कालीदास मार्ग से रेसकोर्स रोड की खाई पाटने में जुटीं माया

राजनीति के हिसाब से देश के सबसे असरदार राज्य उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। जिसको लेकर राज्य के सभी राजनीतिक दल जुबानी जंग शुरू कर चुके हैं। यूपी में बसपा, सपा, कांग्रेस और बीजेपी के बीच इस बार कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। यूपी विधानसभा चुनावों के नतीजों पर सबकी पैनी नजर है। इन चुनाव नतीजों पर बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस युवराज राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य निर्भर करता है।
2007 के विधानसभा चुनावों में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद सूबे की मुखिया बनी मायावती अब लखनऊ से दिल्ली की ओर कदम बढ़ाने की जुगत में हैं। लखनऊ के कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर मजबूती से अपनी पैठ बनाए मायावती अब केंद्र में रेस कोर्स रोड स्थित प्रधानमंत्री आवास की तरफ नजरें गढ़ाए हैं। इस लंबे सफर को पार करने के लिए उन्होंने सुनहरे सपनों को बुनना शुरू कर दिया है।
जिसकी शुरुआत मायावती ने उत्तर प्रदेश का बंटवारा करने वाला प्रस्ताव केंद्र को भेजकर की। चुनावों से ठीक चले इस तुरुप के इक्के से मायावती ने सभी पार्टियों को चित कर दिया। बड़े से लेकर क्षेत्रीय दल तक इसका विरोध नहीं कर पाए। विधानसभा में मायावती का यह प्रस्ताव बिना किसी अड़चन के पास हो गया। इस बिल को पेश कर मायावती ने निश्चित ही अपने वोट बैंक को मजबूती दे डाली।
केंद्र सरकार ने मायावती का राज्य को बांटने वाला प्रस्ताव उन्हें वापस भेज दिया। जिससे उत्तर प्रदेश में बसपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई और भी गर्मा गई है। मायावती ने केंद्र पर निशाना साधते हुए कहा कि केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश का बंटवारा उसी आधार पर करे जिस आधार पर उसने उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को अलग किया था।
पूरे लखनऊ में इस समय नजर दौड़ाएं तो मायावती की गढ़ी हुई मूर्तियां उनकी अमरज्योति की कहानी बयां कर रही हैं। मायावती ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए अपने साथ भीमराव अंबेडकर, महात्मा बुद्ध, काशीराम और कई अन्य की मूर्तियां लगवा रखी हैं। लखनऊ में इस समय सिर्फ हाथी ही हुंकार भरता नजर आ रहा है।
दिल्ली से सटे नोएडा में भी पार्क बनवाकर मायावती ने हाथी की गूंज पैदा कर दी है। जो केंद्र में काबिज यूपीए सरकार के कानों में हलचल पैदा कर रही है। तमाम न्यूज चैनल इस समय उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणामों की भविष्वाणी करने में जुटे हुए हैं। जिसके लिए उन्होंने तमाम एक्जिट पोल कराए हैं। जिनके नतीजे बता रहे हैं कि मायावती को इस बार भी कम करके नहीं आंका जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के नतीजे ही केंद्र में या तो कांग्रेस युवराज को आने वाले समय का प्रधानमंत्री बनाएंगें या फिर एक हारा हुआ राजनीतिज्ञ। इन चुनावों में राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है। 2009 में हुए लोकसभा चुनावों से पहले राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की खाक छानी थी। जिसके बाद भी नतीजे प्रभावकारी नहीं रहे।
इन नतीजों से राहुल गांधी ने निराश न होकर विधानसभा में फिर से पार्टी की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। राहुल गांधी का यह फैसला एक जुए की तरह नजर आ रहा है। अगर कांग्रेस यूपी में मजबूती से वापस आती है तो केंद्र में भी होने वाले लोकसभा 2014 चुनावों में भी उसकी मजबूती बढ़ेगी। वहीं अगर यूपी में एक बार फिर कांग्रेस मुंह की खाती है तो राहुल गांधी की भी अपनी ही पार्टी में भूमिका सवालों के घेरे में आ सकती है।
अगर उत्तर प्रदेश में नतीजे मायावती के पक्ष में गए तो फिर 2014 में लोकसभा में होने वाले चुनावों में भी उनकी भूमिका अहम हो सकती है। विधानसभा में जीत लोकसभा की राज्य की 80 सीटों की गणित में अहम भूमिका निभा सकती है। ये नतीजे मायावती को प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का सशक्त दावेदार बना सकते हैं।
महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटालों और सबसे अहम अन्ना हजारे की लहर ने यूपीए सरकार की मुश्किलों को बढ़ाया है। पिछले 2 लोकसभा में केंद्र की सत्ता में आसानी से काबिज होने वाली कांग्रेस इस बार उस मुकाम पर पहुंचेगी इसमें भी संदेह है। अगर गठबंधन सामने आया तो हो सकता है कि मायावती के तेजी से बढ़ते कदम प्रधानमंत्री की गद्दी पर जाकर रुकें।
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