वाह री सरकार! 1 रुपए में दूर कर डाली 17 करोड़ लोगों की गरीबी!
[नवीन निगम] क्या कमाल का काम किया है सरकार ने, रोजाना कमाई में महज एक रुपये बढ़ाकर एक झटके में 17 करोड़ लोगों की गरीबी दूर कर दी। आज सुबह सरकार के एक अमीर आदमी (भिखारी) से मिला। कहा पैसे तभी दूंगा जब सच-सच बताओ एक दिन में भीख मांगकर कितना कमा लेते हो, वो आश्चर्य से मुझे देख रहा था फिर धंधे की संवेदना को देखते हुए बोला, हनुमान जी, साई और शनिदेव वाले दिन 200 से 250 और बाकी दिन 100 से 140 तक कमा लेता हूं। मैंने भी सरकार के इस अमीर आदमी को एक रुपया देकर उसे और अमीर बना दिया।
फिर मैं पास की ही एक झुग्गी झोपड़ी में गया, वहां देखा तो हर तरफ अमीर ही बस रहे थे। सरकार के आंकड़ों के हिसाब से वहां हर कोई अमीर था वह भी थोड़ा बहुत नहीं, बहुत ज्यादा अमीर। वहीं पास की एक दुकान पर खड़ा हो गया और चाय पीने आए झुग्गी-झोपड़ी के इन अमीरों से बात करने लगा। पता लगा कि यहां पड़ी झुग्गियों में रहने के लिए हर परिवार को इसी इलाके के एक दबंग को 500 से 650 रुपये प्रति महीना देना पड़ता है। लाइट के 200 से 250 अलग से। यानी लगभग आठ, नौ सौ रुपए प्रतिमाह।
दुकान पर खड़ा हर व्यक्ति मंहगाई का रोना रो रहा था, ज्यादातर का कहना था कि वह चाहते है कि उनके बच्चे पढ़े लिखे लेकिन मंहगाई और खर्च न चला पाने के कारण वह अपने बच्चों को भी किसी न किसी रोजगार पर लगाए है तभी शाम को सभी खाना खा पाते है। मैंने जब उन्हें बताया कि सरकार तो आपको अमीर मानती है तो उनका मुंह खुला का खुला रह गया। एक दो नौजवानों ने बहस की तो मैंने उन्हें अखबारों का हवाला दिया तो थोड़ा पढ़े लिखे यह नौजवान तुरंत अखबार पर लपके जो मैं इन अमीर आदमी के लिए विशेष रुप से ले गया था। क्योंकि यह अमीर नौजवान अखबार जैसी गरीब चीज भी नहीं खरीद पाते। खैर अखबार में जो कुछ सरकार ने कहा था उसकी इन नौजवानों ने जमकर ......(असंसदीय भाषा) की और अपनी अमीरी बटोरने निकल गए।
आइये जानते है सरकार की देश की गरीब (अब अमीर) जनता के साथ किए गए इस मजाक की हकीकत?

जनता के साथ मजाक
कहने को सरकार ने सेहरा अपने माथे बांध तो लिया है, लेकिन पिछले दो वर्षो में महंगाई की स्थिति को देखते हुए ये आंकड़े आम जनता के साथ जरूर मजाक सरीखे लगते हैं। सितंबर, 2011 में सरकार ने जब गांव में 26 रुपये रोजाना से ज्यादा कमाई वालों को गरीब मानने के सिद्धांत को खारिज किया था, तब से आज तक रसोई के जरूरी सामानों की कीमतें 10 से लेकर 40 फीसद तक बढ़ चुकी हैं।

न्यूनतम 35 रुपये रोजाना की जरूरत
मौजूदा कीमतों के लिहाज से लखनऊ में रोजमर्रा के जरूरी सामान के लिए एक व्यक्ति को न्यूनतम 35 रुपये रोजाना की जरूरत पड़ेगी। अभी आटा 20 रुपये प्रति किलो और चावल सामान्य, 28 रुपये प्रति किलो है। प्रति व्यक्ति न्यूनतम खुराक 250 ग्राम आटा और चावल पर ही रोजाना 12 रुपये खर्च करने होंगे। इसके अलावा सरसों तेल, आलू, प्याज, हरी सब्जी, दाल, दूध, चाय, नमक, मसालों पर 30 रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे। यह स्थिति तब है जब सिर्फ दाल, रोटी, चावल और मामूली सब्जी ही बनाई जाए।

अर्थशास्त्री ने भी उठाया सवाल
एक अर्थशास्त्री ने सवाल उठाया कि जब गरीबों की संख्या 15 फीसद कम हो गई है तो फिर इन वर्षो में राशन के दुकानों के जरिये खाद्य वितरण की राशि इतनी तेजी से क्यों बढ़ी है, सरकार को इस बात का भी जबाव देना होगा जब खुदरा महंगाई की दर सालाना 10 फीसद से ज्यादा रही है, तब वह रोजाना कमाई में सिर्फ एक रुपये की वृद्धि कर गरीबी कैसे कम रही है।

सरकार में कोई देखने समझने वाला नहीं
करीब दो वर्ष पहले उसने यह पाया था कि गांव और शहरों में क्रमश 26 और 32 रुपये से अधिक पाने वाले गरीब नहीं माने जाएंगे। गांवों और शहरों के लोगों की आय में एक-एक रुपये की वृद्धि के आधार पर सरकार जिस तरह गरीबी रेखा के ऊपर-नीचे के लोगों के मानक तय कर रही है उससे यह भी स्पष्ट है कि कोई भी यह देखने-समझने वाला नहीं है कि पिछले डेढ़-दो वर्षो में महंगाई किस कदर बढ़ी है और उसके चलते आम आदमी और विशेष रूप से निर्धन तबके को कितनी अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

यथार्थ को झुठलाने का इरादा
सरकार के आर्थिक विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि गांव में रहने वाला पांच सदस्यों का कोई परिवार प्रतिदिन 135 रुपये अथवा माह में 4080 रुपये की कमाई में भली तरह से अपनी गुजर करने में समर्थ है तो इसका मतलब है कि यथार्थ को झुठलाने का इरादा कर लिया गया है। गरीबी रेखा के इस विचित्र फार्मूले के सामने आने के बाद यह संदेह और गहराता है कि पिछले दिनों निर्धन आबादी के संदर्भ में जो आंकड़े जारी किए गए वे भी इसी तरह की कवायद का परिणाम हो सकते हैं।
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