MP News: सीहोर के किसान की कमाल की खेती, 1 एकड़ भूमि में शतावर और मल्टी-फार्मिंग से लाखों की कमाई
MP Farmer News: भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां अधिकांश जनसंख्या खेती पर निर्भर है, मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के एक छोटे से गांव के किसान राजेश पाटीदार ने खेती को एक नया आयाम दिया है।
पारंपरिक खेती को छोड़कर उन्होंने एक एकड़ जमीन पर शतावर की खेती और मल्टी-लेयर फार्मिंग अपनाकर 8 से 10 लाख रुपये का मुनाफा कमाया है। उनकी यह सफलता न केवल अन्य किसानों के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सही दृष्टिकोण और नवाचार के साथ खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।

शतावर की खेती: कम लागत, ज्यादा मुनाफा
सीहोर के किसान राजेश पाटीदार ने वन इंडिया हिंदी के पत्रकार एलेन मालवीय को बताया कि उन्होंने पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं, चना, और सोयाबीन की खेती में होने वाले नुकसान और बढ़ती लागत को देखते हुए कुछ नया करने का फैसला किया। उन्होंने एक एकड़ जमीन पर शतावर की खेती शुरू की, जिसे औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। राजेश ने बताया कि शतावर की फसल 18 महीने में तैयार हो जाती है, और इसे नीमच मंडी में बेचने पर उन्हें अच्छा दाम मिला।
उन्होंने अपनी खेती में मल्टी-लेयर फार्मिंग को अपनाया, जिसमें शतावर के साथ-साथ पपीता और अन्य पौधों को भी लगाया। इस तकनीक ने उनकी आय को और बढ़ाया। राजेश ने बताया कि शतावर का पौधा 2 से 5 रुपये में मिलता है, जो नेपाल से दिल्ली और फिर वहां से मध्यप्रदेश लाया जाता है। खेत में ये पौधे 2x2 फीट की दूरी पर लगाए जाते हैं। उन्होंने पीली शतावर की किस्म चुनी, जिसका बाजार भाव नीमच मंडी में 27,000 से 56,000 रुपये प्रति क्विंटल तक है।

लागत और मुनाफा: 8-10 लाख रुपये की कमाई
राजेश पाटीदार ने बताया कि एक एकड़ में शतावर की खेती के लिए उनकी कुल लागत 2.5 से 3 लाख रुपये थी। इसमें पौधों की खरीद, खेत की तैयारी, सिंचाई, और जैविक खाद का खर्च शामिल था। 18 महीने बाद जब फसल तैयार हुई, तो उन्होंने इसे नीमच मंडी में बेचा, जहां उन्हें 8 से 10 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। इसके अलावा, मल्टी-लेयर फार्मिंग के तहत पपीते और अन्य फसलों से भी अतिरिक्त आय हुई, जिसने उनकी कमाई को और बढ़ाया।
शतावर की खेती की खासियत यह है कि इसे एक बार लगाने के बाद यह 10-12 साल तक उत्पादन देती है, और इसमें ज्यादा मेहनत या पानी की जरूरत नहीं पड़ती। राजेश ने बताया कि उन्होंने जैविक खेती को प्राथमिकता दी, जिसमें नीम का तेल और गोबर खाद का उपयोग किया गया, जिससे लागत और कम हुई।
पुणे के कृषि मेले से मिला विचार
राजेश पाटीदार ने अपनी सफलता का श्रेय अपने जुनून और सीखने की इच्छा को दिया। उन्होंने बताया कि वह हमेशा कुछ नया करने की तलाश में रहते हैं और इसके लिए नियमित रूप से कृषि मेलों में हिस्सा लेते हैं। पुणे में आयोजित एक कृषि मेले में उन्हें शतावर की खेती के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने इसकी संभावनाओं का अध्ययन किया और अपनी पुश्तैनी जमीन पर इसे आजमाने का फैसला किया।
उन्होंने कहा, "मैंने देखा कि पारंपरिक खेती में लागत ज्यादा और मुनाफा कम हो रहा था। शतावर की खेती के बारे में जानने के बाद मुझे लगा कि यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है। मैंने इसे प्रयोग के तौर पर शुरू किया, और आज इसका नतीजा सबके सामने है।" राजेश का यह प्रयोग न केवल उनके लिए, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गया है।

शतावर का उपयोग: औषधीय और आर्थिक महत्व
शतावर (Asparagus racemosus) एक औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग आयुर्वेद और हर्बल दवाओं में व्यापक रूप से होता है। यह पौधा इम्यूनिटी बढ़ाने, पाचन संबंधी समस्याओं, और महिलाओं में दूध की मात्रा बढ़ाने में उपयोगी है। इसके अलावा, यह मूत्र संबंधी समस्याओं के लिए रामबाण माना जाता है। शतावर की जड़ें, जिन्हें बाजार में बेचा जाता है, आयुर्वेदिक दवाओं और सप्लीमेंट्स में उपयोग होती हैं।
पतंजलि जैसी आयुर्वेदिक कंपनियां शतावर की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दे रही हैं, और इसकी मांग छत्तीसगढ़, उड़ीसा, और अन्य राज्यों में तेजी से बढ़ रही है। बाजार में शतावर की कीमत 1,000 से 3,000 रुपये प्रति किलो तक हो सकती है, जो इसकी खेती को अत्यंत लाभकारी बनाती है। इसके अलावा, शतावर की खेती कम पानी और कम मेहनत में की जा सकती है, जिससे यह छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी उपयुक्त है।
मल्टी-लेयर फार्मिंग: एक नया दृष्टिकोण
राजेश पाटीदार ने मल्टी-लेयर फार्मिंग को अपनाकर अपनी आय को दोगुना किया। इस तकनीक में एक ही खेत में कई फसलों को एक साथ उगाया जाता है, जिससे जमीन का अधिकतम उपयोग होता है। राजेश ने शतावर के साथ पपीता और अन्य मौसमी फसलें उगाईं, जिससे उनकी आय में इजाफा हुआ। उन्होंने बताया कि शतावर की फसल 18 महीने में तैयार होती है, जबकि इस दौरान पपीता और अन्य फसलें अतिरिक्त आय देती रहती हैं।
सीहोर में मल्टी-लेयर फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यशालाएं भी आयोजित की जा रही हैं, जो किसानों को नई तकनीकों से अवगत करा रही हैं। राजेश का कहना है कि अगर किसान सही योजना और जानकारी के साथ खेती करें, तो वे कम जमीन में भी लाखों की कमाई कर सकते हैं।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
राजेश पाटीदार की सफलता ने सीहोर के आसपास के किसानों को शतावर और मल्टी-लेयर फार्मिंग की ओर आकर्षित किया है। कई किसान अब उनसे संपर्क कर इस खेती की तकनीक और बाजार की जानकारी ले रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि शतावर जैसी औषधीय फसलों की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा सकती है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि इसमें रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम होती है।
स्थानीय बीजेपी विधायक ने राजेश की तारीफ करते हुए कहा, "यह हमारे लिए गर्व की बात है कि सीहोर का एक किसान नई तकनीकों को अपनाकर लाखों कमा रहा है। हम ऐसी खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और सब्सिडी योजनाएं शुरू करेंगे।" दूसरी ओर, विपक्षी नेताओं ने सरकार से मांग की है कि शतावर जैसे फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बेहतर बाजार व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
किसानों के लिए प्रेरणा
राजेश पाटीदार की कहानी उन लाखों किसानों के लिए प्रेरणा है, जो पारंपरिक खेती में नुकसान और कम मुनाफे से जूझ रहे हैं। उनकी मेहनत, जुनून, और नवाचार ने साबित कर दिया कि सही दिशा में कदम उठाकर खेती को भी एक लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है। शतावर की खेती और मल्टी-लेयर फार्मिंग ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि सीहोर के अन्य किसानों को भी एक नई राह दिखाई है। यह कहानी मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक मिसाल है कि नवाचार और मेहनत से खेती को सोने की खान बनाया जा सकता है।
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