हैदराबाद ब्लास्ट: धीरज धरें..... लेकिन कब तक ??

बैंगलोर। गुरूवार शाम को हैदराबाद दो धमाकों से केवल पर्ल सिटी ही नहीं बल्कि पूरा देश हिल गया है। इस धमाके ने कई लोगों के घरों का चिराग छीन लिया है तो बहुतों के घरों के कुलदीपक अस्पताल में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड रहे हैं। सरकार कह रही है कि धैर्य बनाये रखे, दोषियों को सजा जरूर मिलेगी, जांच जारी है। लेकिन सरकार से कोई पूछे कि आखिर कब तक हम धैर्य बनाये रखे। धीरज की भी एक सीमा होती है। आखिर कब तक हमारे धैर्य का इम्तहान होता रहेगा।

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं प्रभारी डा. कुंजन आचार्य ने अपने ब्लॉग सृजन पथ में यही सवाल लोगों और देश के गणमान्य लोगों से किया है कि धीरज धरें..... लेकिन कब तक ??

डा. कुंजन आचार्य लिखते हैं कि

फिर धमाके। लाशें ही लाशें। सडकों पर खून। अस्‍पतालों में अफरा तफरी। जिनके परिजन घरों को नहीं लौटे ऐसे हैदराबादवासियों की बदहवासी। जिनके रिश्‍तेदार और परिजन वहां है उनकी चिन्‍ताएं। हर ओर शोक। मातम और मायूसी। हर बार देश के दुश्‍मन आते है, सारी व्‍यवस्‍थाओं को धता बताते है और हमरा चैन छीन ले जाते है। हम धीरज रखते है। रखते आए है। सवाल यही है कि आखिर कब तक। धैर्य की भी एक सीमा है। ब्‍लास्‍ट के बाद हर बार की तरह सरकारी अमला दौडता है। एनआईए, एसपीजी टीमें आती है। मन्‍त्री, सन्‍त्री पहुंचते है। दिलासा, जांच, मुआवजा और आंसू। हम हर बार की तरह लकीर पीटते है। कहते है धीरज धरो। मुश्किल घडी में धीरज जरुरी होता है लेकिन इन कनखजूरों का सफाया बेहद जरुरी है। इन जहरीले कीडों को मारना बेहद जरुरी है जो समाज और राष्‍ट्र को शान्ति से जीने नहीं देना चाहते। राष्‍ट्र की एकता और शान्ति के दुश्‍मनों को सबक सिखाना बहुत जरुरी है।

हमारे धैर्य को कहीं कायरता ना समझ लिया जाए। हम पर कहीं डरपोक होने का लेबल ना चस्‍पा हो जाए। पडौसी हमारे अमन से खौफ खाते है। वे इस अमन को हर कीमत पर ध्‍वस्‍त करना चाहते है। इसमे स्‍थानीय मिली भगत की भी कडाई से पडताल होनी चाहिए। कोई भी देश का दुश्‍मन स्‍थानीय मदद के बगैर हमारी नाक के नीचे ऐसा नहीं कर सकता। सरकार को सख्‍ती दिखानी होगी। हमे भी साहसी होना होगा। जागरुक होना होगा।

हैदराबाद एक नाम है। यह नाम किसी अन्‍य शहर का भी हो सकता है। आतंकी कहीं भी जा सकते है। बम प्‍लांट कर सकते है। हमे आस पास चौकस निगाह रखनी होगी। संदिग्‍धों की सूचनाएं प्रशासन तक पहुंचानी होगी। यह भी यदि हम कर लें तो पुलिस को भी आसानी होगी। बेचारी पुलिस और उसका सबसे नीचे का कांस्‍टेबल तो चोरियां, पाकेटमारी जैसी समस्‍याओं को रोकने में ही व्‍यस्‍त है। उसे अवकाश ही नहीं कि वह इस तरह की बडी नापाक हरकतों पर भी निगाह डाल सके। हमारे सुरक्षा तन्‍त्र को भी मुस्‍तैद बनाना होगा। सुरक्षाकर्मियों को भी चौकस और दुरस्‍त करना होगा।

दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर हमे देश के लिए भी सोचना होगा। देश है तो हम है। मैंने हैदराबाद में छह साल टीवी पत्रकारिता की। दिलसुखनगर शहर का बाहरी हिस्‍सा है। उपनगर है। गुरुवार को जहां ब्‍लास्‍ट हुआ इस के ठीक पास वाली गली में मैं 2004 में करीब छह माह रहा। यह बाजार जो अति व्‍यस्‍त है इसमें मैंने घंटों गुजारे है।

चित्र में जो बिखरा बस स्टाप दिख रहा है इसके नीचे खडे रह कर कई बार बस की प्रतीक्षा की है। इन सब के चित्र देख कर मैं बहुत विचलित और आहत महसूस कर रहा हूं। असहाय महसूस कर रहा हूं।

कोई भी कभी आता है और हमे सरेराह तमाचा मार कर चला जाता है। हम वाकई बहुत असहाय है। यहां एक घटना याद आ रही है। म्‍यूनिख ओलम्पिक में इजराइल के एक दर्जन खिलाडियों को आतंकियों ने मार डाला था। प्रतिक्रिया में इजराइल ने उन सभी आतंकियों को दुनिया के कोने कोने से चुन चुन कर मारा। अन्तिम आतंकी घटना के दस साल बाद उसी के देश में उसी के देश में इजराइली कमांडो द्वारा मारा गया। आतंकवाद के खिलाफ इजराइल का जज्‍बा लाजवाब है। हम किसी से तो कुछ सीखे।

क्या डा. कुंजन आचार्य से आप लोग भी सहमत हैं.. अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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