महिला दिवस पर: हर कदम पर शक, तो कैसे मिले हक

हरिद्वार/बेंगलूरु (आशा त्रिपाठी/अजय मोहन)। महिलाओं के हक के सवाल पर 6 मार्च को जब मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाग पर लिखा कि महिलाओं को भी पूरी आजादी से जीने का हक मिलना चाहिए। उनके खिलाफ अत्याचार रुकने चाहिए। महिलाओं का अपमान बंद होना चाहिए। इसे सम्मान के साथ स्वीकारना चाहिए कि हमारे होने महिलाओं में अहम योगदान महिलाओं का ही है। महिलाओं के खिलाफ उठने वाले हाथों को रोकना चाहिए और उनकी रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए चलाए गए अंतरराष्ट्रीय अभियान 'ब्रेकथ्रू' के प्रति अपना समर्थन जताया।

इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2008 में की गई थी। इसके तहत महिलाओं एवं पुरुषों से घरेलू हिंसा के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया जाता है। दुनिया भर में विधा के लिए आदर के साथ पहचान रखने वाले अमिताभ बच्चन की बातें तो वाकई अच्छा हैं, पर क्या शक, संदेह और घृणा की नींव पर खड़ी महिलाओं की रक्षा और उन्हें हक दिलाने की योजनाएं मूर्त्त रूप ले पाएंगी। यह सवाल सिर्फ आज नहीं, बल्कि वर्षों से उठते आ रहे हैं, किन्तु जवाब के तौर अब तक कुछ खास हाथ नहीं लगा है। खैर, हालात जो भी हो पर इसके लिए सिर्फ पुरुषों को ही दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि अपनी दुर्गति के लिए महिलाएं भी कम दोषी नहीं हैं।

यह सबको पता है कि महिलाओं की दशा सभ्यता व संस्कृति का पैमाना होती है। यदि हमें किसी भी सभ्यता या संस्कृति के स्तर का निर्धारण करना है, तो महिलाओं की सामान्य दशा, उनके अधिकारों और स्तर को जानना जरूरी होता है। यदि समाज में स्त्रियों का स्तर ऊंचा है और तमाम अधिकार प्राप्त हैं तो उस समाजिक संस्कृति को श्रेष्ठ कह सकते हैं। मूल विषय की जानकारी लेने से पहले संक्षिप्त में प्राचीन काल की चर्चा जरूरी है। प्राचीन काल में भी सामाजिक व्यवस्था आज ही की तरह (कुछ क्षेत्रों को छोड़कर) पितृ सत्तामक थी। स्त्रियों को बौद्धिक, आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। महिला व पुरुष में कोई भेद नहीं था।

तस्‍वीरों के साथ लिखी एक-एक बात पर गौर करें और सोचें-

इतिहास गवाह है

इतिहास गवाह है

धार्मिक कार्यों, सामाजिक उत्सवों, समारोहों आदि में वो पुरुषों के साथ समान आसन ग्रहण करती थीं। पुत्र और पुत्री समाज में सामान रूप से शामिल होते थे। पुत्री का जन्म चिंताजनक नहीं था। बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा नहीं थी। समारोहों और उत्सवों पर स्त्रियां श्रृंगार करती थीं और सभी त्यौहारों, समारोहों और उत्सवों में पुरुषों के सामान ही सम्मिलित होती थी। उनके घर के बाहर निकलने, घूमने-फिरने तथा आने जाने की स्वतंत्रता पर कोई अंकुश नहीं था। उनकी नैतिकता और सदाचार का स्तर भी ऊंचा था।

क्‍या कहता है वेदांत

क्‍या कहता है वेदांत

वेदान्त में भी विदुषी अत्रैयी का जिक्र मिलता है। विदुषी स्त्रियां सभाओं में दार्शनिक विचार-विमर्श और तर्क-वितर्क में भाग लेती थीं। कुछ विदुषी स्त्रियों ने तो ऋग्वेद की ऋचाएं भी रचीं। इस प्रकार भारत की नारी को बौद्धिक गौरव व सम्मान प्राप्त था। इसी क्षेत्र में कई अन्य विदुषियां रही हैं जिनमें लोपमुद्रा विश्ववारा, सिकता, विवावरी, घोष, इंद्राणी साची, सुलया, मैत्रैयी, गार्गी, वाचवनवि, खेमा, सुभद्रा, उपरा, उदुम्बरा, केशा, जयंती, सुभा, सुमेघा, अनोपमा आदि का नाम शामिल है। तब महिलाएं केवल विदुषी ही नहीं अपितु वीर व साहसी भी हुआ करती थीं।

विवाह के पश्चात भी शिक्षा

विवाह के पश्चात भी शिक्षा

विवाह के पश्चात भी शिक्षा जारी रख सकती थी। उनके द्वारा अध्यापन कार्य किया जाता था। बताते हैं कि भिक्षुणी खेमा की विद्वता की प्रशंसा सुनकर कौशल सम्राट प्रसन्नजीत स्वयं उनकी सेवा में गए थे। जयंती, रेवा, रोहा, माधवी, अनुलक्ष्मी, पहई, दतई और शशिप्रभा आदि भी गुप्त काल में महान, विदुषी व कवित्रियां हुई हैं। इसी तरह अन्य कई विदुषियों का जिक्र प्राचीन काल में मिलता है जो स्त्रियों की उच्च स्तर की शिक्षा की ओर इंगित करता है।

पुरातन काल में नारी शक्ति

पुरातन काल में नारी शक्ति

यूं कहें कि पुरातन काल में नारी शक्ति का अत्यधिक महत्व था। वैदिक काल में भूमि की नारी, सामाजिक-धार्मिक व आध्यात्मिक क्षेत्रों में पुरूष की सहभागिनी थीं। गौरवपूर्ण अधिकार व सम्मान प्राप्त नारी आदिकाल से मां, बहन, प्रेयसी, पत्नी व पुत्री आदि रिश्तों को निभाती चली आ रही है। वैदिक काल में नारी ने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए,समाज व जीवन के हर क्षेत्र में अपना गौरव व सम्मान बढ़ाया था। भारत में हिन्दू शासकों के शासन काल तक नारी का सम्मान उच्चकोटि का था। मध्य काल में भारत में मुगल सल्तनत के विस्तार के साथ-साथ,भारतीय समाज व नारी की स्थिति बिगड़ती गई एवं नारी के सामने एक के बाद एक समस्यायें पैदा होती रहीं। मुगल काल वह काल था,जब भारतीय नारी ने अपने सतीत्व के रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति देने का कार्य किया।

मध्‍य काल में भारतीय नारी

मध्‍य काल में भारतीय नारी

मध्य काल में भारतीय नारी का जीवन संकटग्रस्त था। अंग्रेजी हुकूमत से लम्बे संघर्ष व अनगिनत बलिदानों के उपरांत आजादी हासिल करने के बाद, आजाद भारत के संविधान में भारतीय नारी को तमाम अधिकार प्रदान किये गये। आजाद भारत में दिनों-दिन राजनैतिक-सामाजिक व शिक्षा-रोजगार के क्षेत्रों में महिलाओं ने तेजी से तरक्की हासिल की। एक प्रधानमंत्री व कुशल प्रशासक के रूप में इंदिरा गाँधी ने विश्व पटल पर अपने अमिट हस्ताक्षर कर के भारत-भूमि की शान में बढ़ोत्तरी की। वर्तमान में भी राजनैतिक क्षेत्र में महिला शक्ति का वर्चस्व कायम है। सोनिया गांधी, मीरा कुमार, ममता बनर्जी, मायावती, जयललिता आदि की नेतृत्व क्षमता व कार्यशैली का लोहा विपक्षी राजनैतिक दल भी मानते हैं। कुछ माह पहले तक देश के सर्वोच्च पद राष्टपति पर भी नारी शक्ति के रूप में प्रतिभा पाटिल आसीन थी।

शर्मनाक इतिहास

शर्मनाक इतिहास

गौरवशाली इतिहास और कानूनी अधिकारों के बावजूद आम महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। ग्रामीण अंचलों में नारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के बावजूद अबतक अज्ञान की कालिमा मिटी नहीं है। अशिक्षित महिलाओं का अपने अधिकारों की जानकारी न होना, उनका अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना ही महिला की पीड़ा का सबसे बड़ा कारण है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारें महिलाओं को जागरूक करने का प्रयास गैर सरकारी संगठनों व सरकारी महकमों के माध्यम से जारी रखे हुए हैं। यह सत्य है कि बगैर शैक्षिक व कानूनी जागरूकता के वर्तमान युग में महिलाओं को अधिकार व सम्मान मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण किन्तु सत्य है कि ‘यत्र नारी पूज्यंते, तत्र देवता रमन्ते' की अवधारणा वाले देश में सामाजिक व पारिवारिक स्तर पर स्त्री की दशा सोचनीय व दयनीय है।

शक के दायरे में बहन

शक के दायरे में बहन

आज जब बेटी बड़ी होती है और कॉलेज पढ़ने जाती है और पुरुष मित्र बनते हैं, तो सबसे पहली शक की सुई गहराती है भाई और पिता के मन में। पिता उम्र का लिहाज करके शुरु में बोलने से झिझकते हैं, लेकिन भाई तुरंत रौब झाड़ते हुए पूछता है, "कौन था वो जिससे फोन पर बात कर रही थीं, तुम्‍हारे पैर बाहर क्‍या निकले, बस..."

शक के दायरे में बेटी

शक के दायरे में बेटी

हमारे भारत में तमाम दावे किये जाते हैं कि बेटियों को जॉब करने दो, लेकिन उन पिताओं का क्‍या, जिनके मन में एक बार शक की सुई घूम गई, तो बेटी का करियर खराब। जी हां आज भी तमाम जगहों पर जब बेटी घर से बाहर निकलती है, तो पिता के मन में एक डर सा बैठा रहता है, फिर चार लोग पिता के कान भरते हैं, तो उनका शक गहराने लगता है। हमारे समाज में सबसे बड़ी कमी यह है कि पिता अपनी बेटी से खुलकर कभी नहीं पूछते, वो सीधे रोक लगा देते हैं। यह बहुत कम ही लोग सोचते हैं कि बात करने से बात बनती है।

शक के दायरे में पत्‍नी

शक के दायरे में पत्‍नी

पति-पत्‍नी के बंधन की डोर या तो बहुत मजबूत होती है और या फिर कमजोर। आये दिन एक्‍सट्रामेरिटल अफेयर केस बढ़ने की वजह से पत्‍नी के प्रति शक की भावनाएं तमाम पुरुषों के दिमाग में घर कर रही हैं। खास तौर से वर्किंग विमेन के साथ यह समस्‍या आ रही है। और जहां महिलाएं काम पर नहीं जाती हैं, वहां अगर कोई महिला किसी रिश्‍तेदार या पड़ोसी से हंस कर बात भी कर ले, तो शक पैदा हो जाता है।

समाज में नैतिक पतन

समाज में नैतिक पतन

समाज के नैतिक पतन का परिणाम है कि जन्मदात्री नारी को पारिवारिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। महिलाओ को भारत में कानून प्रदत्त तमाम अधिकार हैं। परिवार व रिश्तों को संजोने-सवारने का महती दायित्व निभाने वाली आम महिला आज अपने अधिकारों से वंचित है। जागरूकता व शिक्षा के अभाव में आम महिला के साथ पारिवारिक स्तर पर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। परिवार की इज्जत,बाल-बच्चों के पालन-पोषण एवं चौके-चूल्हे के चक्रव्यूह में फंसी नारी मन मसोस कर, अपना कर्तव्य निभाती चली जा रही है। यह ठीक है कि शीर्ष पदों पर महिलायें पहुंच कर महिला शक्ति का परचम लहरा रहीं है। परन्तु समाज की प्राथमिक इकाई परिवार में महिला अपनी जिम्मेंदारियों एवं घरेलू हिंसा के पाटों के बीच पिसती जा रही है।

हर 14 घंटे में बलात्‍कार

हर 14 घंटे में बलात्‍कार

भारत में हुए एक सर्वे के परिणामस्वरूप हर 14 घंटे में एक महिला का रेप होता है। भारत बहुत ही तेजी से बढऩे वाली इकॉनोमी है। घरेलू हिंसा यहां की महिलाओं के मानसिक तनाव का एक कारण है। हाल में ही हुए कुछ ऐसे मामले हुए हैं जो जनता का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। 2012 में ‘थॉम्पसन रॉयटर्स फाउंडेशन' के पोल के मुताबिक, भारत में महिलाओं की स्थिति अन्य जी20 देशों के मुकाबले बहुत ही खराब है। मेरा मानना है कि स्थितियां तो और भी खराब होंगी, क्योंकि महिलाओं के प्रति भारतीयों की सोच में बदलाव कम ही दिख रहा है। 21 वीं सदी के 13 वें वर्ष में भी लोगों के मन में महिलाओं के प्रति घृणा, शक और संदेश की स्थिति देखी जा रही है। इस स्थिति में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि महिलाओं को उनका हक मिलेगा।

आज की जरूरत

आज की जरूरत

आज जिस तरह बलात्‍कार के मामले बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए जरूरी हो गया है कि लड़कियां आत्‍मरक्षा के गुर सीखें। इसमें उनके माता-पिता उन्‍हें प्रोत्‍साहित करें। हम यह नहीं कह रहे हैं कि अपने साथ हथियार रखें, लेकिन हथियार चलाना जरूर सीखें, क्‍योंकि हथियार चलाना सीखने से आत्‍मविश्‍वास और आत्‍मबल दोनो बढ़ते हैं।

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