संसद के‍ लिए नहीं जनता के लिए है लोकतंत्र

दिल्‍ली। सरकार में फैले भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्‍ना हजारे ने जंतर-मंतर से जो आंदोलन शुरू किया था उसकी गूंज अब पूरे देश में सुनाई दे रही है। देश की जनता भ्रष्‍टाचार से परेशान थी जिस वजह से अब इसे मिटाने की मुहिम शुरू हो चुकी है। जब अन्‍ना हजारे ने यह अनशन शुरू किया था तो उनका मजाक उड़ाया था।

कुछ लोगों ने इस मुहिम को उसी समय आंदोलन का नाम दे दिया था। इस आंदोलन में मध्‍यमवर्ग का इंसान जुड़ गया जो इसकी ताकत बन गया। आंदोलन की शुरुआत में इसका विरोध करने वाले लोगों ने आंदोलन के आगे बढ़ने के साथ ही इसके सामने घुटने टेक दिए। इस आंदोलन की वजह से आम लोगों का भ्रष्‍टाचार के खिलाफ गुस्‍सा सामने आया।

जनलोकपाल बिल को भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने वाले बिल के रूप में पेश किया जा रहा है। इसमें कई ऐसी बातें हैं जिनपर चर्चा करना जरूरी है। सबसे पहली बात की देश की जनता यहां के खराब शासन और भ्रष्‍टचार से पूरी तरह तंग आ चुकी है। दूसरा कि जिन लोगों के हाथ में इस समय शासन की बागडोर है उन्‍हें देश की जमीनी सच्‍चाई का अंदाजा नहीं है।

दूसरा कारण सबसे चिंतित करने वाला है। कुछ दिन पहले मैंने दिल्‍ली और देश के दूसरे हिस्‍सों के बची पैदा होती दूरियों के बारे में लिखा। कुछ हफ्ते पहले, मैंने दिल्ली और भारत के बाकी हिस्‍सों के विचारों के बीच बढ़ती दूरियों के बारे में लिखा। दिल्‍ली में अन्‍ना हजारे के अनशन को शासन की बागडोर संभालने वालों ने पहले तो पूरी तरह से खारिज कर दिया। जब इस विरोध से बात नहीं बनी तो उनके आंदोलन को दबाने के लिए उन्‍हें अन्‍ना हजारे और उनकी टीम के सदस्‍यों को गिरफ्तार कर लिया गया।

शासन की बागडोर संभालने वाले ये लोग अन्‍ना हजारे के आंदोलन को संविधान के खिलाफ बता रहे थे। जब यह दांव भी बेकार गया तो अन्‍ना हजारे पर यह आरोप लगाया गया कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन में उन्‍हें अमेरिका से सहयोग मिल रहा है। कभी उन पर आरएसएस का एजेंट होने का आरोप लगाया गया था। जब ये सारे कदम विफल रहे तो इसके लिए कामयाब शख्सियतों को अन्‍ना हजारे के आंदोलन का विरोध करने के लिए सामने लाया गया। बुकर विजेता अरुंधति राय ने भी अन्‍ना हजारे के आंदोलन के खिलाफ जमकर भड़ांस निकाली। इसके बाद राम‍ विलसा पासवान ने भी संसद में बयान देते हुए लोकपाल बिल को अल्‍पसंख्‍यक विरोधी करार दिया था।

अन्‍ना हजारे के आंदोलन की वजह से केवल 2 साल पहले चुनी गई सरकार को काफी नुकसान हुआ है। जब सरकार को यह लगा कि अन्‍ना हजारे के आंदोलन को पूरे देश में समर्थन मिल रहा है तो देश के प्रधानमंत्री ने भी उनके सम्‍मान में कहा कि अन्‍ना हजारे देश के हीरो हैं और हम उनके जज्‍बे को सलाम करते हैं। यह एक अलग बात है सरकार की तरफ से अन्‍ना हजारे को यह सम्‍मान तब नहीं दिया गया जब उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की थी। सरकार के कुछ मंत्री पिछले 5 महीने से किसी तरह की सहमति बनाने के लिए टीम अन्‍ना से बैठकें कर रहे थे।

जब सरकार ने जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा की बात कही तो पूरे देश में सरकार के इस कदम का स्‍वागत किया गया। सरकार के इस फैसले से लग रहा था कि वह किसी न किसी तरीके से अब इस मुद्दे पर सह‍मति करना चाहती है। हालांकि सरकार को भी पता है कि भ्रष्‍टाचार के मामले पर सरकार और टीम अन्‍ना के लोकपाल बिल में काफी अंतर हैं। इस हालत में सरकार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि उसे क्‍या कदम उठाना चाहिए।

दिल्‍ली में शासन की बागडोर संभाले कुछ लोग अन्‍ना हजारे के आंदोलन को संविधान का मजाक करार देते हैं। शायद ऐसे लोगों को संविधान की बिल्‍कुल भी जानाकरी नहीं है। यह स्पष्ट है कि वे हमारे लोकतंत्र, गणतंत्र, या संविधान समझ में नहीं आता। जब डॉ. अम्बेडकर ने हमारा संविधान लिखा था उन्‍होंने इसकी शुरुआत 'हम लोग' शब्‍द के साथ की थी। इसका मतलब है कि लोग सर्वोच्च हैं। संसदीय वर्चस्व की अवधारणा केवल विज़ एक विज़ हमारे लोकतंत्र यानी कार्यपालिका और न्यायपालिका के अन्य हथियार हैं। हमारे संविधान में जनता सुप्रीम है और संसद भी जनता से ऊपर नहं है।

संसद के अंदर जनता का प्रतिनिधित्‍व करने वाले सांसदों की जनता के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। थॉमस जेफरसन ने लिखा है कि, "एक छोटी सी विद्रोह अब और फिर एक अच्छी बात है बोली. सरकार को रास्‍ते पर लाने के लिए यह कदम जरूरी थी। जय अन्‍ना।

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