चीनी घुसपैठ: भारतीय मीडिया को अपनी सेना पर विश्वास नहीं!
(नवीन निगम)। अफसोस है कि भारतीय मीडिया सेना के बारे में लिखते समय सावधानी नहीं रखता। प्रोफेशन में एक-दूसरे से आगे बढऩे की होड़ में भारतीय मीडिया सेना के खिलाफ भी चला जाता है। उसे अपने देश की सरकार पर यकीन न हो ठीक है, लेकिन उसे देश की सेना, जिसने भारत का सिर कभी झुकने नहीं दिया, के बारे में लिखने से पहले दस बार सोचना चाहिए।
क्या जब अमेरिका के अखबार और पत्रिकाएं भारत की कूटनीति और सेना के हौंसले की तारीफ करेगी, हमें तभी यकीन आएगा कि भारत ने पिछलों दिनों कूटनीति के क्षेत्र में चीन को वो मात दी है, जिसे चीन कई वर्षों तक याद रखेगा। पाक सीमा पर तैनात यदि कोई जवान अखबार में पढ़ेगा कि भारत और चीन के बीच लद्दाख में पिछले तीन सप्ताह से चला आ रहा सैन्य गतिरोध तब सुलझा जब भारतीय सेना चुमार में पीछे हट गई या उसने अपने बनाए बंकर नष्ट कर दिए। तो उसके मनोबल पर क्या असर पड़ेगा। छोटे-छोटे देश अपनी पराजय को भी जीत में दिखाते हैं, जिससे सेना का हौंसला कायम रहे।
कारगिल युद्ध के समय और उसके बाद भारतीय मीडिया ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि हमारे जवान ज्यादा मारे गए, हमको ज्यादा नुकसान हुआ जबकि बाद में यह साफ हो गया कि घुसपैठियों के साथ पाक सेना के ज्यादा जवान कारगिल में शहीद हुए। क्योंकि वो खुलकर नहीं लड़ पाए। एक तरफ हमारे नेता है जिन्हे सेना के क्रियाकलापों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती और वह इस बारे में उल्टे-सीधे बयान देते रहते हैं। अब हमारे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ले लीजिए जनाब बराबर एक ही बयान रटे जा रहे है कि चीन की सेना पीछे हटी तो भारत की सेना पीछे क्यों हटी जबकि हम अपनी जमीन पर खड़े थे।

कारगिल और मीडिया
कारगिल युद्ध के समय और उसके बाद भारतीय मीडिया ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि हमारे जवान ज्यादा मारे गए, हमको ज्यादा नुकसान हुआ जबकि बाद में यह साफ हो गया कि घुसपैठियों के साथ पाक सेना के ज्यादा जवान कारगिल में शहीद हुए। क्योंकि वो खुलकर नहीं लड़ पाए। एक तरफ हमारे नेता है जिन्हे सेना के क्रियाकलापों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती और वह इस बारे में उल्टे-सीधे बयान देते रहते हैं। अब हमारे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ले लीजिए जनाब बराबर एक ही बयान रटे जा रहे है कि चीन की सेना पीछे हटी तो भारत की सेना पीछे क्यों हटी जबकि हम अपनी जमीन पर खड़े थे।

ऐसे घुसपैठ करते थे पाकिस्तानी
जनाब को यह भी नहीं मालूम है कि सेनाए अपनी सीमा से भी थोड़ा पीछे रहती है। जब चीन ने आगे बढ़कर कब्जा जमाया तो भारत की सेना भी आगे बढ़ी और जब समझौता हुआ तो दोनों सेनाए पीछे हटकर 15 अप्रैल वाली स्थिति में पहुंच गई अब यह तो उमर जी होगा नहीं कि चीन की सेना 15 अप्रैल वाली पोजीशन पर चली जाए और भारतीय सेना वही खड़ी रहे। यही तो कारगिल में भी होता था। ठंड के समय पाक और भारत दोनों ही अपनी पोजीशन छोड़ देते थे और गर्मी में फिर आ जाते थे, इसी का फायदा उठाकर पाक सीमा से पाक जवान और घुसपैठिए भारत की चौकी पर काबिज हो गए थे। जिन्हें हटाने के लिए कारगिल की जंग हुई।

क्यों बनाया चुमार में बंकर
वैसे भी यह अंतरराष्ट्रीय मानक है कि जब दो देशों के बीच सीमा तय न हो पाई हो यानी नियत्रंण सीमा हो तो दोनों देशों को ऐसी सीमा के पास बंकर आदि का निर्माण नहीं करना चाहिए। पाक भी जम्मू-कश्मीर में भारत पर इस प्रकार के आरोप लगाता रहता है और भारत चीन और पाक पर। भारत चुमार में ऐसी जगह पर बैठा है जहां से चीन का वेस्टर्न हाईवे साफ नजर आता है भारत द्वारा चुमार में जिस बंकर को नष्ट करने की बात हो रही है वो बंकर भारत ने चीन की किसी नापाक हरकत से निपटने के लिए ही बनाया था।

क्यों नष्ट किये बंकर
भारत ने बंकर नष्ट करने की बात यदि मान भी ली है तो चीन जैसे ही अपने इलाके में कोई निर्माण करेगा भारत उस पर विरोध जताते हुए चुमार में फिर बंकर बना लेगा। क्योंकि भारतीय फौज जानती है कि चीन को अपने वेस्टर्न हाईवे की कितनी चिंता है। चीन भारत द्वारा दौलत बेग ओल्डी, फुकफे और न्योमा में कराए जा रहे निर्माण कार्यों से खार खाए हुए है। लाइन ऑफ कंट्रोल पर पिछले चार-पांच सालों से भारत द्वारा आधारभूत ढांचा विकसित करने को लेकर चीन असहज है। इन निर्माण कार्यों से पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना का मूवमेंट आसान हो गया जो कि चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा था।

चीन ने की क्या-क्या कोशिशें
चीन ने कई बार चुमार पोस्ट पर लगे निगरानी कैमरों के तार को काटने की भी कोशिश की थी। चीन अभी काफी दिनों तक जमा रहता लेकिन विश्व के बढ़ते दबाव और भारत में चीनी व्यापार को होने वाले नुकसान को देखते हुए चीन वापस जाने को तैयार हुआ। क्योंकि दुनिया में इस समय हर देश के सामने अपने आर्थिक हित पहले है। अमेरिका कुवैत पर इराक के हमले के बाद क्यों लड़ा क्योंकि साउदी अरब, कुवैत और यूएई में तेल निकालने के सारे ठेके अमेरिकी कंपनियों के पास थे।

अमेरिका का हस्तक्षेप
लीबिया और सीरिया में वो क्यों दिलचस्पी लेता है क्योंकि तेल निकालने के काम पर वो कब्जा करना चाहता है। अमेरिका के बाद चीन का सबसे बड़ा कारोबार भारत के साथ ही है। यूरोपीय यूनियन बनने के बाद यूरोप के बाजार पहले ही चीन के लिए बंद हो गए है। ऐसे में चीन भारत में अपने व्यापार को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था। चीनी विदेश मंत्रालय ने जो पहली प्रतिक्रिया दी है उसमें भी इस बात का जिक्र किया गया है। रक्षा सूत्रों के अनुसार भारतीय वार्ताकारों को रक्षा मंत्री एके एंटनी का यह बुनियादी रुख ठीक से बता दिया गया था कि लद्दाख में जो कुछ हुआ वह चीन का किया धरा है और उसके बदले में कोई शर्त मानना एक तरह से किसी हिमाकत को ईनाम देना साबित होगा। एंटनी सैन्य कमांडरों के संयुक्त सम्मेलन में पहले ही कह चुके थे कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।

दोनों सेनाओं के बीच दूरी
सीमा पर भले ही सैनिकों की संख्या थोड़ी रही हो, लेकिन यह सच है कि अक्साई चिन के पास और कराकोरम रेंज के ठीक नीचे राकी नाला में चीनी और भारतीय सेना आमने सामने सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर आ डटी थी और इनकी वापसी को बहुत बडी सैन्य कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि आपसी अविश्वास से भरपूर रिश्तों के बीच कोई भी चूक एशिया के दो दिग्गजों को सैन्य टकराव की स्थिति में धकेल सकती थी। एक रक्षा विश्लेषक के अनुसार चीनी सैनिकों की वापसी एक तरह से जंग की स्थिति की समाप्ति है। भारत की ओर से कूटनीतिक वार्ता की कमान विदेश सचिव रंजन मथाई और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के अलावा चीन में भारतीय राजदूत जयशंकर के हाथ में थी।

सलमान खुर्शीद की यात्रा
समझा जाता है कि इस तिकड़ी ने चीनी नेतृत्व को यह संकेत दिया था कि इस घुसपैठ की स्थिति कायम रहते विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा हो पाना संभव नहीं है और यदि खुर्शीद की 9 मई की यात्रा रद्द होती है, तो चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग की 20 मई को होने वाली यात्रा खटाई में पड़ जाएगी और स्थिति हाथ से निकल जाएगी। समझा जाता है कि चीन ने अपनी सैनिकों की वापसी के लिए लद्दाख में कुछ अग्रिम सैन्य ढांचों को हटाने और दौलत बेग ओल्डी की अग्रिम हवाई पट्टी को निष्क्रिय करने की शर्त रखी थी, लेकिन भारतीय सेना ने पूरी तरह नकार दिया था। भारत का कहना था कि 15 अप्रैल के बाद जो स्थिति पैदा हुई है, उसमें भारत का कोई योगदान नहीं है।
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