किसने इंदिरा गांधी को कहे थे अपशब्द?

Indira Gandhi
बलिया। नौजवानों को भले ही याद न हो लेकिन कई लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था। उस वक्त जो भी प्रधानमंत्री के खिलाफ मुंह खोलता था जेल जाता था यहां तक की मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी गयी थी। बावजूद इसके एक ऐसी साहसी महिला थी जिसने इंदिरा गांधी के सरकारी बंगले के सामने खड़े होकर उन्‍हें अपशब्द कहे थे और कोई उसका बाल बांका नहीं कर पाया था। वह महिला थीं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पत्नी द्विजा देवी, जिन्होंने इमरजेंसी के दिनों में श्रीमती गांधी को अपशब्द कहे थे।

यह रहस्योदघाटन पूर्व प्रधानमंत्री और आपातकाल में जेल में रहे चंद्रशेखर के सांसद बेटे नीरज शेखर ने किया। उनका कहना है कि उनकी मां ने यह साहस उस समय दिखाया था जब इंदिरा गांधी के विरूद्ध आवाज उठाने की हिम्मत कोई नहीं करता था और जो भी ऐसा करता था उसे जेल में डाल दिया जाता था। उन्होंने बताया कि जिस वक्त मां बंगले के सामने खड़े होकर अपशब्द कर रही थी उस वक्त बंगले का सुरक्षा गार्ड बार-बार चेतावनी दे रहा था वह ऐसा न करे। गार्ड ने कहा कि यदि आप इस तरह अपशब्द बोलेंगी तो गिरफ्तार कर ली जाएंगी फिर भी उनकी मां निडर होकर अपशब्द बोलती रहीं।

घटना का पूरा ब्योरा देते हुए सांसद नीरज शेखर ने बताया कि जब देश में इमरजेंसी लगी थी वह दिल्ली से बाहर थे। आने पर पता चला पिताजी तिहाड़ जेल में हैं। पिताजी ने उनसे कहा कि तुम घर जाओ मैं जल्दी वापस आ जाउंगा, लेकिन पिताजी को घर आने में उन्नीस महीने लग गए।

नीरज शेखर ने कहा, "पिताजी निजी सचिव रहे चचेरे भाई का एडमिशन सरदार पटेल स्कूल में करा दिया था। वे दोनों स्कूल जाने के लिए इंदिरा गांधी के बंगले के सामने स्थित बस स्टाप पर खड़े होते थे और बस पकड़ते थे। एक दिन बंगले की सुरक्षा में लगे पुलिस के जवान ने कहा कि कल से यहां खड़े मत होना तुम लोगों का यहां खड़े होने की इजाजत नही है। इस पर मां ने अपशब्द कहना शुरू कर दिया। वह व्यक्ति अंदर गया और लगभग बीस मिनट बाद आया उसने पुलिस वालों से कहा कि ये बच्चे यही खडे होंगे कोई आपत्ति नही है। तब मां का गुस्सा शांत हुआ था और वह घर लौटी थी।

श्री शेखर ने जब परिवार के उन दिनों की याद की तो उनकी आंखों में आंसू आ गए उन्होंने कहा कि पिताजी के उन्नीस महीना जेल में रहने के दौरान मां ने घर कैसे चलाया यह उनका साहस था। उस समय हम लोग मां के साथ रोज लान में बैठते थे और दरवाजे की ओर देखते थे कि कोई आज आएगा। इमरजेंसी का भयावह दृश्य ऐसा था कि जिस घर में लोगों का ताता लगा रहता था उस घर में आने का साहस कोई नहीं करता था। इमरजेंसी डे पर वह यह कामना करते हैं कि देश को फिर वैसा भयानक समय का सामना नहीं करना पड़े।

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