रेल बजट: वर्तमान से ही लिखी जायेगी भविष्य की स्क्रिप्ट

त्रिवेदी चाहते हैं कि रेलवे स्टेशन एयरपोर्ट की तरह साफ सुथरे चमकदार हों, वह चाहते हैं कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरू में रेलवे के 50 हजार मुलाजिम हों जो सिवाय स्टेशनों की देखभाल के और कुछ न करें। वह चाहते हैं कि स्टेशन मॉल और मल्टीप्लेक्स में तब्दील हो जाएं। लेकिन फिलहाल तो आलम यह है कि रोजाना 1.5 करोड़ मुसाफिरों को मंजिल तक पहुंचाने वाली रेल को खुद अपनी मंजिल का पता नहीं। रेलवे की तरक्की की रफ्तार अब महज सुस्त नहीं रही थम गई है।
त्रिवेदी जानते हैं कि रेल की तरक्की में देश की तरक्की है। वह मानते हैं कि जब तक रेलवे की तरक्की की रफ्तार 10 फीसदी नहीं पहुंचेगी, देश भी 8 फीसदी ग्रोथ रेट को नहीं छू सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या रेल को राजनीति के खेल से बचाना मुमकिन है। ऐसा नहीं कि रेल की तरक्की मुमकिन नहीं। राजस्व बढ़ाने के लिए भी कई उपाय हैं। केंद्र सरकार रेल मंत्रालय के बजट के वास्ते दी जाने वाली मदद में इजाफा कर सकती है।
पित्रोदा कमेटी के मुताबिक इंटरनल जेनरेशन यानी अपने स्रोत से भी रेलवे 20 हजार करोड़ तक नए राजस्व की सालाना उगाही कर सकती है। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप के जरिए बड़े कारपोरेट घरानों को रेलवे की योजनाओं में शामिल किया जा सकता है और फिर उधार लेने का जरिया भी है। लेकिन सवाल यह है कि मुसाफिरों का बोझ उठाने वाली रेल आखिर राजनीति का बोझ कब तक उठाएगी। रेल का राजनीति से पुराना रिश्ता रहा है और हर बार रेल बजट पर राजनैतिक समीकरणों की छाप दिखाई देती है लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों से साफ है कि इस बार के रेल बजट में कुछ खास जरूर होगा और यह आने वाले दिनों के राजनैतिक समीकरणों का एक आईना होगा।












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