कितने घाटे-फायदे में रहेंगी बिहार की सियासत

पटना (नवीन निगम)। अब जबकि बिहार में भाजपा-जदयू का गठूंधन टूटने की कगार पर हैं और शायद आज टूट भी जाएगा तो यह पता लगाना जरुरी है कि आखिर जमीनी हकीकत क्या हैं। बिहार की सियासी भूमि पर आगे दोनों दलों के दांव क्या होंगे। क्या कांग्रेस लालू का साथ छोड़ नीतीश के साथ जाएंगी या लालू, नीतीश और पासवान में दोस्ती करवाने की कोशिश करेंगी। आइये जानते है शतरंज की इन चालों के साथ कौन सी पार्टी कहां खड़ी हैं।

कांग्रेस

अब सबसे बड़ी भूमिका में कांग्रेस आ जाएंगी। नीतीश चाहेंगे कि कांग्रेस बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दें लेकिन लालू कांग्रेस को अभी यह कदम उठाने से रोकेंगे। कांग्रेस नीतीश के साथ फिलहाल दोस्ती के साथ दूरी भी बनाकर रखेंगी। क्योंकि नीतीश से दोस्ती उसे लालू से दूर ले जा सकती हैं। जो हमेशा भाजपा के विरोध का झंड़ा बुलंद किए रहते हैं। कांग्रेस लालू का साथ छोडऩा नहीं चाहेगी।

nitish kumar
जदयू (नीतीश कुमार)

17 साल पहले नीतीश ने बीजेपी पर दांव लगाया था। साल 2000 में सात दिन के लिए ही सही लेकिन वो पहली बार सीएम बने। इस दांव का फायदा 2005 में मिला। बिहार में मुसलमान करीब 17 फीसदी हैं। इनमें से 80 फीसदी पिछड़े यानी पसमांदा मुसलमान हैं। यही वोटर नीतीश की ताकत हैं जिनके लिए उन्होंने कई योजनाएं चलाईं। नीतीश ने इस वोट बैंक को नौ साल पहले मिले सबक के बाद जोड़ा है। दरअसल, 2004 में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में जेडीयू-बीजेपी को सिर्फ 11 सीट मिलीं।

खुद नालंदा और बाढ़ से खड़े हुए नीतीश कुमार बाढ़ में हार गए। माना गया कि मुस्लिम वोटरों ने नीतीश को गुजरात दंगों पर चुप रहने की सजा दी लिहाजा 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने मोदी को प्रचार के लिए आने से मना कर दिया। दांव काम कर गया जबरदस्त जीत हासिल कर 2005 में नीतीश बिहार के सीएम बने। जानकारों का मानना है कि नीतीश 2014 में मोदी विरोध का दांव फिर आजमा रहे हैं। वो
नहीं चाहते कि मोदी के खिलाफ झंडा बुलंद करने में लालू उनसे आगे निकल जाएं और मुस्लिम वोट उनकी झोली में जा गिरें। लेकिन नीतीश शायद यही चूक कर रहे हैं वह भाजपा के साथ इतनी लम्बी पारी खेल चुके हैं कि अब वह भाजपा विरोधी छवि आसानी से नहीं अपना पाएंगे।

राजद (लालू प्रसाद यादव)

इस टूट से अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदा मिलता दिख रहा है तो वह लालू प्रसाद यादव। भाजपा -जदयू के गठबंधन ने उन्हें हाशिए पर डाल दिया था। लेकिन नीतीश को वह चैन नहीं लेने देंगे। 2002 में गुजरात के दंगों के वक्त केंद्र में नीतीश वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे। दंगों में मोदी की भूमिका के सवाल पर रामविलास पासवान ने वाजपेयी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया लेकिन नीतीश की रेल पटरी से नहीं उतरी। 2004 तक वो सरकार में बने रहे।

आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं कि नीतीश बीजेपी के साथ हमेशा रहे। आरएसएस के साथ रहे। अब वे अलग कहां जाएंगे। ये सब नौटंकी है। नीतीश अवसरवादी हैं। लालू पूरे बिहार में इसका प्रचार करेंगे कि नीतीश भाजपा के ही एंजेंट हैं और मोदी का विरोध तो मात्र दिखावा हैं। इस तरह नीतीश त्रिकोणीय लड़ाई में फंस जाएंगे। जिसमें लालू उनपर भारी पड़ सकते हैं। अगड़े वोट पर अब पिछड़ों की सियासत करने वाले लालू यादव जैसे नेता भी डोरे डाल रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में लालू यादव सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का वादा कर चुके हैं।

भाजपा

इस टूट से सबसे परेशान भाजपा है लेकिन नरेंद्र मोदी के आने वह बाजी पलट सकती हैं। बिहार में अगड़ों की कुल आबादी करीब 21 फीसदी है। माना जाता है कि करीब 13 फीसदी अगड़े वोट पर बीजेपी का कब्जा है। जेडीयू के 20 सांसदों की जीत में बीजेपी के अगड़े वोटों का बड़ा हाथ है। राज्य स्तर की सियासत में अगड़े वोट का असर और ज्यादा है। विधानसभा की कुल 243 सीटों पर 76 अगड़े विधायक काबिज हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में इनकी संख्या लगातार बढ़ी है। साल 2000 में विधानसभा में 56 अगड़े विधायक पहुंचे। 2005 में अगड़े विधायकों की संख्या 59 हो गई।

जाहिर है बिहार की सियासत में अगड़ों का असर बढ़ रहा है। बहुत से जेडीयू विधायकों के इलाके में अगड़े वोट नतीजे बदलने की ताकत भी रखते हैं, लिहाजा बीजेपी का साथ छोडऩे की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है। बीजेपी नेता भी बार-बार इस तरफ इशारा कर रहे हैं। मोदी के आने से जहां भाजपा का अगड़ा वोट मजबूत होगा वहीं भाजपा बिहार में एक मोदी को अति पिछड़े वर्ग से होने वाला पहला प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करेंगी।

अति पिछड़ा वोट बैंक ही नीतीश की ताकत हैं मोदी के आने से भाजपा ने यदि उसमें सेंध लगा ली तो वह परिणामों को पलट कर रख सकती हैं। 21 फीसदी अंगड़ों के वोट बैंक में से यदि भाजपा 20 फीसदी पर भी काबिज हो गई और मोदी के अति पिछड़े होने के नाम पर यदि भाजपा कुछ प्रतिशत वोट पिछड़ों के भी ले आई तो उसकी लाटरी निकलना तय हैं क्योंकि बाकी के वोट में लालू, नीतीश, पासवान और कांग्रेस हिस्सेदारी करेंगे। यहा सोचकर भाजपा भी गठबंधन टूटने की परवाह नहीं कर रही हैं।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+