बाल ठाकरे को क्‍यों दिया गया राजकीय सम्‍मान?

बेंगलूरु। 17 जनवरी 2010 को मैं कोलकाता में पूर्व मुख्‍यमंत्री व वामपंथी नेता ज्‍योति बसू का निधन हुआ। उन्‍हें राजकीय सम्‍मान के साथ विदा किया गया। उनके पार्थिव शरीर को 21 बंदूकों से सलामी दी गई और फिर उनका दाह संस्‍कार किया गया। ऐसा ही कुछ 18 नवंबर को मुंबई में देखने को मिला, जब 86 वर्षीय बाल ठाकरे का निधन हुआ। ठाकरे के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर शिवाजी पार्क ले जाया गया और वहां महाराष्‍ट्र पुलिस ने उन्‍हें सलामी दी और फिर उनका अंतिम संस्‍कार किया गया।

इन दो घटनाओं ने मेरे मन में महाराष्‍ट्र सरकार के खिलाफ कई सवाल खड़े कर दिये हैं, जिनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बाला साहब को राजकीय सम्‍मान क्‍यों दिया गया। ज्‍योति बसु की बात करें तो उन्‍होंने बतौर मुख्‍यमंत्री के रूप में राज्‍य की सेवा की, लेकिन बाल ठाकरे ने ऐसा क्‍या किया था, जो उन्‍हें इतना बड़ा सम्‍मान दिया गया।

मुझे पता है कि मेरे इस लेख से तमाम लोग सहमत नहीं होंगे, लेकिन सवाल तो सवाल हैं और वो भी वाजिब। ठाकरे जीवन में कभी भी राज्‍य के मुख्‍यमंत्री तो दूर किसी मंत्री पद पर भी नहीं रहे। यानी वो लोकतंत्र का हिस्‍सा कभी नहीं रहे। वो खुद कहते थे कि वो शिवशाही पर विश्‍वास करते हैं, लोकशाही पर नहीं। वो एक ऐसे व्‍यक्ति थे जो सीधे ऐक्‍शन की बात करते थे। हम कहते हैं कि हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन अगर कोई व्‍यक्ति जिसने कभी लोकतंत्र को नहीं माना उसके बारे में आप क्‍या कहेंगे। सिर्फ लाखों अनुयायी होने का मतलब यह नहीं कि व्‍यक्ति के शरीर को हम तिरंगे में लपेट दें।

हम कहते हैं कि हमारा देश अनेकता में एकता का परिचय देता है। हमारा संविधान कहता है कि हर व्‍यक्ति को देश के किसी भी स्‍थान पर रहने और काम करने का अधिकार है। जबकि ठाकरे हमेशा संविधान की इस धारा के विरोध में रहे। उन्‍होंने मुंबई में बाहरी लोगों का हमेशा विरोध किया। उनकी राजनीति की शुरुआत कम्‍युनिस्‍टों को खदेड़ने से हुई और फिर उन्‍होंने दक्षिण भारतीयों का मुंबई में जीना मुहाल कर दिया। आगे चलकर इसी का असर उनके भतीजे राज ठाकरे पर पड़ा। राज ठाकरे ने आगे चलकर महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया और मुंबई में रहने वाले उत्‍तर भारतीयों के खिलाफ मोर्चा खोला। वो आज भी यूपी-बिहार के लोगों के खिलाफ जहर उगलने में पीछे नहीं रहते। अब ऐसे व्‍यक्ति को 21 बंदूकों की सलामी क्‍यों दी गई।

मीडिया को ठाकरे से इतना प्‍यार क्‍यों?

मुंबई के बाहर बाल ठाकरे कुछ नहीं थे। शिवसेना भी कोई बहुत बड़ी राजनीतिक पार्टी नहीं है। तो मीडिया को उनसे इतना प्रेम क्‍यों? ठाकरे के निधन के बाद मीडिया में जो स्‍लोगन आये वो थे, "नहीं रहा शेर, व्‍यक्ति जिसने कभी जातिवाद की राजनीति नहीं की..." मुझे समझ नहीं आया कि आखिर मीडिया ने उनके लिये ऐसे शब्‍द क्‍यों इस्‍तेमाल किये। जबकि सच पूछिए तो उन्‍होंने मुसलमानों की हमेशा मुखालिफत की। उन्‍होंने टीवी चैनल आज तक को दिये गये साक्षात्‍कार में साफ कहा था कि वो डा. एपीजे अब्‍दुल कलाम का समर्थन दोबारा राष्‍ट्रपति बनने में इसलिये नहीं करेंगे, क्‍योंकि वो एक मुसलमान हैं। रही बात हिंदुओं की तो बाल ठाकरे ने मराठियों के अलावा किसी के लिये कुछ नहीं किया।

हम भारतीय जनता पार्टी से पूछना चाहेंगे कि ठाकरे के निधन के बाद वो गमगीन हो गई है। क्‍या वो उस समय गम में डूबी थी जब 1993 के दंगे में सैंकड़ों लोग मारे गये थे। सरकारी दस्‍तावेजों की मानें तो ठाकरे उन दंगों को भड़काने वाले मुख्‍य आरोपी थे।

क्‍या थी अच्‍छाई

बाल ठाकरे में कुछ अच्‍छाईयां भी थीं, शायद उसी वजह से 20 लाख से ज्‍यादा लोग उनके अंतिम दर्शन करने मुंबई की सड़कों पर आये। वो अच्‍छाईयां थीं निडर पत्रकारिता और निडर राजनीति। जब तक वो पत्रकार एवं कार्टूनिस्‍ट रहे, तब तक उन्‍होंने निडरता के साथ काम किया। उनके एक भी लेख में डर नहीं झलकेगा। रही बात राजनेता की तो उन्‍होंने प्रधानमंत्री से लेकर राष्‍ट्रपति तक के खिलाफ बयान देने में कभी हिचक नहीं दिखाई।

ठाकरे को कभी पद का लालच नहीं रहा। जिस समय शिवसेना और भाजपा की सरकार महाराष्‍ट्र में आयी तो सभी विधायक उन्‍हें मुख्‍यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन वो किंग नहीं बने। वो किंगमेकर के रूप में काम करते रहे। उस समय महाराष्‍ट्र सरकार का उन्‍हें रिमोट कंट्रोल भी कहा गया। वैसे सच पूछिए तो उनसे सीख सिर्फ एक नेता ने ली और वो हैं सोनिया गांधी। आज केंद्र में कांग्रेस की सरकार है। सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने के लिये यूपीए का प्रत्‍येक सांसद तैयार था, लेकिन वो पीएम नहीं बनीं। और आज सरकार का रिमोट भी उन्‍हीं के हाथ में है।

शायद यही हो कारण

अंत में हम सिर्फ एक सवाल पूछना चाहते हैं कि अगर देश ठाकरे को राष्‍ट्रीय महानायक मानता है, तो जरनैल सिंह भिंद्रानवाले को क्‍यों नहीं? उन्‍होंने भी अपने धार्मिक अधिकारों के लिये लड़ाईयां लड़ीं। उनके बारे में लोग तरह-तरह की बातें क्‍यों बनाते हैं। दोनों को बनाने वाली कांग्रेस थी, तो भेद-भाव क्‍यों।

अंत में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि देश ने ठाकरे को जो सम्‍मान दिया, उसके पीछे एक डर था। और शिवसैनिकों को जो वो सिखाकर गये हैं, उसका डर सरकार को हमेशा लगा रहेगा। सरकार को इस बात का डर था कि ठाकरे के निधन के बाद कहीं शिवसैनिक सड़कों पर तांडव न मचाने लगें। ठाकरे को राजकीय सम्‍मान देने की एक वजह यह भी थी कि इससे शिवसैनिकों को कहीं न कहीं अच्‍छा महसूस होगा।

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