पराठों में इस्तेमाल हो रही जानवरों की चर्बी

पिछले कुछ माह पूर्र्व जब एफडीए अधिकारियों ने शहर की बाजारों पर छापे मारी की तो कई टिन जानवरों की जर्बी पकड़ी गयी जो घी के स्थान पर प्रयोग हो रही थी। एफ डीए अधिकारियों ने जर्बी तो जब्त की ही कई दुकानों के चालान भी किए गये लेकिन कुछ दिनों में शासन प्रशासन से आए दबाव में अभियान शांत हो गया और लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले भी छूट गए। समय बीतने के साथ ही एक बार फिर शहर में जर्बी का कारोबार फलने फूलने लगा है। घी की अपेक्षा सस्ती और खाने का स्वाद बढ़ा देने वाली इस जर्बी की लखनऊ में काफी मांग हैं।
जानवरों की इस जर्बी का प्रयोग अधिकांशत कबाब पराठों की दुकान पर होती है। गली कूचों से लेकर चौहारों तक सजे कबाब पराठों के ठेलों पर बिकने वाली खाद्य सामग्री में जानवर की जर्बी का खुलेआम प्रयोग किया जाता है। दुकानदारों की माने तो महज बीस से पच्चीस रुपये में मिल जाने वाली चर्बी से बनने वाले पराठे स्वादिष्ट तो होते ही हैं साथ ही उनमें कड़ापन आ जाता है जो पराठों व कबाब को एक अलग रंग देता है।
दुकान तो लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर ही रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग जिस प्रकार इस ओर से आंखे मूंदे बैठा है उससे तो यह लगने लगा है कि विभागीय अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि जानवर की जर्बी शरीर के भीतर जाने के बाद भी पचती नहीं यह बेहद खतरनाक है। चिकित्सकों की राय है कि चर्बी मिली खाद्य सामग्री से परहेज करें क्योंकि यह पाचन तंत्र को बिगाड़ देती है।












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