पर्यावरण की उपेक्षा के कारण होती हैं आपदाएं: रवि चोपड़ा

नई दिल्ली। यदि विकास पर्यावरण के अनुकूल हो तो उत्तराखंड की तरह की मानवीय त्रासदी को टाला जा सकता है। यह बात एक पर्यवरणविद ने कही है, जिनके मुताबिक पौधरोपण किया जाना चाहिए, नदियों के किनारे से कम से कम 100 मीटर की दूरी पर मकान बनाए जाने चाहिए और तीर्थयात्रा का नियमन किया जाना चाहिए।

देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक और राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के सदस्य (विशेषज्ञ) रवि चोपड़ा ने आईएएनएस के साथ टेलीफोन पर हुई विशेष बातचीत में कहा, "यदि हम पहाड़ों में बारिश और बाढ़ के असर को कम नहीं कर सकते हैं, तो फिर हमारे पास करने के लिए बिल्कुल सीमित विकल्प है। हमें अधिक से अधिक हरियाली की तरफ बढ़ना चाहिए। पर्यावरण अनुकूल विकास से प्राकृतिक त्रासदी टाली जा सकती है।"

चोपड़ा के मुताबिक पहाड़ों पर सड़क बनाते वक्त भी सावधानी बरतनी चाहिए। पहाड़ के किनारे को काट कर सड़क बनाने से उसकी ढलान कमजोर हो जाती है। यदि उसकी बनावट का ध्यान नहीं रखा जाए, तो भूस्खलन की सम्भावना बढ़ जाती है। चोपड़ा ने कहा, "पहाड़ों की बनावट के साथ छेड़छाड़ करने पर छोटे-बड़े भूस्खलन होते हैं।"
उन्होंने कहा, "दिशानिर्देश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मकान नदियों के किनारे से 100 मीटर दूर स्थित होने चाहिए।"

केदारनाथ सहित उत्तराखंड में नदियों के किनारे बने सैकड़ों मकान बाढ़ में ढह गए। हर साल हजारों की संख्या में होने वाली तीर्थ यात्रा को भी नियमित करने के लिए दिशानिर्देश की जरूरत है। चोपड़ा ने कहा, "कुछ साल पहले गंगोत्री-गौमुख में हिमनद के पिघलने को लेकर चिंता जताई जा रही थी। उसके बाद सरकार ने तीर्थयात्रियों की संख्या को 150 पर सीमित कर दिया। यदि यह वहां हो सकता है, तो अन्य तीर्थस्थलों पर क्यों नहीं हो सकता है।"

उत्तराखंड में 14 जून से लगातार होने वाली तीन दिनों की बारिश से बादल फटने की स्थिति पैदा हो गई और अचानक बाढ़ आ गई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। तबाही का मंजर सबसे अधिक केदारनाथ में देखने को मिला। केदारनाथ में तब हजारों पर्यटक मौजूद थे। उन इलाकों में फंसे 70 हजार से अधिक पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को सैनिकों, अर्धसैनिकों तथा अन्य अधिकारियों ने बचाया। चोपड़ा ने कहा कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को पर्यटन से 2,500 करोड़ रुपये मिलता है, जो यहां की योजना विकास कोष का तीन गुणा है। उन्होंने कहा, "स्पष्ट है कि हमें कहीं न कहीं संतुलन स्थापित करना होगा।"

उन्होंने कहा कि एक सलाह यह है कि केदारनाथ जाने वाले हर यात्री को जीपीएस उपकरण लगाया जाए, ताकि उसकी खोज की जा सके। यह अच्छा विचार है। लेकिन जरूरत है ऐसे प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जाए, जो क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गौर करने से किया जा सकता है। केदारनाथ और बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा साल में छह महीने होती है और तीर्थयात्रियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं है।

1996 में बाढ़ और भूस्खलन के कारण 243 अमरनाथ यात्रियों के मारे जाने के बाद सरकार ने नीतीश के. सेनगुप्ता समिति गठित की थी, जिसने तीर्थयात्रियों की संख्या और उनकी उम्र को लेकर दिशानिर्देश जारी किए थे। अमरनाथ श्राइन बोर्ड पर्यटकों की संख्या को सीमित रखता है, लेकिन केदारनाथ-बद्रीनाथ के तीर्थयात्रियों पर ऐसी कोई सीमा नहीं है।

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