अब ममता बनर्जी पर डोरे डाल रही कांग्रेस!
कोलकाता (शीर्षेदु पंत)। कभी साझेदार रही तृणमूल और कांग्रेस ने भावी गठजोड़ के लिए क्या दरवाजा खोल रखा है? दूरी बना चुकीं दोनों सहयोगी पार्टियों के एक-दूसरे के करीब आने की समय-सीमा पर बात करना हालांकि जल्दबाजी होगी, लेकिन पिछले हफ्ते की घटनाओं की तरफ अगर मुड़ें तो छह माह पुरानी घमासान लड़ाई के अंत का संकेत मिलता है।
यह सबकुछ एक विदेशी मामले को लेकर भारत की घरेलू राजनीति में मचे घमासान के कारण हुआ है। श्रीलंका में वर्ष 2009 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) को खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई के दौरान हुई ज्यादतियों को लेकर कोलंबो के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में लाए जा रहे अमेरिकी प्रस्ताव को लेकर जबर्दस्त हंगामा मचा।
जैसे ही इस प्रस्ताव पर मतदान करीब आया, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में दूसरी बड़ी घटक द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने गठबंधन और सरकार से अलग होने की घोषणा कर दी। डीएमके के अलग होने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कांग्रेस तुरंत हरकत में आई और उसने तृणमूल पर ध्यान केंद्रित किया। तृणमूल कांग्रेस ने भी पेट्रो पदार्थो और उर्वरक मूल्य वृद्धि, रियायती गैस सिलेंडरों की संख्या सीमित करने और खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देने के खिलाफ पिछले वर्ष सितंबर में संप्रग से नाता तोड़ लिया था।
कहा जा रहा है कि श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर ममता बनर्जी का समर्थन हासिल करने के लिए कांग्रेस के दो कद्दावर मंत्रियों कमलनाथ और जयराम रमेश को लगाया गया था। ममता ने तुरंत सकारात्मक पहल दिखाते हुए पार्टी को तृणमूल के रुख पर ट्विट करने के लिए कहा और उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर इस मुद्दे पर संप्रग का साथ देने का वादा किया। कांग्रेस ने भी राज्य विधानसभा में वाममोर्चा का साथ न देकर ममता की उदारता का जवाब दिया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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