अखबार बेचने वाला शिवा अब पढ़ेगा IIM कलकत्‍ता में

बेंगलुरु। सुबह चार बजे जैसे ही अलार्म बजता, बैंगलोर के बानसवाडी में रहने वाला एन शिवा कुमार हर रोज अपने इलाके के 500 से ज्‍यादा घरों में जाकर अखबार डाल कर आता। शिवा की यह आदत कक्षा छह से पड़ी, जबसे उसने न्‍यूज़पेपर वेंडर का काम शुरू किया। उसकी मेहनत और लगन ही है कि जिस शिवा ने आज तक बैंगलोर से बाहर कदम नहीं रखा, सीधे भारतीय प्रबंध संस्‍थान कलकत्‍ता पढ़ने जायेगा।

टीओआई की खबर के अनुसार शिवा के माता-पिता अनपढ़ हैं और उन्‍हें आईआईएम की अहमियत तक नहीं पता है। वो बस इतना जानते हैं कि उनका बेटा शहर से बाहर पढ़ने जा रहा है। शुरू से ही कर्ज से लदे इस परिवार के शिवा का सपना कब का अधूरा रह गया होता, अगर बनसवाडी के कृष्‍ण वेद व्‍यास ने शिवा की फीस नहीं दी होती। जिस समय शिवा के घर पर खाने तक के लाले थे, उस समय उसके स्‍कूल से नोटिस आ गया कि फिस भरो नहीं तो स्‍कूल छोड़ दो। तब शिवा अपने ग्राहक वेद व्‍यास के पास गया और एक सेमेस्‍टर की फीस के लिये भीख मांगी। एक आम आदमी की तरह उन्‍होंने तुरंत इंकार कर दिया। शिवा ने कई और लोगों से फीस भरने की बिनती की लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

लेकिन अचानक वेद व्‍यास के मन में कुछ आया और वो शिवा के स्‍कूल पहुंच गये और उसका रिकॉर्ड चेक किया। शिवा अपने स्‍कूल का टॉपर था। यह देखकर वेद व्‍यास ने सेमेस्‍टर तो दूर की बात, पूरे साल की फीस दे दी। तब से लेकर आज तक श्री व्‍यास शिवा की पढ़ाई का खर्च उठाते आ रहे हैं। जब कि उनका खुद का परिवार है खुद के खर्चे भी, लेकिन इस नेका काम के लिए उनकी जितनी तारीफ की जाये कम है।

शिवा की बात करें तो घर की माली हालत खराब होने की वजह से उसने बचपन से लेकर जवानी तक काम के अलावा कुछ नहीं देखा। जब वो कक्षा 3 में पढ़ता था, तो बाकी बच्‍चे घर जाकर खेलते-कूदते थे, और शिवा सड़कों पर फूल के गजरे बेचता था। उसकी मां सड़क किनाने फूल की टोकरी लगा कर बैठ जाती थी और दिन भर गजरे बनाती थी। शाम को जब थक हार के शिवा घर पहुंचता तब जाकर उसे पढ़ाई करने का कुछ मौका हालिस हो पाता।

शिवा की लगन ही थी कि वो पढ़ता गया और आगे चलकर बैंगलोर इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी में उसका बीटेक में एडमीशन हो गया। फिर भी उसने अखबार बेचना बंद नहीं किया। शिवा के अनुसार वो कक्षा में सबसे पीछे बैठता था, ताकि पहले-दूसरे पीरियड में एक नींद मार लें और बाकी के पीरियड्स में उसका ध्‍यान पढ़ाई में लग सके।

एक समय में टाइम्‍स ऑफ इंडिया की 50 प्रतियां बेचता था आज 500 से अधिक प्रतियां बेचने वाले शिवा को यह सफलता उसके कमिटमेंट और टाईम मैनेजमेंट के कारण मिली। कमिटमेंट यह कि हर हाल में सुबह 6 बजे के पहले वो आपके घर पर अखबार पहुंचायेगा। टाईम मैनेजमेंट इसलिये क्‍योंकि सुबह 4 बजे से रात के 12 बजे तक पढ़ाई और काम, दोनों करना हर किसी के बस की बात नहीं।

आईआईएम कलकत्‍ता में सेलेक्‍शन के बाद शिवा ने शिक्षा ऋण के लिये अप्‍लाई कर दिया है। शिवा की इच्‍छा है कि वो आगे चलकर ऐसी संस्‍था बनाये, जो गरीब मेधावी बच्‍चों की पढ़ाई का खर्च उठाये। एक और खास बात शिवा ने बतायी कि बचपन से ही हर रोज अखबार बेचना होता था और अखबार साल के तीन-चार दिन ही बंद होता है, इस वजह से उसने अभी ठीक से बैंगलोर तक नहीं देखा। यहां तक वो बैंगलोर से बाहर कभी नहीं गया। अब यही शिवा सीधे कोलकाता में आईआईएम के कैम्‍पस में कदम रखेगा।

देश के इस मेधावी छात्र शिवा और उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने वाले कृष्‍ण व्‍यास को वनइंडिया का सलाम।

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