अन्ना हजारे के कदमों से धन्य हो गया तिहाड़ जेल

आस पास बजते देशभक्ति के गीत। बूढ़े, बच्चे और जवान। सब एक जोश में नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। हम तो कहते हैं कलमाड़ी को तिहार जेल से बहार निकल कर 1 साल के लिए ऐसे मार्च में भाग लेने की सजा दे दो अगर वो देशभक्त बनकर ना लौटे तो कहना।
कहां है कसाब ज़रा देखे- यह है मेरा भारत, जिसे वो बिगाड़ने चला था। चिंता मत कर एक बार इस भ्रष्टाचार से निपट ले, फिर कोई अन्ना आतंकवाद के खिलाफ भी खड़ा होगा। पर दोस्तों बात करें इस जुलूस की, तो क्या समा था- देशभक्ति हीलोर लेती हुई, मोमबातियों का रेला। उन शमाओं के बीच जोर से लगते नारे। गले चिल्ला चिल्लाके बेठे जा रहे थे पर जोश था की कम होने का नाम ही नहीं ले राह था बस एक ही मकसद था यह आवाज़ उन जड़बुद्धि नेताओं तक पहुंचनी है, जो अन्ना की आवाज़ को यह कहकर दबाने की कोशिश करते हैं कि "अन्ना के पीछे सिर्फ 8 से 10 हजार की भीड़ है।
आप हमारा कुछ नहीं कर सकते, तो अब लो अब हजारों की नहीं करोड़ों की भीड़ देखना मेरे देश के नेताओं। इतने जोर से अबकी नारे लगेंगे कि इन नेताओं का दिमाग पूरी तरह खुल जायेगा। यह भीड़ अपने आप में ही महान है। पर उसी भीड़ में हमने देखा एक छोटा सा बच्चा जो कि अपने पिता के कंधे पर बैठा जोर-जोर से झंडा हिला रहा था। वन्दे मातरम के नारे लग रहे थे। क्या ख़ुशी थी उस नन्हे से बच्चे के चेहरे पे जैस वो इस पूरे नज़ारे को अपनी आँखों में जब्त कर लेना चाहता हो।
उसकी ख़ुशी देखकर हमे ऐसा ही महसूस हुआ, जैसा कभी हमारे पूर्वजों को 1947 की आजादी की लड़ाई के वक़्त हुआ होगा। वोह भी एक नए भारत के निर्माण का सपना लियें गोरे अंग्रेजो से लड़ रहे थे और आज हम एक बेहतर भारत का सपना लिए काले अंग्रेजो से लड़ रहे हैं। वो एहसास शब्दों में तो बयान नही किया जा सकता, मगर हाँ, अगर आप सच में उस एहसास को महसूस करना ही चाहते है तो कोई भी अपने आस पास के बच्चे को देख लीजिये, और सोच लिजिये की मुझे हर हालत में इससे एक ऐसा भारत देना है। जहां पे इसको किसी सरकारी मुलाजिम की जी हुजूरी ना करनी पड़े, जहां आन्याय के लिए उठने से पहले इससे यह ना सोचना पड़े कि कहीं मुझे ही तो कटघरे में नहीं खड़ा कर दिया जाएगा। बस आप अपने आप ही उठ खड़े होंगे की अब कुछ करके दिखाना ही है। इस क्रांति का भाग बनना ही है।
यह तो पक्का है कि आने वाली पीड़ियों के पास गाँधी के साथ-साथ अन्ना नाम की शक्सियत भी याद रहेगी। और हो भी क्यों ना जिस इंसान ने तिहाड़ जैसी बदनाम जगह को आज पूरे भारत का मठ बना दिया हो, उसका नाम तो इतिहास के पन्नों के सुनहरे अक्षरों से लिखना बनता ही है। जी हां वही तिहाड़, जिसको अभी तक कलमाड़ी, ए राजा जैसे देश द्रोहियों के लिए जाना जाता था।
जहां की हवा भी लेना अपने आप को अशुद्ध करने जैसा होता था। आज उसी तिहाड़ को मिस्त्र के तहरीर चौक जैसा दर्जा मिल गया। भले आज पूरा भारत, भारत सरकार को कोस राह होगा पर तिहार उनका शुक्रिया अदा करता ना थक रहा होगा। करे भी क्यों ना आखिर यह केंद्र सरकार की अकल (या बेअकल ) का ही नतीजा है की आज हजारों लोगों का सैलाब तिहाड़ पहुचने में लगा हुआ है।
उससे स्वंत्रता के मंदिर जैसा दर्जा मिल चुका है, सही कहा है किसी ने, "अच्छे लोग कीचड में भे गुलाब खिला देते है"। बस अब तो इतना ही मकसद है दोस्तों कि जो यह आग भड़क चुकी है, इससे अब पूरे भ्रष्टाचार के जंगल को ख़ाक करके ही दम लेना चाहिये। आपसे इतनी ही गुजारिश है की जब तक जीत ना जायें तब तक अपने अंदर के जज़बातों के उफान को थमने न दें। अब कि जो थम गए, तो फिर न जाने कब जागेंगे दोस्तों। पूरा जोर लगा देना है और भ्रतास्चार को इतना दूर तक भगा देना है की उस भूत की तरह हो जाए जिसके बारे मे सुना सबने हो, लेकिन देखा किसी ने नहीं हो। जय हिन्द!
लेखक परिचय- निशांत हिरानी, इलाहाबाद स्थित आईआईआईटी में बीटेक के छात्र हैं।
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