नक्‍सलियों के सामने नतमस्‍तक सत्‍ता की पूरी कहानी

Alex Paul Menon
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन को 12 दिनों के बाद नक्सलियों के चंगुल से मुक्ति मिल गई है। कलेक्टर अब कुछ ही झोटो में घर पहुंच जाएंगे और इसके साथ ही राज्य सरकार और कलेक्टर के परिजनों ने राहत की सांस ली है। इन 12 दिनों का घटनाक्रम इस प्रकार रहा- राज्य के सुकमा जिले के केरलापाल क्षेत्र के मांझीपारा गांव में 21 अप्रैल को शाम के लगभग पांच बजे कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन राज्य में चल रहे ग्राम सुराज अभियान के दौरान किसान सभा को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान सभा में नक्सली सदस्य भी शामिल थे जिसका अंदेशा कलेक्टर मेनन को नहीं था।

किसान सभा के दौरान सभा में लगभग 20 की संख्या में हथियारबंद नक्सली हमला करते हैं और कलेक्टर के दो सुरक्षा गार्डों को गोली मार देते हैं। इसके बाद नक्सली कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अगवा कर लेते हैं और वहां से जंगल की ओर रवाना हो जाते हैं। जैसे ही इसकी जानकारी राज्य के आला अधिकारियों को मिलती है। राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह को मामले से अवगत कराया जाता है और कलेक्टर की खोज शुरू की जाती है। इसके बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह राज्य के आला अधिकारियों की बैठक लेते हैं और मामले पर नजर बनाए रखने की हिदायत देते हैं।

तब तक इसकी सूचना कलेक्टर मेनन की गर्भवती पत्नी आशा मेनन को हो जाती है और वह नक्सलियों से कलेक्टर मेनन को मानवता के नाते रिहा करने की अपील करती हैं। घटना की जानकारी मिलने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह इसकी जनकारी केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को देते हैं। चिदंबरम इस मामले में राज्य सरकार को पूरी मदद का आश्वासन देते हैं। घटना के दूसरे दिन राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कलेक्टर मेनन का महत्वपूर्ण सुराग मिलने का दावा करते हैं और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश कलेक्टर मेनन की रिहाई के लिए मध्यस्था करने के लिए तैयार होने की बात कहते हैं।

22 अप्रैल की रात को ही माओवादी एक आडियो टेप जारी करते हैं और कलेक्टर के अपहरण की जवाबदारी लेते हुए अपने आठ साथियों की रिहाई समेत पांच मांमें सामने रखते हैं। माओवादी सरकार को 25 अप्रैल तक समय देते हैं। माओवादियों द्वारा मांगों को देखते हुए राज्य शासन राज्य में इस मामले से निपटने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय उपसमिति बनाने की घोषणा करती है। इस उपसमिति में रमन मंत्रिमंडल के चार सदस्यों को शामिल किया जाता है।

23 अप्रैल को रमन सिंह कहते हैं कि कलेक्टर मेनन को रिहा कराने के लिए बेहतर विकल्प की तलाश की जा रही है, साथ ही इसी दिन शाम को सर्वदलीय बैठक होती है जिसमें सभी दल कलेक्टर मेनन को रिहा करने की अपील करते हैं। इस दौरान मुख्यमंत्री रमन सिंह समस्या के हल के लिए बातचीत की पहल करते हैं। मुख्यमंत्री द्वारा बातचीत की पहल के बाद माओवादी छत्‍तीसगढ़ में संवाददाताओं को ई मेल संदेश भेजकर सरकार के साथ मध्यस्तता करने के लिए तीन लोगों भूतपूर्व अनसूचित जनजाति आयु बीडी शर्मा, सर्वोच्‍च न्यायालय के अधिवा प्रशांत भूषण और आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष कुंजाम के नाम का प्रस्ताव रख देते हैं।

इस दौरान मओवादी कलेक्टर मेनन के खराब स्वास्थ्य हालत का हवाला देते हुए दवा भेजने की मांग करते हैं। प्रशांत भूषण और मनीष कुंजाम मध्यस्थता करने से इंकार कर देते हैं लेकिन बाद में मनीष कुंजाम मानवता के नाते कलेक्टर तक दवा पहुंचाने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसी दौरान 24 अप्रैल को राज्य शासन अपनी ओर से मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा का नाम मध्यस्थता के लिए आगे करते हैं। इस बीच मनीष कुंजाम दवा लेकर जंगल की ओर रवाना हो जाते हैं।

इधर प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण और मनीष कुंजाम द्वारा मध्यस्थता के लिए मना करने के बाद माओवादी प्राफेसर हरगोपाल का नाम आगे करते हैं। जिससे राज्य सरकार मंजूर कर लेता है। राज्य सरकार समय सीमा को बढ़ाने की अपील भी करती है। 26 तारीख को कुंजाम वापस पहुंच कर कलेक्टर के स्वस्थ्य होने की जानकारी देते हैं। 26 अप्रैल को कलेक्टर मेनन की रिहाई के लिए राज्य सरकार और माओवादियों की ओर से आए मध्यस्थों के बीच बैठक शुरू हो जाती है लेकिन इस बैठक में कोई नतीजा नहीं निकलता है।

दूसरे दिन 27 अप्रैल को माओवादी शासन को मांगों पर अपना रवैया स्पष्ट करने की बात कहते है। इस दौरान बैठक का दूसरा दौर होता है लेकिन इस बार भी नतीजा नहीं। बाद में मुख्यमंत्री रमन सिंह कानून के दायरे में ही मांगों पर विचार करने की बात कहते हैं। 27 अप्रैल को माओवादी अपने नौ अन्य साथियों को भी रिहा करने की मांग कर देते हैं। इस प्रकार उनकी संख्या 17 पहुंच जाती है। इधर माओवादियों के मध्यस्थ बातचीत की जानकारी देने 28 तारीख को ताड़मेटला रवाना हो जाते हैं। दूसरे दिन मध्यस्थ वापस रायपुर पहुंचते हैं और कलेक्टर के स्वस्थ होने की जानकारी देते हैं।

वहीं बातचीत का ब्यौरा राज्य सरकार के मध्स्थ्यतों के सामने रखते हैं। 30 अप्रैल को माओवादी मीडिया को एक संदेश भेजते हैं और अपने आठ साथियों को रिहा करने की मांग करते हैं तथा सरकार को दो मई तक का समय देते हैं। 30 अप्रैल को ही पांच दौर की बातचीत के बाद राज्य सरकार और माओवादियों के मध्यस्थों के मध्य एक समझौते पर हस्ताक्षर किया जाता है जिसमें आदिवासियों के मामले की सुनवाई और जांच की प्रगति की समीक्षा के लिए राज्य में निर्मला बुच की अध्यक्षता में एक स्थायी उच्चाधिकार समिति बनाने का फैसला किया जाता है।

कलेक्टर मेनन को 48 घंटों में रिहा करने की बात होती है। कलेक्टर की रिहाई के इंतजार के दौरान एक मई को मीडिया को एक संदेश प्राप्त होता है जिसमें कलेक्टर को तीन मई को ताड़मेटला गांव में मध्स्थों के हवाले करने की बात कही जाती है। तीन मई की सुबह से कलेक्टर मेनन की रिहाई की कोशिश शुरू हो जाती है और अंतत: कलेक्टर मेनन शाम छह बजे के बाद रिहा हो जाते हैं तथा थके होने की बात कहते हैं। इधर राज्य सरकार तत्काल उच्चाधिकार समिति का गठन भी कर देती है।

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