मदरसों में नहीं लागू होगा शिक्षा का अधिकार कानून

शिक्षा का अधिकार कानून के लिए 86वें संविधान संशोधन के माध्यम से आर्टिकल 21-ए में परिवर्तन किया गया था। लेकिन इस कानून के लागू होने के साथ ही कुछ तबकों में इसका विरोध होने लगा। खासकर मदरसों के संचालक इस कानून से खुद को बाहर किए जाने की मांग कर रहे थे। लेकिन मानव संसाधन मंत्रालय ने उनकी मांगों को मानने से इंकार कर दिया था। इस कानून में देश के सभी सरकारी स्कूलों में 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को निशुल्क शिक्षा दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
इसके तहत निजी स्कूलों को भी प्राथमिक स्तर पर पच्चीस प्रतिशत छात्रों को निशुल्क शिक्षा दिए जाने का नियम है। हालांकि निजी स्कूल भी पच्चीस फीसदी छात्रों को निशुल्क शिक्षा दिए जाने का विरोध करते रहे हैं लेकिन मदरसों के मामले में सरकार ने चुनावी दबाव के चलते मंगलवार को कैबिनेट में एक प्रस्ताव पारित कर उन्हें कानून के बाहर रखे जाने का फैसला ले लिया। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप तथा कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के दबाव में मानव संसाधन मंत्रालय ने मंगलवार को ही कैबिनेट की बैठक में मदरसों को शिक्षा के अधिकार कानून से बाहर रखे जाने का प्रस्ताव भेजा था।
देर शाम हुई कैबिनेट की बैठक में इसे स्वीकार भी कर लिया गया। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के प्रभारी कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह और रीता बहुगुणा जोशी ने मदरसा शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की थी। इन नेताओं ने मदरसों को आरटीई कानून से बाहर रखने तथा मदरसों की रुकी हुई वित्तीय मदद को तत्काल जारी करने के लिए हस्तक्षेप किए जाने की मांग की थी।












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