फलक के बाद आफरीन- नाम बदला किस्‍मत नहीं

मुझे जीने दो पापा
अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव
"मैं चाहती हूं कि आपका हाथ पकड़कर चलूं। मेरे पैर इतने कमजोर हैं की मैं आपके गले में हाथ डाल कर उडूं। अभी तो आपके आंगन में मुझे नन्‍हें-नन्‍हें पैरों से छमछम नाचना है। आपकी मजबूत बांहों में मुझे झूला झूलना है... चिंता मत करना पापा मैं आपका खर्चा नहीं बढ़ाऊंगी। मत लाकर देना मुझे पायल, मैं मां की पुरानी हुई पायल पहन लूंगी। भैया के छोटे हुए कपड़ों से तन ढक लूंगी। बस एक बार चांद तारों से भरे घर में अपने आसमान के नीचे जीने का मौका दे दो पापा। मैं तो आपकी बेटी हूं, आपकी लाड़ली हूं मुझे अपने घर में रहने दो पापा। कुछ कोशिश आप करना कुछ मैं करुंगी, फिर मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊंगी। देखना मेरे हाथों में भी मेहंदी रचेगी और डोली में बैठकर आपके प्‍यारे आंगन से हमेशा के लिये चीड़िया की तरह उड़ जाऊंगी। बस एक बार मुझे अपने प्‍यार तले जीने का मौका दे दो।"

जी हां आफरीन बोल नहीं सकती थी। अगर व‍ह बोल सकती तो जिस समय उसका पिता उसे जान से मारने की कोशिश कर रहा था वह यही कहती। अफसोस उसका पिता समझ नहीं पाया क्‍योंकि उसे बेटी नहीं बेटा चाहिए था। इसलिये उसने आफरीन की आवाज हमेशा के लिये बंद कर दी। बेटे की चाहत में उसने अपने हाथों से ही अपनी बेटी को मौत के घाट उतार दिया। पहले फलक थी अब आफरीन। इस पूरे मसले में बस नाम बदला और जो नहीं बदली वह थी किस्‍मत।

आपको बताते चलें कि बैंगलोर में एक हैवान बाप ने अपनी महज तीन माह की बच्‍ची को जान से मारने की कोशिश की। उसने उसे सिगरेट से जलाया और उसका सिर दीवार पर पटका। गंभीर हालत में उसकी मां ने उसे अस्‍पताल में भर्ती कराया था। वह कोमा में थी। पांच दिनों तक वेंटीलेटर पर रही मगर उस पर ढहाये गये जुर्म के सामने मेडिकल साइंस भी फेल हो गया और बुधवार की सुबह उसकी मौत हो गई। आफरीन अब लौटकर तो नहीं आयेगी मगर वह एक बड़ा सवाल छोड़कर चली गई। सवाल यह कि आखिर कब तक मारी जायेंगी बेटियां।

किसी शायर ने सच ही कहा है कि "मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्‍चा, बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है"। दिल्‍ली की फलक व बैगलोर की आफरीन से लेकर ग्‍वालियर की मात्र एक दिन बच्‍ची का दोष सिर्फ इतना ही था कि वह बेटी के रूप में पैदा हुईं थीं। ग्‍वालियर में एक पिता ने मात्र एक दिन की बच्‍ची के मूंह में तंबाकु ठूस दी जिससे उसकी मौत हो गई।

दरअसल हुआ यह कि ग्‍वालियर के गांव की रहने वाली अनीता राणा ने अस्‍पताल में एक बच्‍ची को जन्‍म दिया। जन्‍म के दूसरे दिन ही बच्‍ची का पिता नरेन्‍द्र राणा अनीता के पास आया और बच्‍ची को अपने पास सुलाने की बात कहते हुए ले गया। तड़के अनीता बच्‍ची को दूध पिलाने के लिये अपने पास लेकर आई तो उसने पाया कि उसकी मौत हो चुकी है। आनन-फानन में डॉक्‍टर को बुलाया गया। डॉक्‍टर ने कहा कि बच्‍ची की मौत हुए घंटो हो चुके हैं।

मां की शिकायत पर पिता नरेन्‍द्र को गिरफ्तार कर लिया गया है। एफएसएल रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि हो गई है कि बच्‍ची की मौत नीकोटीन से हुई है। अनिता ने बताया कि उसका पति उससे अक्‍सर कहता था कि उसे बेटा चाहिए और अगर बेटा नहीं हुआ तो वह या तो उसे जान से मार देगा या फिर होने वाली बच्‍ची को। इन घिनौनी वारदातों ने देश के सामने कुछ अनसुलझे सवाल खड़े कर दियें हैं, जिसका जवाब ढूंढ निकालना बेहद मुश्किल है। हम भी यहां कुछ सवाल पूछना चाहते हैं जिसका जवाब आपको देना हैं। आप अपने जवाब नीचे दिये गये कमेंट बाक्‍स में लिख सकते हैं।


1. आखिर बेटियों को कब तक बोझ समझता रहेगा समाज?

2. क्‍या 21वीं सदी में यह घटना भारतीय समाज पर कलंक नहीं हैं?

3. आखिर कब हमारा समाज बेटियों की कद्र करना सिखेगा?

4. ऐसे मां-बाप को क्‍या सजा देनी चाहिये?

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