Karnataka Elections 2023: कौन हैं लिंगायत? क्यों हैं कर्नांटक की सियासत के लिए बेहद जरूरी?
विधानसभा चुनाव से पहले कर्नाटक सरकार ने लिंगायत समुदाय के आरक्षण को बढ़ाया है। माना जाता है कि राज्य में सरकार उसी की बनती है,जिसे इस समुदाय का साथ मिलता है।

Karnataka Lingayats reservation: शुक्रवार को कर्नाटक सरकार ने अहम कदम उठाते हुए बड़ा ऐलान किया है। कर्नाटक के मुख्ममंत्री बसवराज बोम्मई ने अल्पसंख्यकों के 4 फीसदी आरक्षण को खत्म करते हुए लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय का आरक्षण बढ़ा दिया है। जिसके बाद अब लिंगायत समुदाय का आरक्षण 7 प्रतिशत और वोक्कालिगा समुदाय का आरक्षण 6 प्रतिशत कर दिया गया है जो कि पहले क्रमश: 5 और 6 प्रतिशत था, जबकि अल्पसंख्यकों को अब EWS के तहत लाया जाएगा।
सरकार का ये मास्टर स्ट्रोक
विधानसभा चुनाव से पहले सरकार का ये मास्टर स्ट्रोक है, अब ये उसे किस तरह से लाभान्वित करेगा ये तो चुनावों का रिजल्ट बताएगा लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आखिर ये लिंगायत हैं कौन, जिन्हें खुश करने की कोशिश राज्य सरकार ने की है।

चलिए विस्तार से जानते हैं लिंगायत समुदाय के बारे में ?
आपको बता दें कि कर्नाटक की सियासत में लिंगायत समुदाय काफी मायने रखते हैं, उसका समाज में अपना एक प्रभुत्व है, अगड़ी जातियों में शामिल लिंगायत के बारे में कहा जाता है कि इनका मूड ही तय करता है कि राज्य में सरकार किसकी बनेगी?
समुदाय की स्थापना महात्मा बसवन्ना ने की
इस जाति के लोग काफी संपन्न और शिक्षित हैं। अगर इतिहास की बात करें को इनके बारे में 12 वीं शताब्दी में प्रमाण मिलते हैं। इन्हें देश के प्राचिनतम हिंदू धर्म का हिस्सा माना जाता है, ये ग्रुप भगवान शिव की पूजा करता है। इस समुदाय की स्थापना महात्मा बसवन्ना, जिन्हें कि भगवान बासवेश्वरा भी कहा जाता है, ने की थी। इन्हें आदि गुरु माना जाता है।

गुरु बसवन्ना मूर्ति पूजा के विरोधी थे
गुरु बसवन्ना मूर्ति पूजा के विरोधी थे और इसी वजह से ये समुदाय मूर्तियों की पूजा नहीं करता है। ये गले में इष्टलिंग धारण करते हैं, जिसे वो ऊर्जा का मानक मानते हैं। ये शिव को ही अपना देव मानते हैं। गुरु बसवन्ना खुद एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने इस जाति में फैले हुए सभी आंडबरों का विरोध किया था। इनका मानना है कि ईश्वर हर किसी मन में बसते हैं, बस इंसान को उसे समझने की जरूरत है।

'विमान बांधना '
यह समुदाय कर्म को प्रधान मानता है और कहता है कि इंसान के कर्म ही आपको स्वर्ग और नरक लेकर जाते हैं। 'लिंगायत' समुदाय के लोग शवों को दफनाते हैं और इनका कब्रिस्तान भी अलग होता है। ये शवों को शैय्या पर नहीं लिटाते बल्कि कुर्सी पर बिठाकर कब्र तक ले जाते हैं। दफनाने से पहले ये शवों को नहलाते हैं, उन्हें नए कपड़े पहनाते हैं। शव को कुर्सी पर बिठाने की परंपरा को 'विमान बांधना ' कहते हैं और फिर इसे कंधे पर लेकर कब्र तक जाया जाता है।

कर्नाटक में समुदाय का काफी प्रभाव
कर्नाटक में इस समुदाय का काफी प्रभाव है इसलिए हर राजनीतिक दल की कोशिश होती है को वो इस समुदाय को खुश रखे। राज्य में करीब 18 फीसदी आबादी लिंगायत की है और साल 1956 से ही इनका दबदबा कर्नाटक की राजनीति में दिखा है। 1956 से लेकर अब तक करीब 20 मंत्री इस समुदाय के ही रहे हैं। राज्य में 224 विधानसभा सीटें हैं ऐसे में लिंगायत समुदाय सीधा असर इन सीटों पर करता है। आपको बता दें कि पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से ही आते हैं।
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