Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

कब पूरी तरह मंगलमयी होगी अमरनाथ यात्रा

When Amarnath Yatra arrangements would be totally fine
बम-बम भोले और हर-हर बम-बम का जाप करते बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए घरों से निकले लाखों श्रद्धालुओं में से सौ से अधिक राह में ही दम तोड़ गये। तीर्थयात्रियों की मौत के आंकडों से न तो श्रीनगर के राजभवन का दिल पसीजा और न ही मुख्यमंत्री उमर के मस्तिष्क में जमी वैचारिक बर्फ ही पिघली। पर बात मीडिया के जरिए दिल्ली पंहुची तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माथे पर चिंता की लकीरें अवश्य उभरी। 13 जुलाई को खबरों का स्वतः संज्ञान लिया न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने।

खंडपीठ ने अखबारी रपटों के आधार पर माना कि यात्रियों को निहायत संकरे,जोखिमपूर्ण और सुविधाहीन मार्ग से होकर पवित्र गुफा तक पंहुचना पड़ रहा है। रोजाना क्षमता से कई गुणा यात्री बाबा के दर्शन करने को विवश हैं। अदालत ने यात्रियों को पेश आ रही दिक्कतों को उनके मूल अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए पहले केंद्र सरकार, राज्य सरकार और श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड को नोटिस जारी किया। फिर बीस जुलाई को संबंधित पक्षों को सुनने के बाद एक विशेष उच्चाधिकार संपन्न कमेटी गठित कर डाली। इसमें केंद्र व राज्य सरकार के आला अधिकारियों को शामिल किया गया है।

कमेटी यात्रियों की मौत के चिंताजनक आंकड़ों के मद्देनजर जमीनी स्थितियों का मौके पर जाकर जायजा लेगी। इसे पड़ताल करनी है कि यात्रियों को मौत के मुंह में धकेलने के लिए चिकित्सा सुविधाओं और अन्य व्यवस्थाओं की कमी किस हद तक जिम्मेदार हैं ? कमेटी इस प्रक्रिया में सामने आने वाली खामियों को दुरूस्त करने के तरीके सुझाएगी ताकि अगले बरस से हालात बेहतर हो सकें। सर्वोच्च न्यायालय की पहल, नजरिए और तेवरों से आम नागरिकों के मन में नई उम्मीद जगी है। उम्मीद इस बात की कि अदालती लाठी की आवाज से ही सही, लंबी तान कर सोई हुई अथवा किसी साजिश के तहत सोने का ढांेग कर रही सरकारी मशीनरी शायद अब उठ खड़ी होगी।

मगर इस कवायद में एक विचित्र विडंबना भी समाहित है। विशेष उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का अध्यक्ष श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड के मुखिया और जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एन.एन. वोहरा को बनाया गया है। यात्रा का सारा प्रबंध राज्यपाल की अध्यक्षता वाला श्राइन बोर्ड ही करता है। वही बोर्ड,जो यात्रा के प्रबंधों की जगजाहिर खामियों के बावजूद इंतजाम के बेहतरीन होने का दम भरता नहीं थकता।

इस बार यात्रा के प्रारंभिक दिनों में ही जब एक के बाद एक यात्रियों की मौत स्वास्थ्य संबंधी कारणों से होने की खबरें आने लगी तो बोर्ड ने बेहतरीन प्रबंधनों के लिए खुद की पीठ थपथपाने में देर नहीं लगाई थी। कहा जा सकता है कि इंतजाम इतने ही अच्छे होते तो यात्रियों की इतनी दुर्गति नहीं होती। न ही अदालत को अपने स्तर पर हस्तक्षेप करना पड़ता। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि व्यवस्थाओं की खामियों को वह कमेटी भला कैसे कायदे से और निष्पक्षता से उजागर कर पाएगी जिसके मुखिया खुद इन व्यवस्थाओं के लिए बोर्ड के अध्यक्ष की हैसियत से उत्तरदायी हैं। यात्रियों की लाशों के ढे़र पर खडे़ होकर जिस बोर्ड ने अपनी व्यवस्थाओं के दुरूस्त होने का ढिंढोरा पीटा हो और अब भी पीटे जा रहा हो, उसके मुखिया की सदारत वाली कमेटी से आमजन भला क्या उम्मीद करें?

इस कमेटी में जम्मू कश्मीर सरकार के मुख्य सचिव समेत अन्य आला अफसर भी शुमार हैं जिसके सरपरस्त बतौर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला है। वही उमर, जिन्होंने यात्रियों की मौत का आंकड़ा बढ़ने के बाद खुद पर हुए विपक्षियों के हमले के जवाब में अफसरों या बोर्ड के कामकाज की समीक्षा करने के बजाय श्रद्धालुओं को ही कटघरे में घसीट लिया था। उमर ने सरकारी अमले को चौकस होने की सलाह तो नहीं दी पर यात्रियों को नसीहत दे डाली थी कि वे गलत मेडिकल सर्टिफिकेट लेकर यात्रा पर न निकलें। यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं के लिए क्या बेहतर इंतजाम हो सकते हैं, इस पर विचार तक करने की बात उनके श्रीमुख से नहीं फूटी थी। न्यायालय द्वारा गठित कमेटी में शामिल उमर के अफसरशाह अपने 'सियासी शाह' की सोच-शैली-सुर से अलग हटकर कुछ कह और कर पाए तो इसे न्यायालय की छड़ी का चमत्कार ही कहना पडे़गा।

माननीय न्यायालय की चिंता किसी भी मायने में सतही नहीं है। मगर यह भी सच है कि इस प्रकरण में आरोपी और कोतवाल दोनों की भूमिका कमोबेश बोर्ड के ही हाथ में आ गई है। अब देखना होगा कि अंततः धरातल पर हुई भूल-चूक, खामियों और कथित साजिशों की असल तस्वीर न्यायलय तक पंहुचने भी दी जाएगी या नहीं?

यह अंदेशा इसलिए चूंकि श्राइन बोर्ड का रवैया तो आज भी अजीबोगरीब है। देश की सर्वोच्च अदालत सारे घटनाचक्र पर निगाह रखे हुए हैं, यह जानते हुए भी बोर्ड आत्मनिरीक्षण के मूड में नहीं लगता। न्यायालय के हस्तक्षेप के बहाने व्यवस्था के फोडों-फफोलों और बीमार ग्रंथियों की सर्जरी करने का जो मौका उसके सामने है, बोर्ड उसे गंवा के सकता है। गड़बड़ाए तंत्र को झाड़-पोंछ कर साफ-सुथरा बनाने के बजाय उसका फोकस अपनी छवि को पाक-साफ बनाए रखने पर है। इससे बोर्ड के शिखर नेतृत्व का नकारात्मक और अड़ियल रवैया ही उजागर होता है।

इसका ताजा प्रमाण सामने है। अदालत के निर्देशों की छाया में बीते मंगल को बुलाई गई आपात बैठक के बाद जारी बोर्ड की आधिकारिक विज्ञप्ति से आत्मनिरीक्षण के संकेत मिले। बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नवीन के. चौधरी ने राज्यपाल की अध्यक्षता में हुई बोर्ड की बैठक के बाद फिर दोहरा दिया कि प्रबंधों में कहीं कोई कमी नहीं है।

चौधरी ने भी मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाते हुए यात्रियों के सेहत संबंधी प्रमाण-पत्रों की विश्वसनीयता और वैधता पर ही संदेह जता दिया। यानि गेंद झट दूसरे के पाले में। मुख्यमंत्री और बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की टिप्पणियों से साफ है कि उन्हें यात्रियों की मौत के बढ़े आंकड़ों की कोई और वजह नजर ही नहीं आ रही। यह दीगर बात है कि विपक्षी भाजपा, विहिप और श्रद्धालुओं के विभिन्न संगठन सुविधाओं के अभाव और यात्रा की अवधि को बीते तीन वर्षों के दौरान उत्तरोत्तर घटाते हुए साठ से उनतालिस दिन किए जाने को भी इसकी बड़ी वजह करार देते रहे हैं।

राष्ट्रपति को सौंपे गए एक ज्ञापन में इन्होंने बोर्ड के अध्यक्ष वोहरा पर घाटी के अलगाववादियों के दबाव में यात्रा की अवधि कम किए जाने का आरोप मढ़ा था। आरोप यह भी लगता रहा है कि बोर्ड में ऐसे लोगों की भरमार है जो आस्थावान हिंदू नहीं हैं। पर्यावरणविद के नाते बोर्ड की सदस्य बनाई गई प्रख्यात विशेषज्ञ सुनीता नारायण तो खुद कह चुकी हैं कि वे हिंदू जरूर हैं मगर धार्मिक हिंदू नहीं। अब इन्हीं सुनीता नारायण को महामहिम ने इस कमेटी में भी नामित कर दिया है। ऐसे लोग अपने विषय के विशेषज्ञ भले हों, मगर उनसे धार्मिक आस्थाओं के साथ न्याय की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जाने-अनजाने में यह अलगाववादियों के यात्रा विरोधी एजेंडे को ही पुष्ट करते हैं।

लिहाजा, बोर्ड और उसके अध्यक्ष की छवि निष्पक्ष और निर्विवाद नहीं रही है। महामहिम की अध्यक्षता वाली कमेटी के आकलन और मूल्यांकन की निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में रहेगी। मगर अभी उम्मीद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कमेटी चूंकि सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में काम कर रही है, इसलिए रोशनी की कई किरणें अभी कायम हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि कमेटी देश के चोटी के विशेषज्ञों से राय लेकर यात्रा मार्ग पर 12-15 लाख श्रद्धालुओं को अत्याधुनिक सुविधाएं देने के लिए आवश्यक तामझाम खड़ा करने की सिफरिश करेगी।

और यह भी कि कमेटी यात्रा की अवधि और घटाने, यात्रियों की संख्या सीमित करने अथवा साठ बरस से अधिक उम्र के लोगों को यात्रा न करने देने सरीखे बेतुके और अव्यावहारिक सुझाव नहीं देगी। बाबा बर्फानी के दर्शन को तीर्थयात्री तो हर आयु वर्ग के आएंगे। यह बोर्ड की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि यात्रा को सुगम बनाने के लिए वह मार्ग में कौन कौन सी व्यवस्थाएं खडी़ करता है। पर्यावरण के अहम सवाल की आड़ में आस्था पर प्रहार की नास्तिकों व देशघातियों की साजिशें नाकाम होंगी, यह भी उम्मीद की जानी चाहिए। सब कुछ ठीक रहा तो सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की बदौलत अगले बरस से यात्रा नितांत नए कलेवर में और पूर्णतः मंगलमय हुआ करेगी।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+