गुजरात चुनाव यानी मोदी, बापा और बापू में जंग

ये तीनों गुजरात की राजनीति में भले कदावर नताओं में शुमार हैं। हालाँकि गुजरात की राजनीति और जनता में ये तीनों मोदी, बापा और बापू जैसे संक्षिप्त नामों से पहचाने जाते हैं।
एक तरफ हैं मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, तो दूसरी ओर हैं शंकरसिंह वाघेला और तीसरे हैं केशुभाई पटेल। इन तीनों में मोदी तो ग्यारह वर्षों से मुख्यमंत्री हैं ही, परंतु वाघेला और पटेल भी गुजरात के मुख्यमंत्री का पद सुशोभित कर चुके हैं।
ऐसे में मोदी के लिए जहाँ मुख्यमंत्री पद बनाए रखना महत्वपूर्ण है, तो वाघेला-पटेल दोनों में भी पुनः मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा होना स्वाभाविक है। तीनों विधानसभा चुनाव भी लड़ रहे हैं। मोदी मणिनगर, पटेल यानी बापा विसावदर और वाघेला यानी बापू कपडवंज सीट से छलांग लगा कर गांधीनगर की गद्दी पर बैठने की तैयारी में हैं।
दिखती है मंजिल एक, पर लक्ष्य अलग-अलग
कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि तीनों महारथी यह चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतरे हैं और कम से कम 20 दिसम्बर तक तो तीनों की मंजिल एक ही है, ऐसा आभास होता है। वह मंजिल है गांधीनगर की गद्दी, परंतु इसमें बड़ा भेद और भरम है। मंजिल भले एक लगती हो, परंतु तमाम के लक्ष्य अलग-अलग लगते हैं। इस चुनाव में इन तीनों महारथियों की प्रतिष्ठा अलग-अलगस्तर पर कसौटी पर है।
यदि तीनों के लिए एक-एक ही शब्दमें कहें, तो इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी यानी मोदी का ‘महाभारत', केशुभाई पटेल यानी बापा का ‘बळापो' (हिन्दी में उच्चारण बड़ापो) और शंकरसिंह वाघेला यानी बापू की 'बळुकाई' (हिन्दी में उच्चारण बड़ुकाई) कसौटी पर है।
महाभारत तो आप समझ गए होंगे। आपको बळापा और बळुकाई भी समझा देते हैं। बळापो का अर्थ टीस, जलापा, जलन, ईर्ष्या, खुनस, रंजिश या फिर प्रतिकार की भावना के रूप में किया जा सकता है, तो बळुकाई का अर्थ होता है बल या वर्चस्व। अब तीनों शब्दों और उनके भावों को विस्तृत अर्थ में समझते हैं।
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