राष्ट्रपति का इशारा- अन्ना-रामदेव जैसे आंदोलन बढ़ा सकते हैं अराजकता
प्रणब मुखर्जी ने कहा अपनी बात की शुरुआत में कहा, "हमारी स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ पर हमारे देश तथा दुनिया भर के कोने-कोने में रह रहे भारतवासियों को पहली बार संबोधित करना बड़े सौभाग्य की बात है। इस महान पद का सम्मान प्रदान करने के लिए देशवासियों तथा उनके प्रतिनिधियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं हैं।"
राष्ट्रपति ने कहा, "मैं उस समय एक बच्चा था, जब नेताजी ने ताप्ती नदी के तट पर, हरिपुरा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 51वें अधिवेशन के राष्ट्रपति के रूप में हमें यह याद दिलाया था कि ‘हमारी मुख्य राष्ट्रीय समस्याएं निर्धनता, निरक्षरता तथा बीमारी का उन्मूलन है।' उनके व्याख्यान ने मेरे घर और इसी तरह से अन्य लाखों घरों को गुंजा दिया। मेरे पिता एक स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे तथा उस लम्बी अवधि के दौरान, जब स्वतंत्राता एक स्वप्न सा लगता था, खुद पर अपने नेताओं पर अहिंसा की ताकत पर तथा डर पर जीत पाने वाले भारतीयों के साहस पर हमारे विश्वास ने, हमें अविचल बनाए रखा। लेकिन हमें तब यह पता था, जैसा कि अब भी है, कि स्वतंत्राता का अर्थ रोटी और स्वप्न दोनों ही है।
उन्होंने कहा, "मैं निराशावादी नहीं हूं; मैं गिलास को हमेशा आधा भरा हुआ देखता हूं न कि आधा खाली। मैं यहां तक कहना चाहूंगा कि आधुनिक भारत का गिलास आधे से अधिक भरा हुआ है। हमारा उत्पादक श्रमजीवी वर्ग; हमारे अनुकरणीय किसान, जिन्होंने अकाल से ग्रस्त इस धरती को ऐसा देश बना दिया है जहां अन्न का जरूरत से अधिक उत्पादन होता है, हमारे कल्पनाशील औद्योगिक उद्यमी, चाहे वे निजी क्षेत्रा के हों या सार्वजनिक क्षेत्रा के; हमारे बुद्धिजीवी, हमारे शिक्षाविद् तथा हमारा राजनीतिक वर्ग, सभी ने मिल-जुलकर एक ऐसे आधुनिक राष्ट का निर्माण किया है जो कुछ ही दशकों में आर्थिक उन्नति तथा प्रगतिशील सामाजिक कानून के क्षेत्रा में कई सदियों की दूरी को पार कर गया है।"
राष्ट्रपति का अभिभाषण पढ़ें विस्तार से।













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