जंतर-मंतर के पास इमारत बनाने पर रोक

जस्टिस जी. एस. सिंघवी व जस्टिस अशोक कुमार गांगुली की पीठ फैसले में ने कहा कि आजादी के बाद बड़ी तादाद में संरक्षित इमारतों का नामोनिशान मिट गया। यही कारण था कि केंद्र सरकार ने जून 1992 में ऐतिहासिक इमारतों को बचाने के लिए 200 मीटर की परिधि में निर्माण या खनन न करने की अधिसूचना जारी की। यदि इस दिशा में कारगर कदम नहीं उठाए गए तो प्राचीन स्मारकों का जल्द ही नामोनिशान मिट जाएगा। जंतर-मंतर के आसपास भी उंची इमारतें बन गई हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर के बहुत सारे उपकरण बेकार हो गए हैं।
निषेध क्षेत्र में निर्माण का अधिकार सिर्फ एएसआई को है। 100 मीटर के भीतर जून 1992 से पहले बने भवनों के मालिकों को यदि अपने मकान में मरम्मत या निर्माण करना है तो उन्हें एएसआई से अनुमति लेनी होगी। लेकिन मरम्मत के नाम पर किसी भवन को गिराकर उस पर नया निर्माण नहीं कराया जा सकता।
जंतर-मंतर से 101 मीटर की दूरी पर स्थित जनपथ लेन के प्लॉट नंबर 14 में नरेन्द्र आनंद और रावल अपार्टमेंटस प्राइवेट लिमिटेड ने बहुमंजिले कॉमर्शियल भवन के निर्माण के लिए 1986 में भवन योजना की मंजूरी के लिए नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) में आवेदन किया था। एनडीएमसी ने यह कहकर मंजूरी देने से इनकार कर दिया कि ये इलाका दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के संयोजित क्षेत्र में आता है।
इसके सात साल बाद बिल्डर ने फिर नक्शे की स्वीकृति के लिए आवेदन दाखिल किया। एनडीएमसी ने मार्च 2001 में भवन निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी। गौरतलब है कि बिल्डर ने पुरानी इमारत को नुकसान पहुंचा कर नींव डालने के लिए मिट्टी खोदकर हटानी शुरू कर दी जिस पर एएसआई ने निर्माण पर आपत्ति जताई। एएसआई ने कहा कि निर्माण संरक्षित इमारत से 200 मीटर के दायरे में है, लिहाजा उससे अनुमति लेनी अनिवार्य है। इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा।












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