दो साल में असम को बाल विवाह से मुक्त करने का दावा

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असम गिरफ्तारियों से प्रभावित महिलाओं के पुनर्वास के उपाय सुझाने के लिए एक समिति का गठन किया है. समाजशास्त्रियों ने बाल विवाह के खिलाफ आक्रामक अभियान के तरीके की आलोचना करते हुए कहा है कि सरकार को इस मामले में मानवीय रवैया अपनाना चाहिए था. लेकिन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि उनकी सरकार दो साल के भीतर असम को इस सामाजिक बुराई से मुक्त करने के लिए कृतसंकल्प है और ऐसे अभियान जारी रहेंगे.

दूसरी ओर, यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) के लंबित मामलों में असम पूर्वोत्तर राज्यों में पहले स्थान पर है. राज्य में दिसंबर 2022 तक 3,881 मामले लंबित थे. अब बाल विवाह के खिलाफ ताजा अभियान के बाद यह आंकड़ा और बढ़ने का अंदेशा है. इस बीच, गौहाटी हाईकोर्ट ने सरकार के इस अभियान पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है. गिरफ्तारियों के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि इस अभियान ने लोगों की निजी जिंदगी में तबाही ला दी है. इन मामलों में गिरफ्तार लोगों से हिरासत में पूछताछ की कोई जरूरत ही नहीं है.

बाल विवाह के ऊपर बड़ी कार्रवाई

असम सरकार ने बीते महीने के आखिर में बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए एक अहम फैसला किया था. इसके तहत राज्य में 14 वर्ष से कम उम्र की युवतियों के साथ विवाह करने वालों के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज करना और 14 से 18 वर्ष की लड़कियों से शादी करने वालों को बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत गिरफ्तार करना शामिल था. सरकार ने कहा था कि बाल विवाह के मामलों में वर-वधू की उम्र 14 वर्ष से कम होने की स्थित में विवाह को अवैध करार देते हुए वर को गिरफ्तारी के बाद जुवेनाइल कोर्ट में पेश किया जाएगा. बाल विवाह पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस को अगले दो सप्ताह के भीतर बड़े पैमाने पर राज्यव्यापी अभियान चलाने का निर्देश दिया गया था.

सरकार के इस फैसले पर काफी विवाद हुआ. विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे एक राजनीतिक स्टंट करा दिया तो अल्पसंख्यक संगठनों ने बीजेपी सरकार पर इसके जरिए मुसलमानो को निशाना बनाने का आरोप लगाया. लेकिन सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही. पुलिस ने बाल विवाह के अपराध में अब तक 4,235 मामले दर्ज कर छह हजार से ज्यादा अभियुक्तों की शिनाख्त की है. अब तक 93 महिलाओं समेत 3,047 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

बाल पंचायतों की भूमिका

अब सरकार ने इस सामाजिक कुरीति के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के लिए बाल पंचायतों के गठन का फैसला किया है. इसके साथ ही आम लोगों को साथ लेकर गांव-गांव में नियमित अंतराल पर बैठकें भी आयोजित की जाएगी. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कहते हैं, "बाल पंचायतों से बाल विवाह के खिलाफ पुलिस के मौजूदा अभियान में सहायता मिलेगी. बाल पंचायतों का जिम्मा राज्य में संबंधित जिले के उपायुक्तों को सौंपा गया है. इसके तहत बाल पंचायतें आयोजित कर लोगों और खासकर युवा वर्ग को जागरूक बनाया जाएगा."

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जिन जिलों में बाल विवाह के मामले ज्यादा हैं, बाल पंचायतें वहां खास ध्यान देंगी. इन पंचायतों के अध्यक्ष नोडल अफसर के तौर पर काम करेंगे और उनको आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के साथ ही डॉक्टरों व पुलिस का भी सहयोग मिलेगा.

मुख्यमंत्री सरमा का दावा है कि सरकार के अभियान का सकारात्मक असर नजर आने लगा है और राज्य के विभिन्न हिस्सों में लोग स्वेच्छा से बाल विवाह स्थगित कर रहे हैं.

बड़े पैमाने पर घर के कमाऊ सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद यह सवाल पूछा जा रहा था कि प्रभावित परिवार की रोजी-रोटी कैसे चलेगी? अब सरकार ने जबरन बाल विवाह की शिकार युवतियों को मुआवजा देने के लिए एक समिति का गठन किया है. इस समिति में तीन कैबिनेट मंत्री शामिल हैं. समिति से 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है. इसकी समयसीमा 25 फरवरी को है.

पॉक्सो के लंबित मामले

इस बीच, गौहाटी हाईकोर्ट ने इस अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी के लिए सरकार को फटकार लगाई है. इस मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत का कहना था, इस अभियान ने लोगों की निजी जिंदगी में तबाही ला दी है. इन मामलों में हिरासत में पूछताछ की कोई जरूरत ही नहीं है. हाईकोर्ट ने इन मामलों में गिरफ्तार लोगों के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो) और बलात्कार जैसे कड़े कानूनों को लागू करने के लिए भी सरकार की खिंचाई की है.

बाल विवाह के तहत पॉक्सो के तहत बड़े पैमाने पर होने वाली गिरफ्तारियों के बीच यह खबर भी सामने आई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों में असम पूर्वोत्तर राज्यों में पहले स्थान पर है. राज्य में दिसंबर 2022 तक 3,881 मामले लंबित थे. केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में हाल में यह आंकड़ा पेश किया है. मंत्री ने बताया कि बीते तीन वर्षों के दौरान असम में ऐसे लंबित मामलों की संख्या तीन गुना से ज्यादा हो गई है.अब बाल विवाह के खिलाफ ताजा अभियान के बाद यह आंकड़ा और बढ़ने का अंदेशा है.

Source: DW

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