मुजफ्फरनगर दंगा: किसकी नजर लगी सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब पर!
मुजफ्फरनगर। सदियों से चली आ रही गंगा-जमुनी तहजीब के लिए उत्तर प्रदेश हमेशा से ही सुर्खियों में रहा है। यहां के आपसी भाइचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की दूसरे प्रदेशों में मिसालें दी जाती थीं, लेकिन लगता है इस तहजीब को किसी की नजर लग गई है। सदियों पुराना सामाजिक तानाबाना धीरे-धीरे ही सही मगर अब दरकने लगा है। शुक्रवार को मुजफ्फनगर में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में करीब एक दर्जन लोग हिंसा की भेंट चढ़ गए। दिलचस्प बात यह है कि एक दिन पहले ही सूबे के पुलिस महानिदेशक ने खुद वहां जाकर स्थिति का जायजा लिया था, लेकिन दुर्भाग्यवश वह भी हिंसा को रोकने में कामयाब नहीं रहे।
सरकार की ओर से मृतकों को मुआवजे का ऐलान कर मामले को ठंडा करने की कोशिश की गई तो विपक्षी दलों ने भी एक सुर से सरकार पर हल्ला बोलकर और मुआवजे की मांग कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता कहते हैं कि छेड़छाड़ की एक छोटी सी घटना ने इतना बड़ा रूप अख्तिायार कर लिया। यह किसकी विफलता है। सरकार यदि उसी समय कारगर कदम उठाती तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। समाजिक तानेबाने को बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी की है।

जिले के एक कागज व्यावसायी आफताब आलम कहते हैं कि पता नहीं हमारे क्षेत्र को किसकी नजर लग गई। पहले तो ऐसा नहीं होता था। छोटे मामलों को आपस में मिल बैठकर सुलझा लिया जाता था, लेकिन अब वाकई में इलाके का समूचा सामाजिक तानाबाना मानो दरक रहा है। आफताब की चिंता लाजिमी भी है क्योंकि पश्चिमी उप्र में होने वाले किसान आंदोलनों में नमाज और पूजा एक साथ होती थी। एक ही मंच से हर-हर महादेव और अल्लाह हो अकबर की गूंज सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाने का काम करती थी लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक दोनों संप्रदायों के बीच दूरियां लगातार बढ़ रही हैं। रालोद के प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह चैहान कहते हैं कि पश्चिमी उप्र में गंगा-जमुनी तहजीब को सियासदानों की नजर लग गयी है। पिछले एक महीने से इस इलाके को बारूद का ढेर बनाने की कोशिश की जा रही थी और कुछ लोग अपने मकसद में कामयाब हो गए।












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