गठबंधन टूटने के लिए भाजपा खुद जिम्मेदार
लखनऊ(नवीन निगम)। नीतीश कुमार द्वारा बिहार की सत्ता से भाजपा को बाहर निकाल फेंकने के बाद भाजपा के नेता इसे विश्वासघात बता रहे है लेकिन इस विश्नासघात के लिए जितने जिम्मेदार नीतीश हैं उससे ज्यादा जिम्मेदार भाजपा खुद हैं। सन 2000 में बिहार में जब भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की संख्या 67 थी और जेडीयू के विधायकों की संख्या सिफऱ् 34 थी, और केंद्र में एनडीए की सरकार थी तब बहुमत न होते हुए भी एनडीए चुनाव से पहले सबसे बड़ा ग्रुप था यह अलग बात थी कि उसके पास बहुमत नहीं था। तब भाजपा में अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री थे।
नीतीश अटल और आडवाणी दोनों के चहेते थे। भाजपा के विधायकों की संख्या अधिक होने की वजह से स्वाभाविक था कि मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। भाजपा ने फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से और यशवंत सिन्हा से मुख्यमंत्री बनने को कहा लेकिन सबको पता था कि एनडीए विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएगा। ऐसी दशा में भाजपा के इन दिग्गजों ने मुख्यमंत्री बनने से मना कर दिया।

क्योंकि इन्हें डर था कि केंद्रीय मंत्री का पद छोड़कर बिहार जाने के बाद वह वहीं के होकर रह जाएंगे। ऐसी दशा में अटल-आडवाणी के कहने पर नीतीश ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया। वह रेलमंत्री थे और इस आश्वासन के साथ बिहार गए थे कि आगे भी जब सीएम बनाने का मौका आएगा तो उन्हें ही वह मौका दिया जाएगा। आज यदि राजनाथ सिंह यह बात कहते है कि हमने तब भी हमने बड़े दिल का परिचय देते हुए कहा कि जनतादल यूनाइटेड हमारा छोटा भाई है इसलिए मुख्यमंत्री यदि बनना चाहिए तो जनता दल यू का ही बनना चाहिए।
यह बात गलत है भाजपा के वरिष्ठ नोताओं से पूछा जाना चाहिए कि वह उस समय सीएम बनने को क्यों नहीं तैयार हुए। शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा की पार्टी को जवाब देना चाहिए। नीतीश ने सात दिन के सीएम बनने का जो दाग अपने ऊपर लिया था वहीं आगे चलकर उनके काम आया। अब भाजपा के अध्यक्ष इसे अपनी उदारता बताए तो यह बात बचकानी लगती हैं।
भाजपा हमेशा संगठन की दृष्टि से तो मजबूत रहती है लेकिन नेताओं की दृष्टि से कमजोर। सन 2000 में जब बिहार में मुख्यमंत्री के लिए भाजपा का कोई नेता तैयार नहीं था तब सुशील मोदी को सीएम बनाने की बात भी चली थी,अब भाजपा के उन आला नेताओं ने जिन्होंने खुद सीएम बनने से इनकार कर दिया था सुशील मोदी को भी सीएम नहीं बनने दिया क्योंकि न वह खुद बनना चाहते थे और न किसी प्रदेश स्तरीय नेता को आगे बढ़ता देखना चाहते थे। यदि भाजपा ने उस समय ही सीएम अपनी पार्टी से बना दिया होता तो बिहार में हमेशा के लिए यह पद भाजपा के पास रह गया होता।
भाजपा को इस बारे में कांग्रेस से सबक सीखना चाहिए। महाराष्ट्र में कांग्रेस का गठबंधन इसलिए चल रहा है क्योंकि सीएम का पद कांग्रेस के पास सुरक्षित है। पिछली बार जब एनसीपी ने कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीत ली थी तब एनसीपी ने कोशिश कि सीएम का पद उसके पास चला जाए। लेकिन काग्रेंस ने साफ कर दिया कि यह गठबंधन में पहले ही तय हो चुका है कि सीएम कांग्रेस का ही होगा। आज भी देखे तो पंजाब में भाजपा को कल अकाली बाहर निकालकर सत्ता पर खुद कब्जा कर ले तो भाजपा के नेताओं के सामने रोने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
भाजपा की यहीं स्थिति महाराष्ट्र में हैं। भाजपा कभी शिवसेना से कह नहीं पायी कि वह अपना सीएम बनाना चाहती है। आज जब बाल ठाकरे के निधन के बाद भाजपा को बंटी हुई शिवसेना को पूर्ण पराजित करने का सुनहरा मौका है लेकिन वह इतनी बड़ी हिम्मत नहीं जुटा सकती कि उद्धव ठाकरे की शिव सेना को छोड़कर राज की शिवसेना से समझौता करले और अपना सीएम खड़ा करे।
भाजपा हमेशा राज्यों में क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू पार्टी बनकर रही। उड़ीसा, कर्नाटक, हरियाणा, बिहार और उप्र में उसने सरकार बनाने में बारबार इन क्षेत्रीय दलों से धोखा खाया। क्योंकि भाजपा में दिल्ली में बैठे शीर्ष नेताओं ने क्षेत्रीय नेताओं को कभी उभरने नहीं दिया। क्योंकि उन्हें इन नेताओं से सदैव डर लगता था।
कल्याण सिंह और अटल के बीच मनमुटाव इसका साक्षात उदाहरण हैं। नरेंद्र मोदी के उठान से भाजपा के क्षेत्रीय नेताओं में आगे बढऩे की उम्मीद जगी। तभी शिवराज सिंह और रमन सिंह ने आडवाणी का मोहरा बनने से इनकार कर दिया क्योंकि पहली बार भाजपा में सूबेदारों को पार्टी पर काबिज होने का मौका मिल रहा हैं।












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