प्रोमोशन ऑफ करप्शन है सरकारी बिल: प्रशांत भूषण

इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार का लोकपाल बिल प्रोमोशन ऑफ करप्शन है।
प्रशांत भूषण ने कहा, "आज भ्रष्टाचार के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आज जांच का अधिकार उसी व्यक्ति के पास होता है, जो विभाग से ताल्लुक रखता है। उसका प्रोमोशन, वेतनवृद्धि से लेकर सब चीजों के लिए उसी विभाग तक निर्भर रहना पड़ता है। हमारी मांग है कि एक ऐसी संस्था बनायी जाये।" हमने कहा था कि लोकपाल को किसी जांच के लिए अनुमति नहीं लेनी होगी। उसके चयन में सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा नहीं होगा। उसकी चयन समिति में नेताओं की ओर से प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष के अलावा स्वतंत्र अधिकारी हों। सरकार जो बिल लायी, उसमें उन्होंने पांच आदमी सरकार के ही रख दिये। यानी साफ है कि वो अपने ही आदमी को लोकपाल बनाकर भ्रष्टाचार को रोकना नहीं चाहते। यह लोकपाल बिल नहीं, यह प्रोमोशन ऑफ करप्शन है।
प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकारी लोकपाल महज एक पोस्ट ऑफिस होगा, जहां आप शिकायत दे सकते हैं। अगर ग्रुप ए, बी के अधिकारी हों तो सीबीआई को जांच दी जायेगी। सी और डी को लोकपाल के दायरे में रखा ही नहीं। उसका तर्क दिया है कि इतने सारे लोगों की जांच लोकपाल नहीं कर सकता। अगर लोकपाल इतने सारे लोगों की जांच लोकपाल नहीं कर सकता, तो सीवीसी के तहत अधिकारियों की संख्या बढ़ा क्यों नहीं देते।
अब आपने प्रधानमंत्री को हटा दिया, जजों को हटा दिया। सारी पार्टियों ने सर्वसम्मति से पास किया कि सारे अधिकारी लोकपाल के दायरे में आयेगा, लेकिन स्थाई समिति ने सब कुछ हटा दिया, जबकि समिति के पास तो सर्वसम्मिति से पास प्रस्ताव था। जहां सर्वसम्मति से पास प्रोपोजल को भी बदल दे, जहां 80 प्रतिशत लोग जन लोकपाल के समर्थन में है, उसके बाद भी सरकार उसके विरुद्ध लेकर आती है।
सवाल यह उठता है कि जनता की इच्छा के विरुद्ध जाकर कानून बने या सरकार की मनमानी से। अगर जन लोकपाल बिल नहीं पास होता है, तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है। विकल्प सिर्फ आंदोलन ही बचता है। हमारे आंदोलन का अगला पड़ाव जनता के बीच होगा। हम जनता से पूछेंगे कि कैसा लोकपाल हो, क्या होना चाहिये क्या नहीं होना चाहिये। हमारी मांग है कि देश की जनता से पूछ कर यह तय करना चाहिये कि कैसा कानून बने।












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