समलैंगिकता को मथ रहा है सुप्रीम कोर्ट, सुनवाई जारी

दिल्ली बाल संरक्षण अधिकार आयोग ने अपनी दलीलें दूसरे दिन भी जारी रखीं। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि समलैंगिकता को बदलते सामाजिक परिवेश में देखने की जरूरत है। 20-25 साल पहले जिन बातों को अनैतिक कहा जाता था, उन्हें अब स्वीकृति मिल चुकी है। हाईकोर्ट ने अविवाहित जोड़ों के साथ रहने की बात भी कही है। लिव-इन रिलेशनशिप को सामाजिक और कानूनी मान्यता मिल गई है। कुछ साल पहले समाज इस तरह के रिश्तों को स्वीकार नहीं करता था। सिंगल पैरेंट का चलन भी समाज में तेजी से बढ़ रहा है। बहुत से लोग शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते, लेकिन पिता बनना चाहते हैं। ऐसे में कृत्रिम गर्भ के जरिए बच्चा हासिल कर वह पिता होने का सुख प्राप्त कर लेते हैं। सरोगेसी का चलन भी देश में तेजी से बढ़ रहा है।
सर्वोच्च अदालत द्वारा खजुराहो के मंदिरों का जिक्र करने पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र शरण ने कहा कि सामाजिक मुद्दे प्रतिमाओं और मूर्तिकला के आधार पर तय नहीं किए जा सकते। पीठ ने कहा कि 1860 से पहले समलैंगिकता अपराध नहीं था। अदालत का मत था कि समलैंगिकता को सिर्फ यौन संबंधों की नजर से नहीं देखा जा सकता। पीठ ने कहा कि प्रकृति के विरुद्ध क्या है। इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा।
गौरतलब है कि दिल्ली बाल संरक्षण अधिकार आयोग ने अपनी दलीलें दूसरे दिन भी जारी रखीं। अब अगली सुनवाई बुधवार होगी। याद रहे कि दिल्ली हाईकोर्ट के 2 जुलाई 2009 के फैसले पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सामाजिक और धार्मिक संगठनों के अलावा सरकारी संस्थाओं ने भी याचिका दायर की है। हाईकोर्ट ने सहमति के आधार पर दो वयस्कों के बीच समलैंगिकता को मान्यता प्रदान कर दी थी। सहमत वयस्कों के परिप्रेक्ष्य में आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को गैर-कानूनी करार देने के प्रावधान को हाईकोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया था।












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