धन उगल रहे बुंदेलखंड से 32 लाख लोगों का पलायन!
लखनऊ। जिस बुंदेलखंड में पहाड़ों के उत्खनन मात्र से उत्तर प्रदेश सरकार को राजस्व के रूप में पांच साल में 25 अरब रुपए का फायदा हो रहा हो, वही बदहाली का दंश झेल रहा है। यहां के 32 लाख लोग अपना घर-परिवार छोड़ कर दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में परदेस चले गए हैं।
उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के सभी सात जनपदों बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झांसी व ललितपुर के पहाड़ों के 1024 क्षेत्रों में पत्थर उत्खनन किया जा रहा हैं। सबसे बड़ी विड़म्बना यह है कि उत्खनन कराने वाला पट्टाधारक किसी न किसी राजनीतिक दल में अच्छे ओहदे में हैं। पत्थर तोड़ने वाले बेबस व लाचार गरीब-गुरबा हैं।

बुंदेलखंड़ में खनिज संपदा का भंडार है। बेतवा, केन, क्वारी, धसान, बागै, मन्दाकिनी व यमुना जैसी बड़ी नदियों से यहां जायज-नाजायज तरीके से हर साल अरबों रुपए की बालू व मोरम का कारोबार होता है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र का कोई पहाड़ नहीं बचा, जिसमें खनिज विभाग द्वारा पत्थर उत्खनन करने का पट्टा न किया गया हो। उत्तर प्रदेश खनिज विभाग की मानें तो ‘बांदा में 190, चित्रकूट में 141, महोबा में 330, हमीरपुर में 83, जालौन में 89, झांसी में 349 व ललितपुर में 129 कुल 1311 स्थानों को पत्थर उत्खनन क्षेत्र घोषित किया गया है।
बुंदेलखंड से 25 अरब की आमदनी
मौजूदा स्थिति यह है कि बांदा में 86, चित्रकूट में 118, महोबा में 327, हमीरपुर में 78, जालौन में 38, झांसी में 279 व ललितपुर में 98 खनन कार्य चल रहा है और बांदा से 60 करोड़, चित्रकूट से 85 करोड़, महोबा से 105 करोड़, हमीरपुर से 75 करोड़, जालौन से 65 करोड़, झांसी से 70 करोड़ व ललितपुर से 50 करोड़ रुपए सालाना राजस्व प्राप्त होता है। यानी कि सरकार को बुंदेलखंड़ के इन जनपदों से सिर्फ पत्थर उत्खनन से पांच साल में 25 अरब 50 करोड़ रुपए की आमदनी होती है।
वहीं केन्द्रीय मंत्रीमंड़ल की आंतरिक समिति मानती है कि बांदा से 737,920, चित्रकूट से 344,801, महोबा से 210,547, हमीरपुर से 417,489, जालौन से 538,147, झांसी से 558,377 व ललितपुर से 381,316 कुल 3,277,597 लोग रोटी-रोजगार या अन्य कारणों से पिछले पांच साल में पलायन कर गए हैं। यानी कि पिछले पांच साल में बदहाली से तंग होकर दो वक्त की तलाश में 32 लाख 77 हजार 597 लोग अपना घर-परिवार छोड़ कर चले गए हैं।
बुंदेलखंड के लोगों का हाल
अगर बालू व अन्य मदों से प्राप्त राजस्व को दरकिनार कर दिया जाए तो भी इस मद की ही आय से इन लोगों को रोजगार मुहैय्या करा कर बदहाली और पलायन जैसे निकृष्टतम अभिषाप से बचा जा सकता है, मगर ऐसा नहीं हुआ। बांदा के भूतत्व एवं खनिकर्म अधिकारी मनोज सिंह बताते हैं कि बांदा में एक भी बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला परिवार बालू या पत्थर उत्खनन पट्टाधारक नहीं है। तकरीबन सभी पट्टाधारक किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं या फिर मान्नीयों (मंत्री, सांसद व विधायक) के रिश्तेदार हैं।
बुजुर्ग समाजवादी चिंतक और पूर्व मंत्री जमुना प्रसाद बोस कहते हैं कि यदि सरकार सिर्फ पत्थर उत्खनन से प्राप्त धनराशि ही हर साल यहां के विकास में खर्च करे तो न पानी की कमी रहेगी और न ही रोजगार की। इससे बाहर जाने वाले लाखों गरीबों को रोंका जा सकता है। गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) प्रवास सोसायटी के सामाजिक कार्यकर्ता आशीश सागर कहते हैं कि बुंदेलखंड की 19 में से कोई ऐसी विधान सभा सीट नहीं है, जहां विभिन्न राजनीतिक दलों ने उत्खनन से जुड़े व्यक्ति को चुनाव मैदान में न उतारा हो। बालू या पत्थर उत्खनन ही एक ऐसा व्यवसाय है, जिसके जरिए विधायक या सांसद की पांच साल में चल-अचल सम्पत्ति कई गुना बढ़ जाती है।
तबाह कर दिया बुंदेलखंड को
एक अन्य एनजीओ कृषि एवं पर्यावरण विकास संस्थान के निदेशक और 'नदी बचाओ-तालाब बचाओ आन्दोलन' के संयोजक सुरेश रैकवार का कहना है कि उत्खनन से जुड़े लोग सरकारी मानक की अनदेखी कर रहे हैं। भारी मारक क्शमता की विस्फोटक सामाग्री का इस्तेमाल कर जनजीवन तक को तबाह कर रहे हैं। राजनीतिक दबाव की वजह से अधिकारी मौन हैं।
वह कहते हैं कि यदि यही आलम रहा तो आने वाली पीढ़ी नदी-पहाड़ सिर्फ किताबों में ही पढ़ पाएगी। उनका यह भी कहना है कि ‘उत्खनन से जुड़े लोग पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं, अगर पट्टाधारक गरीब या श्रमिक वर्ग से होगा तो वह मानक का खयाल रखेगा। बांदा जनपद के पनगरा गांव के रामचंद्रन पहाड़ में बतौर श्रमिक काम करने वाले दलित रावण ने बताया कि उसने मोरम और पत्थर उत्खनन का पट्टा दिए जाने का आवेदन किया था, मगर आवेदन निरस्त कर एक सत्तारूढ़ दल के विधायक के भाई को दे दिया गया।
कुल मिलाकर यह कहना गलत न होगा कि बुंदेलखंड़ के राजनीतिक रसूखदार सिर्फ पत्थर उत्खनन के लिए ही राजनीति का हिस्सा बनते हैं, परिणाम सबके सामने है कि यहां के 32 लाख से ज्यादा गरीब किसान रोटी-रोजगार की तलाश में ‘परदेस' की शरण में पड़े हैं।












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