर असहमति जैसे मामले इतिहास में हैं। क्या दोनों वास्तव में पुरानी कड़वाहट भूल पाएंगे?

आलाकमान का दबाव: यह सुलह आलाकमान के दबाव में हुई। यदि दबाव कम हुआ, तो क्या मतभेद फिर उभरेंगे?

सिंधिया का प्रभाव: ग्वालियर-चंबल में सिंधिया का प्रभाव अब भी है। बीजेपी इसे भुनाने की कोशिश करेगी, और कांग्रेस को मजबूत रणनीति चाहिए।

युवा बनाम पुराने नेता: दिग्विजय और कमलनाथ की जोड़ी को जितु पटवारी जैसे युवा नेताओं के साथ तालमेल बनाना होगा, जो संगठन में नई ऊर्जा ला रहे हैं।

एक रोचक किस्सा, 50 साल का रिश्ता

दिग्विजय और कमलनाथ का रिश्ता 1970 के दशक से है, जब दोनों युवा कांग्रेसी थे। 1980 में दिग्विजय के भाई लक्ष्मण सिंह और कमलनाथ की संजय गांधी के साथ नजदीकी ने दोनों को करीब लाया। 1993-2003 में दिग्विजय के मुख्यमंत्री कार्यकाल में कमलनाथ केंद्र में सक्रिय थे, और दोनों ने मिलकर मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत किया। 2018 में कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर दिग्विजय ने संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 2020 के बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ी, जो अब सुलह की ओर बढ़ रही है।

दोनों नेताओं ने अतीत को भूलकर एकजुटता का संदेश दिया, लेकिन यह कितनी स्थायी होगी, यह समय बताएगा। मध्य प्रदेश में बीजेपी की मजबूत स्थिति को देखते हुए कांग्रेस को दिग्विजय-कमलनाथ की जोड़ी से बहुत उम्मीदें हैं। यदि यह सुलह जमीनी स्तर पर उतरी, तो यह पार्टी के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है। लेकिन अगर यह केवल एक "फोटो-ऑप" साबित हुई, तो कांग्रेस को फिर से नुकसान उठाना पड़ सकता है।

क्या यह मुलाकात मध्य प्रदेश कांग्रेस को नई ताकत देगी, या यह सिर्फ एक और राजनीतिक ड्रामा है? सियासत के इस खेल में "जय सिया राम" का नारा कितना रंग लाएगा, यह देखना बाकी है।

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