वाह-वाह विरोधी ही कर रहे मोदी का प्रचार
उप्र में एक कहावत है मरा-मरा लगातार बोलते रहो तो राम-राम हो जाता है। लगता है भारतीय राजनीति पर आजकल यह कहावत बिलकुल सटीक बैठ रही हैं। मोदी जो गुजरात दंगों के लिए दोषी ठहराए जाते हैं, उन्हें भाजपा के नेता गुजरात में ही नहीं देखना चाहते थे लेकिन वह वहां से बाहर निकल कर भाजपा के राष्ट्रीय पटल पर छा गए। यहां तक की भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा का पितामह बना डाला। अब देखिए जिस भाजपा के खिलाफ उप्र में सपा कुछ नहीं बोलती थी यहां तक की उप्र के राजनाथ सिंह के भाजपा अध्यक्ष बनने पर भी सपा के किसी नेता ने प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं समझा आज उसी के नेता नरेंद्र मोदी ही नहीं उनके प्यादे अमित शाह पर भी टिप्पणी कर रहे हैं।
बेंगलूर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कद बढऩे का उत्तर प्रदेश में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि वह राज्य की राजनीति से बहुत कम परिचित हैं। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश के लोग मोदी को बहुत कम जानते हैं। उनका जादू केवल टीवी और गुजरात में ही चलता है। उधर कांग्रेस नेता और केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने नरेंद्र मोदी को कांग्रेस के लिए चुनौती माना। पहली बार कांग्रेस के किसी नेता ने नरेंद्र मोदी के प्रभाव को स्वीकार किया है। रमेश ने कहा मोदी निश्चित तौर पर हमारे लिए चुनौती हैं, वह एक अच्छे प्रबंधक हैं। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि मोदी गुजरात में तीन चुनाव जीत चुके हैं और एक बेहतरीन प्रचारक हैं, लेकिन इससे उनकी पार्टी डरती नहीं। इससे पहले, कांग्रेस मोदी के प्रभाव को सिर्फ गुजरात तक ही सीमित मानती रही है।

भाजपा के उप्र के प्रभारी बनाए गए अमित शाह जब लखनऊ आए तो नगर विकास मंत्री आजम खां की टिप्पणी की थी कौन है यह अमित शाह मैं तो नहीं जानता। अब आजम खां से कोई पूछ ले कि सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड जिस पर आप हजारों बार बोले चुके है और अमित शाह को कोस चुके है उन्हें आप नहीं जानकर क्या संदेश देना चाहते हैं। इस बीच नरेन्द्र मोदी के दुलारे अमित शाह लखनऊ में अपनी पहली प्रेस काफ्रेंस में जिस तरह सपा सरकार पर आतंकियों को छोडऩे और पशु तस्करी को लेकर हमला किया उससे साफ हैं कि बीजेपी यहां क्या करना चाह रही है।
यानी भाजपा हिंदू कार्ड खेलेंगी और मोदी के पिछड़े वर्ग के कार्ड को भी। सपा राज में कई जिलों में हुए दंगें वैसे ही भाजपा को उर्वरा उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में यदि भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी को लेकर पक्ष-विपक्ष बनेगा तो फायदा मोदी को मिलना तय है क्योंकि जब आप बार बार मरा-मरा रटेंगे तो थोड़ी देर बाद राम-राम हो जाएगा और यह भारतीय राजनीति में पहले भी कई बार हो चुका हैं। वीपी सिंह और लालकृष्ण आडवाणी इसके उदाहरण हैं। जिन्हें जितना कोसा गया वो उतना ही आगे बढ़े।












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