लड़कियों की अपेक्षा लड़के ज्यादा मंदबुद्धि

नाम पुकारने पर ध्यान न दे और बच्चे के भाषा के प्रयोग तथा सामाजिक व्यवहार में कमी दिखे तो सतर्क हो जाएं यह मानसिक रोग के लक्षण हो सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसी में तत्काल डाक्टर से सलाह लें क्योंकि यह मंदबुद्घि के प्रारम्भिक लक्षण हैं। बच्चों में होने वाला यह रोग लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में चार पांच गुना ज्यादा पाया जाता है।
इससे ग्रस्त बच्चे सामान्य तौर पर विकसित नहीं हो पाते। अधिकांश मामलों में इस बीमारी का सही उपचार भी समय रहते शुरू नहीं हो पाता। बाल रोग विशेषज्ञों की मानें तो यह एक तरह की मानसिक बीमारी है जिसमें मुख्यत: बातचीत करने तथा परिवेश में उचित प्रतिक्रिया करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसका न तो खून की जांच से पता लगाया जा सकता है और न ही एमआरआई या सीटी स्कैन से।
डाक्टर की कुशलता से ही बीमारी की पहचान संभव है। सिर्फ बच्चे के हाव-भाव से ही इस बीमारी को पहचाना जा सकता है। व्यावहारिक प्रशिक्षण ही इसका मु य इलाज है। इस बीमारी की पहचान के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऑटिज्म डायग्नोस्टिक स्केल तय किया था । पूरे देश में इसी के आधार पर बच्चों में ऑटिज्म का परीक्षण किया जाता है। आजीवन रहने वाली इस बीमारी का दवा से इलाज कम ही संभव है। ऑटिज्म पीडि़त बच्चों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण ही मुख्य इलाज है। हालांकि ऐसे बच्चों के लिए स्कूल काफी कम हैं। सरकार ने इनके लिए बचपन स्कूल खोला था लेकिन यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। कुछ लोग निजी स्तर पर ऑटिज्म पीडित बच्चों को प्रशिक्षण देने का कार्य कर रहे हैं।












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