Chandra Grahan 2025: उज्जैन में सूतक से पहले महाकाल मंदिर में हुई शयन आरती, पट बंद, ब्लड मून का नजारा
मध्य प्रदेश सहित पूरे भारत में रविवार, 7 सितंबर 2025 की रात साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2025) देखा गया। यह खगोलीय घटना रात 9:58 बजे शुरू हुई और 3 घंटे 28 मिनट तक चली, जो देर रात 1:26 बजे समाप्त हुई। इस दौरान 82 मिनट तक पूर्ण चंद्र ग्रहण का नजारा दिखा, जिसमें चंद्रमा लाल-नारंगी रंग में नजर आया, जिसे ब्लड मून के नाम से जाना जाता है।
यह ग्रहण 27 जुलाई 2018 के बाद पहली बार भारत के सभी हिस्सों में दिखाई दिया, जिसने खगोल प्रेमियों और आम लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में ग्रहण के सूतक काल को देखते हुए विशेष व्यवस्थाएँ की गईं, जिसमें शयन आरती का समय बदलकर रात 9:30 बजे कर दिया गया और इसके बाद मंदिर के पट बंद कर दिए गए।

चंद्र ग्रहण का खगोलीय और धार्मिक महत्व
चंद्र ग्रहण एक ऐसी खगोलीय घटना है, जिसमें पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, जिससे पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इस दौरान चंद्रमा का रंग लाल-नारंगी हो जाता है, जिसे ब्लड मून कहा जाता है। इस ग्रहण को नग्न आँखों से देखा जा सकता है, और इसके लिए किसी विशेष चश्मे या फिल्टर की जरूरत नहीं होती। हालांकि, दूरबीन या टेलीस्कोप के उपयोग से इसका नजारा और साफ देखा जा सकता है।
उज्जैन की वेधशाला से इस ग्रहण को विशेष रूप से देखा गया, क्योंकि उज्जैन खगोलीय गणनाओं के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। मौसम वैज्ञानिक डॉ. रमेश चंद्रा ने बताया, "यह ग्रहण भारत, एशिया, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, और पश्चिमी प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में दिखाई दिया। उज्जैन में साफ मौसम के कारण यह दृश्य और शानदार था।"
धार्मिक दृष्टिकोण से, सनातन धर्म में चंद्र ग्रहण को अशुभ माना जाता है। इस दौरान सूतक काल लागू होता है, जो ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले, यानी रविवार दोपहर 12:35 बजे शुरू हुआ और ग्रहण समाप्ति के साथ रात 1:26 बजे खत्म हुआ। सूतक काल में पूजा-पाठ, हवन, और शुभ कार्य वर्जित होते हैं।
महाकाल मंदिर में बदली व्यवस्था: शयन आरती और पट बंद
उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, जो विश्व प्रसिद्ध है, में चंद्र ग्रहण के कारण विशेष व्यवस्थाएँ की गईं। सामान्य दिनों में मंदिर में शयन आरती रात 10:30 बजे होती है, और मंदिर के पट रात 11 बजे बंद होते हैं। लेकिन ग्रहण के सूतक काल को देखते हुए 9:30 बजे शयन आरती की गई, और इसके तुरंत बाद रात 9:56 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए गए। भस्म आरती, भोग आरती, और संध्या आरती अपने निर्धारित समय पर हुईं।
महाकाल मंदिर समिति के प्रशासक प्रथम कौशिक ने बताया, "चंद्र ग्रहण के दौरान सूतक काल में मंदिर में पूजा-पाठ और दर्शन निषिद्ध होते हैं। इसलिए, हमने शयन आरती का समय बदलकर जल्दी कर दिया और सूतक शुरू होने से पहले मंदिर के पट बंद कर दिए।" ग्रहण समाप्त होने के बाद देर रात मंदिर का शुद्धिकरण किया गया, जिसमें पवित्र नदियों के जल और दूध से भगवान महाकाल का अभिषेक किया गया।
उज्जैन में ग्रहण का विशेष महत्व
उज्जैन को खगोलीय और धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व प्राप्त है। यहाँ की वेधशाला (जंतर मंतर) प्राचीन काल से खगोलीय गणनाओं का केंद्र रही है। इस ग्रहण को देखने के लिए वेधशाला में विशेष इंतजाम किए गए थे। उज्जैन विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा ने बताया, "उज्जैन में ग्रहण का अवलोकन इसलिए भी खास है, क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति इसे खगोलीय घटनाओं के लिए आदर्श बनाती है। इस बार ब्लड मून का नजारा लोगों के लिए अविस्मरणीय रहा।"
धार्मिक मान्यताएं और सावधानियां
सनातन धर्म में चंद्र ग्रहण के दौरान कई सावधानियाँ बरतने की सलाह दी जाती है। पाराशर ज्योतिष संस्थान के निदेशक आचार्य विद्याकांत पांडेय ने बताया, "ग्रहण काल में महामृत्युंजय मंत्र और चंद्रमा के मंत्र 'ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः' का 108 बार जाप करना चाहिए। ग्रहण से पहले खाने-पीने की चीजों में तुलसी की पत्ती डालकर रखनी चाहिए, ताकि नकारात्मक प्रभाव न पड़े। ग्रहण के बाद दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।"
हालांकि, महाकाल मंदिर एक अपवाद रहा, क्योंकि यह देश के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है, जो सूतक काल में भी कुछ समय के लिए भक्तों के लिए खुले रहते हैं। 2023 में भी एक चंद्र ग्रहण के दौरान मंदिर के पट खुले रहे थे, और भक्तों ने बाबा महाकाल के दर्शन किए थे।
ब्लड मून का नजारा: लोगों में उत्साह
इस चंद्र ग्रहण को देखने के लिए उज्जैन सहित मध्य प्रदेश के कई शहरों में लोग उत्साहित थे। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, और जबलपुर में लोग अपने घरों की छतों पर और खुले मैदानों में ग्रहण का नजारा देखने के लिए जमा हुए। उज्जैन में राम घाट और शिप्रा नदी के किनारे खगोल प्रेमियों की भीड़ देखी गई।
स्थानीय निवासी रमेश प्रजापति ने बताया, "मैंने अपने बच्चों के साथ टेलीस्कोप से ब्लड मून देखा। यह एक अद्भुत अनुभव था। चंद्रमा का लाल रंग देखकर बच्चे बहुत उत्साहित थे।" एक अन्य निवासी सोनी गुप्ता ने कहा, "महाकाल की नगरी में यह ग्रहण देखना एक आध्यात्मिक अनुभव भी था। हमने सूतक के नियमों का पालन किया और मंत्र जाप किया।"
मध्य प्रदेश में बारिश ने बढ़ाया रोमांच
ग्रहण के दौरान मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में हल्की बारिश हुई, जिसने इस खगोलीय घटना को और रोमांचक बना दिया। मौसम वैज्ञानिक दिव्या ई. सुरेंद्रन ने बताया, "हल्के बादल होने के बावजूद ग्रहण साफ दिखाई दिया। अगले कुछ दिनों तक हल्की बारिश का दौर जारी रहेगा, लेकिन यह ग्रहण के दृश्य को प्रभावित नहीं करेगा।"
अन्य मंदिरों में भी बदली व्यवस्था
महाकाल मंदिर के अलावा, शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर और सांदीपनि आश्रम में भी सूतक काल के दौरान मंदिर के पट बंद रहे। प्रयागराज में मंदिरों के कपाट 5 घंटे 27 मिनट तक बंद रहे, और अयोध्या में राम मंदिर में भी ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ स्थगित रहा।
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