मुलायम के आडवाणी राग में झलकती मोदी के प्रति 'आड-वाणी'

[कन्‍हैया कोष्‍टी] नरेन्द्र मोदी के बढ़ते कदमों के आगे रोड़े हजार हैं और जब तक भारतीय जनता पार्टी उनकी स्पष्ट भूमिका तय नहीं करती, तब तक उनके नाम पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राजनीतिक अखाड़ेबाजी कम नहीं होगी। कम नहीं होगी, इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी भूमिका तय हो जाने के बाद भारतीय राजनीति के एक निश्चित पड़ाव तक वे चर्चा में रहेंगे।

यहाँ ताजा चर्चा है मुलायम सिंह को लेकर चली है। कहते हैं आजकल समाजवादी पार्टी के मुखिया लालकृष्ण आडवाणी पर बहुत ही मुलायम हो गए हैं। मुलायम को आडवाणी की वाणी भाने लगी है। मुलायम को आडवाणी का अखिलेश यादव और उनकी सरकार के कामकाज की आलोचना या उस पर टिप्पणी करना अच्छा लग रहा है।

Mulayam Singh Yadav, Modi

दूसरी तरफ मुलायम का यह मुलायम रुख राजनीतिक गलियारे में हड़कम्प मचा गया है। भारतीय जनता पार्टी जहाँ एक तरफ लोकसभा चुनाव 2014 में अब तक लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका को पूरी तरह साइडलाइन करने की स्थिति में नहीं है, वहीं उस पर नरेन्द्र मोदी को आगे करने को लेकर जबर्दश्त दबाव है।

भाजपा के इस दोराहे पर मुलायम के इस आडवाणी राग का लक्ष्य नरेन्द्र मोदी माने जा रहे हैं। मुलायम की आडवाणी पर व्यक्त की गई वाणी को नरेन्द्र मोदी के लिए ‘आड-वाणी' के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों के अनुसार मुलायम का रुख भाजपा के प्रति मुलायम तो हो रहा है या मुलायम पूरी तरह भाजपा पर फिदा भी हो सकते हैं, लेकिन आडवाणी के नेतृत्व में।

मुलायम ने आडवाणी की तारीफ कर भाजपा से तालमेल के रास्ते खोलने के संकेत तो दिए, लेकिन भाजपा से तालमेल के इस संकेत में आडवाणी की आड़ लेने का सीधा मतलब मुलायम की नरेन्द्र मोदी प्रति ‘मत-वाणी' के रूप में लिया जा रहा है। मत-वाणी के दो तात्पर्य हैं और दोनों का मतलब नरेन्द्र मोदी के प्रति नकार है। मत-वाणी का पहला मतलब यह है कि मुलायम ने आडवाणी को आगे कर अपनी यह मत-वाणी प्रकट कर दी है कि यदि भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव 2014 में उतरती है, तो समाजवादी पार्टी उनका साथ दे सकती ह। मत-वाणी का दूसरा मतलब भी यही निकलता है कि मुलायम सिंह मोदी के नेतृत्व को नकार रहे हैं।

मोदी नहीं मेनेस

दरअसल नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम है, जिसे कोई तारणहार, तो कोई मारक समझता है। एक तरफ भाजपा में एक बड़ा वर्ग मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने पर तुला है, तो दूसरी तरफ भाजपा के भीतर और बाहर यानी सहयोगी दलों में भी उनके पक्ष और विपक्ष में लामबंदी चलती ही रहती है, लेकिन सहयोगी दलों के रूप में नए लोग भी जुड़ने से पहले मोदी को ही मानदंड बनाएँगे, यह तय है और इसका ताजा उदाहरण मुलायम सिंह यादव हैं।

एनडीए में रह कर नीतिश कुमार पहले ही मोदी के नाम पर आँखें दिखा रहे हैं, तो भाजपा का रुख करने से पहले मुलायम का आडवाणी राग स्पष्ट संदेश देता है कि राजनीतिक दलों और नेताओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिनके लिए मोदी केवल नरेन्द्र मोदी या एक राजनेता नहीं, बल्कि मेनेस यानी खतरा-आशंका का दूसरा नाम हैं।

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