भूमि अधिग्रहण बिल कैबिनेट से पास, किसानों को होगा फायदा

Cabinet clears land acquisition bill
नई दिल्ली। मायावती सरकार और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बीच भट्टा पारसौल पर खींची तलवार ने अब अपना स्वरूप ग्रहण कर लिया है। राहुल गांधी ने किसानों को आश्वासन दिया था कि भूमि अधिग्रहण पर उनकी सरकार नया कानून लाएगी। इस मद्देनजर सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट ने भू-अधिग्रहण बिल के नए मसौदे को मंजूरी दे दी। इस मसौदे में मुआवजा के दरों में फेरबदल किया गया है। बताया जा रहा है कि इस बिल से किसानों को फायदा और बिल्डरों को और खास तौर पर रीयल स्टेट का धक्का पहुंचेगा। इस बिल को पास कराने में प्रधानमंत्री को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि कुछ सहयोगी दलों औऱ कुछ सहयोगियों ने इसका विरोध किया था।

शहरी क्षेत्र को मिलेगा बाजार मूल्य से दो गुणा मुआवजा

सूत्रों ने बताया कि मसौदे में शहरी क्षेत्र में मुआवजा बाजार मूल्य से दो गुणा कर दिया गय़ा है वहीं जबकि ग्रामीण क्षेत्र को झटका देते हुए इसे छह से घटाकर चार गुणा कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि कानून बनने पर विधेयक के प्रावधान उन जमीनों पर भी लागू होंगे जिनका अधिग्रहण हो चुका है पर उनपर अभी तक कब्जा नहीं हो पाया है, या किसानों को मुआवजा नहीं मिला है। बिल 7 सितंबर को संसद में पेश होगा और यह 117 साल पुराने कानून की जगह लेगा। हालांकि इस बिल के कई बातों पर कई मंत्रियों को आपत्ति थी, जो पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आग्रह और उद्योग संगठनों के दबाव में बहु फसली जमीन के अधिग्रहण के प्रावधान में ढील दी गई है, जबकि बहु फसली जमीन के अधिग्रहण पर पहले सख्त प्रतिबंध का प्रावधान किया गया था। मंत्रिमंडल द्वारा पारित विधेयक के मुताबिक, किसी भी गांव की पांच फीसदी से अधिक बहु फसली जमीन अधिग्रहीत नहीं की जाएगी।

राज्य भी बना सकेंगे अपना भूमि अधिग्रहण कानून

सात सितंबर को पेश होने जा रहे भूमि अधिग्रहण बिल के मसौदे में राज्यों को भी अपना भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की बात कही गई है। मसौदे में पहले जहां यह प्रावधान था कि किसानों की अधिग्रहीत जमीन पर पांच सालों के दौरान अगर प्रस्तावित परियोजना स्थापित नहीं हुई तो जमीन किसानों को वापस कर दी जाएगी, अब ऐसा नहीं होगा। वहीं परियोजना स्थापित करने की अवधि बढ़ाकर अब 10 साल कर दी गई है, इसके बाद भी परियोजना नहीं लगी तो उसे किसानों को देने के बजाय संबंधित राज्यों के भूमि बैंक को सौंप देने का प्रावधान कर दिया गया है।

80 फीसदी किसानों की सहमति होगी जरूरी

भूमि अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी भूस्वामियों की सहमति जरूरी होगी। जनहित को परिभाषित करते हुए इसके दायरे को सीमित किया गया है, लेकिन एक नया वर्ग भी जोड़ा गया, जिसमें विद्युत संयंत्र, रेलवे, बंदरगाह और सिंचाई परियोजनाएं प्रमुख हैं। शर्त यह है कि ऐसी परियोजनाएं शत प्रतिशत सरकारी होनी चाहिए।

भू-स्वामियों को मिलेंगे पेंशन औऱ परियोजनाओं में नौकरी

भूमि अधिग्रहीत करने के बाद जमीन के मुआवजे सहित पेंशन और अधिग्रहीत भूमि के मालिक को उस पर बनने वाली परियोजना में नौकरी और कई तरह के नकद मुआवजे का प्रावधान है। नौकरी न दे पाने पर पांच लाख नगद देने होगा। पेंशन के तौर पर भू स्वामी को साल भर तक 3000 और इसके बाद अगले 20 साल तक 2000 रुपये मासिक पेंशन देनी होगी। पुनर्वास व पुनर्स्थापना पैकेज को संशोधित करते हुए ग्रामीण क्षेत्र में इसकी सीमा जहां 100 एकड़ ही रहेगी, वहीं शहरी क्षेत्र के लिए इसे घटाकर 50 एकड़ कर दिया गया है। अधिग्रहीत जमीन के बदले जमीन देने का प्रावधान जहां लागू होगा, वहां प्रभावित अनुसूचित जन जाति के भूस्वामी को एक एकड़ के मुकाबले पांच एकड़ देने का प्रावधान होगा।

प्रधानमंत्री और राहुल गांधी का बिल में अहम योगदान

मंत्रिमंडल में जिस तरह की खींचतान के बीच भूमि अधिग्रहण बिल को मंजूरी दी गई है उससे साफ लग रहा है की प्रधानमंत्री ने अपने दबाव का खूब इस्तेमाल किया है। बताया जा रहा है कि कैबिनेट की बैठक में इस बिल का विरोध विलासराव देशमुख, वीरप्पा मोइली, वीरभद्र सिंह के अलावे पी. चिदंबरम और शरद पवार ने किया था। ये सभी लोग जयराम रमेश द्वारा पेश इस विधेयक से खुश नहीं है। यह भी बताया जा रहा है कि इस विधेयक को प्रणब मुखर्जी ने जीओएम में भेजने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन प्रधानमंत्री इसे जल्द से जल्द कैबिनेट को हरी झंड़ी देने के बाद संसद में पेश करने के पक्ष में थे। जिसमें वह कामयाब रहे। इस बिल को लाने में राहुल गांधी में भी अहम भूमिका निभाई है।

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