कुल देवता को खुश करने के लिए पिलाते हैं 'शराब'

Liquor
जालौन। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में कबीलों में रह कर जिंदगी गुजारने वाले कबूतरा जनजातीय समुदाय के लोग अपने कुल देवता को खुश करने के लिए खुद की बनाई दारू उसकी ‘चैरी' में चढ़ाते है। इस समुदाय का मानना है कि ऐसा न करने पर कुल देवता नाराज होकर भारी ‘अनिष्‍ठ' कर सकते हैं।

कबीलों में रह कर कच्ची दारू (शराब) बनाकर बेचने और पीने के लिए कुख्यात कबूतरा जनजातीय समुदाय में तिथि-त्योहार मनाने के अपने तौर-तरीके भी अलग हैं, इस समुदाय के लोग अन्य लोगों से कुछ हट कर तीज-त्योहार मनाते हैं। अंधविश्‍वासों में जकड़े इस जनजातीय कबीले के मुखिया (सरदार) द्वारा त्योहारों में कबीले में ही बनी समुदाय के कुल देवता की चैरी में हर घर से मंगाई गई कच्ची दारू व मलीदा (रोटी, पकवान, घी, तेल आदि का मिला प्रसाद) का चढ़ौना चढ़ाते हैं और बाद इसे सभी महिला-पुरुष एक साथ प्रसाद के तौर पर पीते हैं और पारम्परिक नृत्य करते हैं।

उरई कस्बे में झांसी रोड़ के किनारे एक कबीला है, जिसे कबूतरा डेरा डेरा के नाम से जाना जाता है। यहां के बुजुर्ग सरदार किन्ना का कहना है कि ‘यह उनकी पीढि़यों पुरानी परम्परा है, ऐसा न करने पर उनका कुल देवता नाराज होकर कुनबे में भारी ‘अनिष्‍ठ' कर सकते हैं।' इसी कबीले का अधेड़ रामप्रकाश बताता है कि त्योहारों पर हर कुनबे में पकवान के अलावा गोश्त-दारू समाज के लोगों को खिलाने-पिलाने का भी रिवाज है।' बुजुर्ग महिला मतिया ने बताती है कि ‘कच्ची दारू बनाना उनका पुराना पेशा है, इसी से कुनबे का खर्च चलता है। त्योहारों में दारू न चले तो हमारा कुल देवता नाराज हो जाते हैं।'

अब इधर कुछ लोग बच्चों को पढ़ा-लिखा कर समाज की मुख्यधारा में भी शामिल करना शुरू कर दिए हैं, इनमें दसवीं कक्षा में पढ़ रहा सुरेश बताता है कि दारू बनाना, बेचना और पीना एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है। वह पढ़-लिख कर समाज की इस बुराई को खत्म करना चाहता है। इस कबीले के अब आधा दर्ज बच्चे पास के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाने लगे हैं।

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